बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ने लगी हैं. ऐसे में नए समीकरणों को देखते हुए नए सिरे से किलेबंदी हो रही है. दलों के नेता नफा-नुकसान और जातिगत गुणा भाग को देखकर रणनीति बनाने में लगे हैं. कहते हैं कि सियासत में कभी कोई स्थायी दुश्मन-दोस्त नहीं होता. बिहार की राजनीति में इन दिनों ऐसा ही देखने को मिल रहा है. जो राजनीतिक दुश्मन थे वो दोस्त हो रहे हैं और दोस्त प्रतिद्वंद्वियों के पाले से हाथ मिला रहे हैं.
चुनाव में जब थोड़ा ही वक्त बचा है तो दल बदल का खेल भी जोर पकड़ने लगा है. विधायकों का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने का सिलसिला कई महीनों से चल रहा है. अब क्षेत्रीय दल भी एक सियासी मोर्चे को छोड़कर दूसरे सियासी मोर्चे से हाथ मिला रहे हैं.
जीतन राम मांझी फैक्टर
हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा महगठबंधन (हम) के अध्यक्ष जीतन राम मांझी को महादलित, दलित और पिछड़ों के वोट साधने की कोशिश में नीतीश कुमार ने अपने साथ जोड़ लिया. मांझी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबधन (एनडीए) में शामिल होने की घोषणा एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स के ज़रिए खुद ही की. दिलचस्प है कि मांझी ने एनडीए में शामिल होने की घोषणा की तो न तो जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और न ही बीजेपी का ही कोई नेता मांझी के स्वागत के लिए मंच पर मौजूद था. ऐसे मौकों पर पर जो ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं, वो भी नदारद दिखे. जेडीयू के नेता भी मांझी के साथ आने पर खुल कर कुछ बोलने से परहेज कर रहे हैं.
बिहार में पिछला विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ा था. उस चुनाव में नीतीश से मतभेदों के चलते मांझी ने जेडीयू से अलग होकर हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा बनाया था. मांझी के मोर्चे ने वो चुनाव एनडीए के साथ मिलकर लड़ा था और 24 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. सिर्फ मांझी को छोड़कर बाकी उनके सभी उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा.
मांझी को नीतीश ने क्यों जोड़ा साथ?
दरअसल, मांझी के नीतीश के साथ जाने में लोकजनशक्ति (एलजेपी) पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान के तेवरों का बड़ा हाथ रहा है. रामविलास पासवान के बेटे चिराग जिस तरह एनडीए में रहते हुए भी नीतीश कुमार को तमाम मुद्दों पर घेर रहे हैं, उससे नीतीश कुमार काफी आहत बताए जाते हैं. चिराग ने JEE-NEET इम्तिहान हो या कानून व्यवस्था का मुद्दा, प्रवासी श्रमिकों की परेशानियां हो या कोरोनावायरस महामारी से निपटने की खामियां, या फिर पटना शहर में पानी भरने का मुद्दा, कहीं भी नीतीश पर निशाना साधने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
अब रही सही कसर चिराग ने एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच को लेकर कड़ा रुख अपनाने के साथ पूरी कर दी. सुशांत केस की जांच के आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिए. लेकिन इससे पहले चिराग ने सीबीआई जांच की मांग उठाते वक्त कहा था कि ‘बिहार के बेटे’ (सुशांत) की मौत पर नीतीश कुमार क्यों चुप हैं?
यही नहीं एलजेपी चुनावी मोर्चे पर भी एनडीए की लाइन से अलग ही खिचड़ी पकाती दिख रही है. पिछले दिनों एलजेपी नेताओ की तरफ से ऐसे बयान देखे जा रहे है कि पार्टी जेडीयू के खिलाफ चुनाव मैदान में 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है. एलजेपी के इन्हीं तेवरों ने नीतीश को मांझी को दोबारा अपने साथ मिलाने के लिए ट्रिगर किया. पासवान के दलित कार्ड की काट के लिए नीतीश महादलित कार्ड चलकर एलजेपी को पटकनी देने की कोशिश में हैं.
नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि 2015 विधानसभा चुनाव मे एलजेपी ने 42 सीटों उम्मीदवार उतारे थे. एलजेपी को महज दो सीटों पर जीत मिली थी. यहां तक कि रामविलास पासवान के भाई पशुपति पासवान को भी करारी शिकस्त मिली थी.
सार्वजनिक मंचों से जेडीयू की ओर से एलजेपी पर कई बार ये तंज कसा गया है कि चिराग पासवान इसलिए नीतीश कुमार सरकार पर इस हमलावर हैं जिससे वो दबाव बनाकर गठबंधन में ज़्यादा सीटे हासिल कर सकें.
चिराग पासवान की नड्डा से हालिया मुलाकातों के मायने?
चिराग पासवान बीते एक महीने में दो बार बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाक़ात कर चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने एक बार फोन पर भी नड्डा से बिहार में सीटों के बंटवारे पर स्थिति स्पष्ट करने की बात कह चुके हैं. चिराग ने बीजेपी नेतृत्व से कहा कि एनडीए में कौन सी पार्टी कितनी सीटें और कौन सी सीटों पर चुनाव लड़ेगी, ये जल्दी तय हो जाना चाहिए, नहीं तो 2015 में जिस तरह से आखिरी वक्त पर सीटों का बंटवारा हुआ था उसका नुक़सान एनडीए को उठाना पड़ा था. चिराग का कहना था कि इस बार वैसा नहीं होना चाहिए.
चिराग का जोर है कि 2015 की तरह ही उनकी पार्टी को 42 सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिले. उनकी दलील है कि 2014 में उनकी पार्टी ने 7 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था तो उन्हें एक लोकसभा सीट के अनुपात से 6 विधानसभा सीट मिली थी. 2019 लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 6 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था और उन्हें एक राज्यसभा सीट मिली थी. इस लिहाज से एलजेपी को इस चुनाव में भी 42 सीटें मिलनी चाहिए.
सीटों के बंटवारे के लिए क्या है जेडीयू का फॉर्मूला?
सूत्रों की मानें तो जेडीयू की तरफ से सीटों के बंटवारे के लिए जो फॉर्मूला सुझाया गया है उसके मुताबिक 243 सदस्यीय विधानसभा के लिए बीजेपी को 123 सीट और जेडीयू को 120 सीट मिलें. बीजेपी अपने हिस्से की 123 सीटों में एलजेपी के साथ सीट बांटे और जेडीयू अपनी 120 सीटों में से मांझी के हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के साथ सीट शेयर करे. मतलब साफ़ हैं जेडीयू अब एलजेपी के साथ किसी भी तरह की बातचीत के लिए तैयार नहीं है.
सोमवार को एलजेपी ने विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एलजेपी ने अपने संसदीय दल की बैठक बुलाई है. इसमें पार्टी अपनी भावी रणनीति तैयार करेगी. सूत्रों के मुताबिक खबर है कि एलजेपी नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर सकती हैं. वहीं एनडीए में रहते हुए ही चुनाव में जेडीयू के ख़िलाफ़ अपने उम्मीदवार उतराने पर विचार कर सकती है.
इतना साफ़ है कि बिहार में जिस तरह से एनडीए के सहयोगी दलों में खींचतान चल रही है वो बीजेपी के लिए भी बड़ी चुनौती से कम नहीं. बीजेपी नेतृत्व को बिहार में एनडीए के सभी दलों को साथ लेकर चलना टेढ़ी खीर होगा. एलजेपी के तेवर इसी तरह कायम रहे तो ये पार्टी चुनाव में नीतीश कुमार का आरजेडी से ज्यादा नुकसान कर देगी.