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सीमांचल में यूं ही सफल नहीं रहे ओवैसी, इस रणनीति से मात खा गया महागठबंधन

मुस्लिम बहुल सीमांचल की सियासी जमीन पर AIMIM चुनावी फसल काटने में सफल रही है और बिहार में बड़े राजनीतिक गेनर के तौर पर उभरी है. सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी फैक्टर नहीं चलता तो शायद बिहार के सिंहासन पर बैठने का मौका तेजस्वी यादव को मिल सकता था. क्योंकि AIMIM ज्यादातर उन्हीं सीटों को जीतने में सफल रही है, जहां कांग्रेस और आरजेडी का कब्जा रहा है. 

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AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार की 20 सीटों पर AIMIM ने उतारे थे प्रत्याशी
  • बिहार की पांच सीटों पर AIMIM ने जीत दर्ज की
  • AIMIM ने बिगाड़ा महागठबंधन का सियासी खेल

बिहार का सीमांचल इलाका नेपाल और पश्चिम बंगाल से सटा होने के साथ-साथ पूर्वोत्तर को जोड़ता है. यह वो इलाका है जहां भारी गरीबी के बीच हर साल बाढ़ से लोगों की जिंदगी दूभर होती है. मुस्लिम बहुल सीमांचल की सियासी जमीन पर ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) चुनावी फसल काटने में सफल रही है और बिहार में बड़े राजनीतिक गेनर के तौर पर उभरी है. सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी फैक्टर नहीं चलता तो शायद बिहार के सिंहासन पर बैठने का मौका तेजस्वी यादव को मिल सकता था. क्योंकि AIMIM ज्यादातर उन्हीं सीटों को जीतने में सफल रही है, जहां कांग्रेस और आरजेडी का कब्जा रहा है. 

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सीमांचल की सीटों पर लड़ी AIMIM

बिहार के सीमांचल इलाके में 24 सीटे हैं, जहां ज्यादातर सीटों पर मुस्लिम निर्णायक भूमिका में हैं. यहां के मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू के बजाय असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को चुना है.  AIMIM को बिहार की पांच सीटों पर जीत मिली है, जिनमें अमौर, कोचाधाम, जोकीहाट, बायसी और बहादुरगंज सीट है. ये सभी सीटें सीमांचल के इलाके की हैं. बिहार में AIMIM ने 20 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से 14 सीटें सीमांचल के इलाके की थीं जबकि बाकी सीटें मिथिलांचल की थीं. 

कांग्रेस के दुर्ग में AIMIM की सेंध

पूर्णिया जिले की अमौर सीट पर अब तक कांग्रेस के अब्दुल जलील मस्तान लंबे समय से विधायक थे, लेकिन एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तुरुल ईमान ने यहां के आधे से ज्यादा वोट हासिल कर सीट अपने नाम कर ली है. ऐसे ही बहादुरगंज सीट पर कांग्रेस के तौसीफ आलम पिछले सोलह सालों से विधायक थे, लेकिन एआईएमआईएम के अंजार नईमी ने उन्हें करारी मात दी है. अररिया जिले की जोकीहाट विधानसभा सीट आरजेडी का मजबूत गढ़ मानी जाती है, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी ने यहां से तस्लीमुद्दीन के बड़े बेटे सरफराज आलम के खिलाफ उनके छोटे भाई शाहनवाज आलम को उतारकर यह सीट अपने नाम कर ली. सरफराज आलम यहां से चार बार के विधायक रहे हैं, लेकिन इस बार अपने छोटे भाई की पतंग को नहीं काट सके. 

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किशनगंज की कोचाधाम विधानसभा सीट पर जेडीयू का लंबे समय से राजनीतिक वर्चस्व कायम था, लेकिन ओवैसी ने यहां से मुहम्मद इजहार असफी को उतारकर सारे समीकरण ध्वस्त कर दिए. हालांकि, 2015 में भी इस सीट पर AIMIM दूसरे नंबर पर रही थी. ऐसे ही बायसी विधानसभा सीट पर  AIMIM के सैयद रुकनुद्दीन ने जीत दर्ज की है. इन पांचों सीटों पर मुस्लिमों मतदाता ने महागठबंधन के प्रत्याशी की तुलना में AIMIM को तव्वजो दी है. 

महागठबंधन को 11 सीटों का नुकसान

सीमांचल में एनडीए की बात करें तो उसे किशनगंज में एक भी सीट नहीं मिली है जबकि पूर्णिया, अररिया और कटिहार में क्रमश: चार-चार सीटों पर जीत हासिल की है. महागठबंधन को किशनगंज में 2, पूर्णिया में एक, अररिया में एक और कटिहार में तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा है. वहीं, 2015 के चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. कांग्रेस ने यहां अकेले 9 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि जेडीयू को 6 और आरजेडी को 3 सीटें मिली थीं. इस तरह से AIMIM ने सीमांचल में 11 सीटों पर महागठबंधन को तगड़ा झटका दिया है. 

बिहार में AIMIM को मिली पांच सीटों पर जीत का जश्न प्रदेश ही नहीं बल्कि हैदराबाद में भी पार्टी कार्यकर्ता मनाने की तैयारी में जुट गए हैं. तेलंगाना और महाराष्ट्र के बाद AIMIM बिहार में अपना राजनीतिक आधार जमाने में कामयाब रही है. बिहार में AIMIM की जीत के लिए असदुद्दीन ओवैसी ने कुल 65 रैलियां की हैं, जिनमें से करीब 50 रैलियां आखिरी चरण के सीमांचल के इलाके में थीं. 

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ओवैसी का सीमांचल में गेम प्लान

असदुद्दीन ओवैसी 24 अक्टूबर से सीमांचल में कैंप किए हुए थे और उन्होंने दस दिन में ताबड़तोड़ रैलियां करके सियासी माहौल अपने पक्ष में करने का काम किया. असदुद्दीन ओवैसी ने पहली बार ईद-मिलादुन नबी का त्योहार हैदराबाद के बजाय बिहार में मनाया. सीमांचल के इलाके में उन्होंने सीएए-एनआरसी जैसे मुद्दे को हवा देकर मुस्लिमों की नब्ज को पकड़ा था, क्योंकि बीजेपी नेता लगातार घुसपैठ का मुद्दा उठा रहे थे जबकि महागठबंधन के नेताओं ने इस पर चुप्पी साध रखी थी. यही वजह रही कि सीमांचल के मुसलमानों की पहली पसंद AIMIM बन गई.

बिहार की सियासी नब्ज को असदुद्दीन ओवैसी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद किशनगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में समझ लिया था, जब उनकी पार्टी यहां से खाता खोलने में कामयाब रही थी. इसी के बाद से उन्हें सीमांचल की सियासी जमीन उपजाऊ नजर आने लगी थी. सीएए-एनआरसी के खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, उसी समय ओवैसी ने सीमांचल में भी इस मुद्दे पर रैली करके उनके साथ खड़े होने के संकेत दे दिए थे. 

बिहार चुनाव के ऐलान से पहले असदुद्दीन ओवैसी ने अपने करीबी और हैदराबाद के पूर्व मेयर माजिद हुसैन को सीमांचल में AIMIM की राजनीति मजबूत करने के लिए भेज दिया था. माजिद हुसैन पिछले दो महीने तक सीमांचल में रहे और पार्टी के संगठन से लेकर जिताऊ उम्मीदवार की तलाश करने का काम किया. माजिद हुसैन को ओवैसी का कान, नाक और आंख कहा जाता है. बिहार में AIMIM के सभी उम्मीदवारों के चयन से लेकर पार्टी के बूथ प्रबंधन और ओवैसी की रैली तक की रूप रेखा तैयार की. इसी आधार पर सीमांचल में ओवैसी पांच सीटें जीतने में कामयाब रहे. 

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