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बिहार विधानसभा चुनाव का प्रचार पूरे शबाब पर है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी वोटों की इस जंग में अपनी-अपनी सेनाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए रैलियां शुरू कर चुके हैं. अलग-अलग पार्टियों की ओर से जारी मेनिफेस्टो में जनता से वायदों की भरमार है. दूसरी ओर चुनाव के इस शोर में आलू गरीब बिहारी की थाली से गायब होता जा रहा है. कभी बिहार के सबसे चर्चित चुनावी नारे का हिस्सा रहा आलू बिहार के शहरों में 50 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रहा है जिसने गरीबों और मध्यवर्गीय परिवारों के किचन का बजट बिगाड़कर रख दिया है.
1997-98 में आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव को जब चारा घोटाले में जेल जाना पड़ा था तो वहां उनसे किसी ने पूछा था कि लालू जी, अब तो राजनीति में आपके दिन गिनती के रह गए हैं. इस पर लालू ने अपने अंदाज में कहा था कि, 'जब तक समोसे में आलू रहेगा तब तक बिहार में लालू रहेगा'. लालू का ये बयान आरजेडी कार्यकर्ताओं का नारा ही बन गया था. लालू बिहार में कब तक प्रासंगिक रहेंगे इसका फैसला तो जनता को करना है लेकिन आलू जरूर कीमतों के मामले में हाफ सेंचुरी लगा रहा है, और खाने की थाली से बाहर हो गया है. इस वक्त आलू गया में 60, पटना में 45-50, गोपालगंज में 50 तो आरा में 50 रुपये किलो बिक रहा है.
कोरोना में आमदनी गंवा चुके मेहनतकश वर्ग पर चोट
हर साल अक्टूबर-नवंबर में आलू की कीमतें 25 से 30 रुपये प्रतिकिलो से ज्यादा नहीं पहुंचती हैं. लेकिन इस बार आलू के डबल दाम लोगों को बार बार झटका दे रहे हैं. वो भी तब जब कोरोना से पहले ही बिहार का मेहनतकश वर्ग अपनी आमदनी गंवा चुका है.
दिल्ली-मुंबई-सूरत, पंजाब से बिहार वापस गया मजदूरों का एक बड़ा तबका अभी बिहार में ही है. काफी दिनों से बेरोजगारी और कमाई की किल्लत झेल रहे इस वर्ग ने आलू को फिलहाल अपनी थाली से विदा कर दिया है. आलू ही क्यों, प्याज और टमाटर व कई हरी सब्जियों के दाम आसमान पर हैं.
फिफ्टी प्लस तक पहुंच गया है आलू
आजतक की टीम ने बिहार के अलग-अलग शहरों में आलू की कीमतें पता कीं. गया, गोपालगंज, आरा, पटना जैसे शहरों में सब्जियों के राजा आलू के तेवर शाही हैं, यहां आलू 50 से 60 रुपये प्रति किलो के दर से बिक रहा है. बेतिया, मधुबनी, बाढ़, समस्तीपुर में आलू का भाव 45 से 50 रुपये किलो है.
उधर कटिहार, दरभंगा, सुपौल, बेगूसराय और रक्सौल में एक किलो आलू खरीदने के लिए लोगों को 40 से 45 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. वहीं कैमूर, छपरा, मुंगेर, नवादा, बांका, सहरसा और औरंगाबाद में आलू 35 से 40 रुपये किलो बिक रहा है.
कहीं नहीं है आलू...न नेता के भाषण में, न जनता के राशन में
बता दें कि इस वक्त तक आलू की नई फसल बाजार में आ जाती है और कीमतें गिरने लगती है, लेकिन इस बार आलू समेत सभी सब्जियां ऊपर ही चढ़ती जा रही हैं. हैरानी की बात है कि इसके बावजूद बिहार चुनाव में महंगाई मुद्दा नहीं है. गृहणियां परेशान हैं, रसोई का बजट बिगड़ चुका है. लेकिन आलू-प्याज की बढ़ती कीमतों पर शायद ही किसी नेता का बयान आया हो. जाति, समीकरण और गठबंधन की चक्करघिन्नी में फंसे इस चुनाव में महंगाई के डंक की चर्चा सत्ताधारी दल को तो मुफीद लगती ही नहीं है, विपक्ष भी इससे नजरें फेर ले रहा है.
11 फीसदी लोगों के लिए ही महंगाई है मुद्दा
20 अक्टूबर को देश के नंबर वन न्यूज चैनल आजतक पर प्रसारित हुए लोकनीति-सीएसडीएस के ओपिनियन पोल में मात्र 11 फीसदी लोगों ने ही महंगाई को अपना मुद्दा माना. लोकनीति-सीएसडीएस के ओपिनियन पोल में विकास और रोजगार वोटरों का सबसे बड़ा एजेंडा है. मतदाताओं ने विकास (29%), रोजगार (20%), महंगाई (11%), गरीबी (6%), शिक्षा (7%) और अन्य मुद्दे (25%) को इस चुनाव का प्रमुख एजेंडा बताया.
राशन तो मिला, चोखा कैसे बनाएगा गरीब
जिस बिहार की जनता का प्रचलित भोज दाल-भात चोखा, दाल-भात भुजिया और लिट्टी चोखा (चोखा बनाने के लिए आलू का प्रयोग होता है) है वहां 40 से 50 रुपये प्रति किलो आलू की कीमत उसे चुभने लगी है. उसके पास सरकार से मिला मुफ्त राशन भले ही हो, लेकिन चोखा बनाने के लिए आलू खरीदने की क्रय शक्ति खत्म हो गई है.
बता दें कि कोरोना संक्रमण के दौर में केंद्र सरकार ने गरीबों के लिए नवंबर महीने तक प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज की मुफ्त व्यवस्था की है. इससे करोड़ों गरीबों के सामने अनाज का संकट पैदा नहीं हुआ. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 अक्टूबर को बिहार के सासाराम में एक संबोधन में कहा कि गरीब भूखा ना सोए, दीवाली और छठ पूजा ठीक से मना सके, इसके लिए केंद्र ने मुफ्त अनाज की व्यवस्था की है.
केंद्र के मुफ्त राशन की स्कीम से गरीब की भूख भले ही मिट जाए लेकिन उसकी थाली का स्वाद आलू के बिना अधूरा है जिसके लिए उसके पास इंतजार के अलावा कोई विकल्प नजर नहीं आता.