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बिहार के वैशाली में विश्व की सबसे पुरानी संसद, फिर भी अनदेखी क्यों?

वैशाली में यह भग्नावशेष दरअसल लिच्छवी गणराज्य के राजा विशाल का है. लिच्छवी गणराज्य की सीमा दरअसल बिहार से होते हुए नेपाल के कई हिस्सों तक जाती थी.

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विश्व का सबसे पुराना संसद (फोटो- आजतक)
विश्व का सबसे पुराना संसद (फोटो- आजतक)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • विश्व की सबसे पुरानी संसद बिहार के वैशाली जिले में
  • तकरीबन ढाई हजार साल पुरानी है संसद
  • अलग-अलग हिस्सों से चुनकर आए थे 7,770 प्रतिनिधि

दिल्ली का संसद तो हर किसी ने देखा होगा पर यह बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि विश्व का सबसे पुराना संसद बिहार के वैशाली जिले में है. तकरीबन ढाई हजार साल पुरानी संसद. लेकिन उस संसद के भग्नावशेष अब सरकारी उपेक्षा के शिकार हैं और वहां से ईंटें निकल रही हैं. बिहार के चुनावों में चक्कर लगाते आजतक की टीम पहुंच गई वहां, जहां ईसा पूर्व 600 से 700 साल पहले विश्व के पहले गणतंत्र लिच्छवी की राजधानी थी. 

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अंदर पहुंचने से पहले हमारी टीम का स्वागत कच्चे रास्ते ने किया. किसी तरह पूछते हुए हम वहां पहुंचे जिसे स्थानीय भाषा में गढ़ कहा जाता है. कच्चे रास्ते से ऊपर टीले पर चढ़ते ही हमें आखिरकार वह बोर्ड दिख गया जिसे हम ढूंढ रहे थे. उस बोर्ड पर लिखा था " राजा विशाल के गढ़ का भग्नावशेष". हमें उम्मीद थी जिस संसद को हम ढूंढते हुए पटना से तकरीबन 60 किलोमीटर आ गए,  वहां कम से कम हमें इसका इतिहास बताने वाला कोई तो मिलेगा.

एक बड़े से अहाते वाला यह गढ़ बिल्कुल वीरान पड़ा था. ढूंढने पर हमें यहां चौकीदारी करते हुए रामवृक्ष राय मिले. हमने उनसे पूछा कि क्या आप इस गढ़ के केयरटेकर है? तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया कि मैं ही यहां पर चौकीदार हूं और मैं ही केयरटेकर भी और 24 घंटे मुझे ही यहां का रखरखाव करना होता है. कैमरे पर उन्होंने कुछ भी बोलने में असमर्थता जाहिर कर दी. उन्होंने कहा कि अधिकारी यहां देखने तो नहीं आते लेकिन उनके खिलाफ बोलने पर कार्रवाई जरूर की जा सकती है.

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देखें: आजतक LIVE TV 

वैशाली में यह भग्नावशेष दरअसल लिच्छवी गणराज्य के राजा विशाल का है. लिच्छवी गणराज्य की सीमा दरअसल बिहार से होते हुए नेपाल के कई हिस्सों तक जाती थी. तकरीबन ढाई हजार साल पहले तक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें 7,770 प्रतिनिधि अलग-अलग हिस्सों से चुनकर आए थे और इस सभा में शरीक होते थे. सभी अपने अपने इलाकों की समस्या बताते और यहां उसी के अनुसार नीतियां भी बनाई जातीं. 

साल 1957-58 में यहां पर खुदाई शुरू हुई और इस ऐतिहासिक भग्नावशेष को बाहर निकाला गया. इसके अंदर से निकलने वाली वस्तुओं को अलग-अलग संग्रहालय में रखा गया है जिसमें दिल्ली का संग्रहालय  भी शामिल है. लेकिन स्थानीय लोगों की माने तो उसके बाद यहां पर कोई खुदाई नहीं की गई. करीब 10 साल पहले पास की एक साइट पर खुदाई हुई लेकिन उसे भी अधूरा छोड़ दिया गया.

यहां पर चौकीदारी करने वाले रामवृक्ष राय बताते हैं कि इस पूरे अहाते में पानी पीने के लिए एक पंप तक नहीं है. इस वजह से 24 घंटे की ड्यूटी के बावजूद उन्हें पानी पीने दूर गांव जाना पड़ता है. जिस राज्य में विकास के नाम पर हर पार्टी चुनाव लड़ना चाहती है, वहां एक ऐसी धरोहर उपेक्षित है जिसे देश ही नहीं बल्कि विदेश से भी लोग देखने आते हैं. 

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