बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए और महागठबंधन के बीच भले ही सीधा मुकाबला होता नजर आ रहा हो, लेकिन कई ऐसे राजनीतिक फ्रंट भी हैं, जो बिहार की सियासत में किंगमेकर बनने की जुगत में हैं. इसके बावजूद बिहार की सियासी रणभूमि में कई ऐसे नेता नजर नहीं आएंगे, जो पिछले चार दशक से चुनावी मैदान में उतरकर राजनीतिक बाजी अपने नाम करते रहे हैं. हालांकि, इस बार उनकी कमी लोगों को जरूर खल रही है.
सदानंद सिंह
बिहार की सियासत में कांग्रेस के दिग्गज नेता सदानंद सिंह चुनावी मैदान में नहीं उतरेंगे. कांग्रेस ने सदानंद सिंह की परंपरागत सीट कहलगांव से इस बार उनके बेटे शुभानंद मुकेश को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा है. सदानंद सिंह कांग्रेस के ऐसे दिग्गज नेता हैं, जो बिहार में 12 चुनाव लड़कर 9 बार विधायक बने हैं. साल 1969 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे. 1990, 1995 और 2005 का चुनाव छोड़कर वे कभी नहीं हारे. इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष से लेकर विधानसभा में प्रतिपक्ष की कुर्सी पर भी विराजमान रहे, लेकिन अब उनकी राजनीतिक विरासत उनके बेटे शुभानंद के कंधों पर होगी.
शकुनी चौधरी
बिहार विधानसभा चुनाव के इतिहास में दशक के बाद ऐसा चुनाव हो रहा है, जिसमें तारपुर क्षेत्र के कद्दावर नेता शकुनी चौधरी परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में नहीं होगा.1980 से 2015 तक के सभी विधानसभा चुनाव में शकुनी चौधरी तारापुर विधानसभा क्षेत्र से विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के टिकट पर चुनाव लड़ते रहे हैं. पिछले चुनाव में उन्होंने जीतनराम मांझी की पार्टी से चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत नहीं सके थे. इस बार अधिक उम्र के कारण उन्होंने चुनावी राजनीति से संयास ले लिया है.
श्याम रजक
लालू प्रसाद यादव के जमाने से बिहार की राजनीति में छाए रहने वाले श्याम रजक इस बार चुनाव में नजर नहीं आ रहे हैं. बिहार के दलित नेता व पूर्व मंत्री श्याम रजक चुनाव से ठीक पहले जेडीयू का दामन छोड़कर आरजेडी में शामिल हो गए हैं. इसके बावजूद वो अपनी पारंपरिक विधानसभा सीट फुलवारी शरीफ से चुनावी मैदान में नजर नहीं आएंगे, क्योंकि महागठबंधन के सीट बंटवारे में उनकी यह सीट सीपीआई (माले) के खाते में चली गई है. ऐसे में वो आरजेडी से इस सीट पर चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, जबकि 1995 से लगातार श्याम रजक यहां से जीत दर्ज करने में कामयाब रहे हैं. ऐसे में आरजेडी की लिस्ट में अभी तक दूसरी सीट से भी उनके नाम की घोषणा नहीं हुई है.
पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह
जेपी आंदोलन के दिनों से चर्चा में रहे नरेंद्र सिंह 2010 में बनी नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री रहे. जमुई और बांका के क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव है, लेकिन जेडीयू ने उन्हें टिकट नहीं दिया है और न ही उनके दोनों बेटे में से किसी को टिकट मिला. ऐसे में उनके बेटे तो आरएलएसपी का दामन थामकर चुनावी मैदान में उतर गए हैं, लेकिन नरेंद्र सिंह चुनावी मैदान से बाहर हैं. ऐसे में वो अपने बेटे की जीत दिलाने के लिए पसीना बहाते जरूर नजर आएंगे.
पूर्व मंत्री नागमणि
पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि इस बार विधानसभा चुनाव के पहले पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के साथ बिहार घुमकर नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल बनाने का काम कर रहे थे. हालांकि, अब उन्होंने साफ कर दिया है कि इस बार के चुनावी मैदान में वे खुद उम्मीदवार नहीं होंगे, लेकिन महागठबंधन के प्रत्याशी को समर्थन करेंगे. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटाने के बाद उन्होंने जेडीयू का दामन थामा था, लेकिन पिछले साल उन्होंने नीतीश कुमार का भी साथ छोड़ दिया है.
ये दिग्गज भी नजर नहीं आएंगे
जेडीयू से सांसद और राज्य सरकार में मंत्री रहीं रेणु कुशवाहा के भी इस बार उम्मीदवार नहीं बनने की संभावना है. जेडीयू ने उन्हें टिकट नहीं दिया है और न ही किसी और पार्टी से मिला है. बीजेपी के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री डॉ. भीम सिंह इस बार सीन में नहीं दिख रहे हैं. इसके अलावा बीजेपी प्रवक्ता प्रेमरंजन पटेल की सीट सूर्यगढ़ा जेडीयू में चली जाने के चलते चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं. ऐसे ही बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष राजीव रंजन की इस्लामपुर सीट जेडीयू के खाते में चली गई. संजय टाइगर की संदेश सीट जेडीयू के कोटे में जाने से वो चुनावी मैदान में नहीं उतरेंगे.