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बिहार में तेजस्वी की जीत यूपी-बंगाल में खोलेगी बीजेपी को चुनौती देने की राह?

अगले साल जब पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव होंगे तो वहां तीसरा विकल्प देने के लिए कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी का गठबंधन काफी अहम साबित हो सकता है. बिहार और बंगाल की क्यों, देश के अन्य राज्यों में भी बिहार के महागठबंधन फॉर्मूले का असर देखने को मिल सकता है.

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तेजस्वी यादव के रास्ते बीजेपी को दी जा सकती है शिकस्त! (फाइल फोटो)
तेजस्वी यादव के रास्ते बीजेपी को दी जा सकती है शिकस्त! (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • एग्जिट पोल में महागठबंधन को भारी बहुमत
  • महागठबंधन में दिखाया बेहतर तालमेल
  • एनडीए बिखर कर लड़ा चुनाव, हुआ नुकसान

बिहार के एग्जिट पोल के नतीजों ने एक बात तो साफ कर दी है कि अगर विपक्ष की एकता दिखे तो मोदी फैक्टर को भी कम किया जा सकता है. बिहार के चुनाव में जो एक बात दिखी वह यह थी कि एनडीए के मुकाबले विपक्षी महागठबंधन ने बेहतर तालमेल दिखाया और एक रणनीति से चुनाव लड़ा. चुनाव के दौरान यह भी दिखा कि किस तरीके से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए बिखर कर चुनाव लड़ रहा था. केंद्र सरकार में घटक होने के बावजूद चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी बिहार में एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ रही थी.

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चिराग ने नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड पर सबसे ज्यादा हमला बोला. वोट के तौर पर भी इसका नुकसान सत्ताधारी गठबंधन को होता हुआ दिखाई पड़ रहा है. वहीं राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने बेहतर तालमेल के साथ अपनी विचारधारा अलग-अलग होने के बावजूद कभी भी इसे लोगों के बीच जाहिर नहीं किया. 

कांग्रेस ने भी खुद राष्ट्रीय दल होने के बावजूद तेजस्वी जैसे युवा और क्षेत्रीय दल के नेताओं पर एक बड़ा दांव खेला. चुनाव से पहले शंका यह थी कि बगैर लालू यादव क्या आरजेडी की चुनावी वैतरणी पार हो पाएगी?  लेकिन जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ा तेजस्वी अपने साथ युवा वोटरों और बड़े मुद्दों को एक साथ उठाने में कामयाब होते गए. शुरुआती दौर में महागठबंधन को झटका भी लगा जब जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा, गठबंधन से अलग हो गई.

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बात इतने पर ही नहीं रुकी जब महागठबंधन में सीटों का बंटवारा अंतिम चरण में था तब मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी भी महागठबंधन से अलग हो गई और एनडीए में जा मिली. ऐसे में जातीय समीकरण के आधार पर यह माना जाने लगा कि अति पिछड़ा और मल्लाह जैसी जाति के छिटक जाने का सीधा असर महागठबंधन की चुनावी जीत पर भी हो सकता है. 

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बंगाल में कांग्रेस के साथ लेफ्ट तैयार!

इन सब के बावजूद राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाले महागठबंधन में कांग्रेस तो शामिल हुई ही साथ ही साथ वामपंथी दल जैसे भाकपा माले सीपीआई और सीपीएम ने साथ मिलकर बेहतर कोआर्डिनेशन से चुनाव लड़ा. यह गठबंधन इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी बंगाल में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने के लिए तैयार दिखाई पड़ रही है.

अगले साल जब पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव होंगे तो वहां तीसरा विकल्प देने के लिए कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी का गठबंधन काफी अहम साबित हो सकता है. ममता बनर्जी पहले से ही बंगाल में भारतीय जनता पार्टी से कड़ी चुनौती का सामना कर रही हैं और पिछले दिनों बीजेपी के सीनियर नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल जाकर यह साफ कर दिया कि इस बार वह ममता सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं.  

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ऐसे में बिहार एग्जिट पोल के अनुमान यह भी दिखाते हैं कि क्या ममता बनर्जी भी आने वाले चुनाव में कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ किसी तरीके की कोई बातचीत करेंगी? क्या बंगाल में भी बीजेपी को सत्ता में दूर रखने के लिए बिहार की तर्ज पर कोई बड़ा सियासी समीकरण बन सकता है?

बात सिर्फ बिहार या बंगाल तक ही सीमित नहीं है. हिंदी भाषी राज्यों में सबसे बड़ा चुनाव 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का भी होना है. वहां फिलहाल विपक्ष बिखरा हुआ दिखाई पड़ रहा है. जहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी लोकसभा चुनाव में तालमेल के बाद एक बार फिर अलग हो चुके हैं. वहीं कांग्रेस प्रियंका गांधी के दम पर नई सरकार बनाने का दम भर रही है. ऐसे में विपक्षी वोट बंटने का सीधा फायदा मौजूदा बीजेपी सरकार को हो सकता है.

क्या यूपी में भी इसी तर्ज पर लड़ा जाएगा चुनाव

बिहार के नतीजों में उत्तर प्रदेश के लिए भी सबक है कि अगर विरोधी पार्टियां एकजुट होकर लड़ती हैं तो वोट बंटवारे से बचा जा सकता है. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने एक दूसरे के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था हालांकि गठबंधन को करारी शिकस्त हासिल हुई थी लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में दोनों का अलग-अलग लड़ना बीजेपी के लिए राह आसान कर सकता है.

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फिलहाल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों ने यह साफ किया है कि वह 2022 का यूपी चुनाव अलग अलग ही लड़ेंगे, लेकिन अगर महागठबंधन का प्रयोग सफल होता है तो तमाम राज्यों में विपक्षी पार्टियों को अपनी सियासी रणनीति में एक बार बदलाव करने का विचार तो करना ही होगा. 

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