बिहार चुनाव में बहुत कुछ पहली बार ऐसा होगा जो चुनावी इतिहास में कभी नहीं हुआ. बस पुरानी बात रहेगी तो यही कि आपराधिक, दबंग और रंगबाज नेताओं और उम्मीदवारों की जोरदार उपस्थिति. राजनीतिक पार्टियों ने जो दुस्साहस दिखाया है उसके आगे सुप्रीम कोर्ट के फरमान और निर्वाचन आयोग की हिदायतें डरी सहमी कोने में खड़ी हैं. देश में लोकतंत्र के फिल्टर यानी चुनावी युद्ध को अपराध, अपराधियों और धनबल से मुक्त करने की सारी कवायद गैस भरे गुब्बारे की तरह हवा में उड़ गई हैं.
आयोग और कोर्ट तक मामला जब तक पहुंचेगा और तारीखों व नोटिस, जवाब और प्रति उत्तर के बाद बहस, तर्क, दलीलों के बाद जब तक फैसला आएगा तब तक तो शायद विधानसभा का पांच साल का कार्यकाल भी पूरा हो जाए. जिन पर सबसे ऊंचे कोर्ट के मौजूदा फैसले का कोई असर नहीं वो सालों बाद आने वाले आदेश से अभी से क्यों घबराएं. बिहार की धरती पर ही आचार्य चाणक्य ने भी कहा था कि भय से तब तक भयभीत नहीं होना चाहिए जब तक भय का कारण सामने ना आ जाए.
उम्मीदवारों की सूची देखकर तो नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन का कोई असर दिखता है. राज्य में अभी चुनाव मैदान में संघर्ष करने उतरे 1064 उम्मीदवारों में से 328 यानी 31 फीसदी तो अपराधिक पृष्ठभूमि के हैं. ये अलग बात है कि मतदान के तीनों चरणों के नामांकन की आखिरी तिथि खत्म हो गई है. लेकिन अब तक निर्देशों के मुताबिक जदयू ने दिखावे के लिए अपने उम्मीदवारों में आपराधिक पृष्ठ भूमि वाले उम्मीदवारों का ब्यौरा अपनी वेबसाइट पर डाला है.
लेकिन बाकी किसी भी पार्टी ने ऐसा करने की ना तो हिम्मत दिखाई ना ही दिलचस्पी. यानी बीजेपी, आरजेडी, एलजेपी कांग्रेस और बीएसपी सहित सभी राजनीतिक पार्टियां इसी मुद्रा के साथ ढीठ बनी बैठी हैं कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग में जो होगा वो देख लेंगे.
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच के अनुसंधान से साफ हुआ है कि 1064 उम्मीदवारों में से 328 पर आपराधिक मामले चल रहे हैं. यानी 31 फीसदी हैं. इनमें से 244 यानी 23 फीसदी के खिलाफ गंभीर अपराधों वाली धाराओं मसलन हत्या, बलात्कार, जानलेवा हमले, चार सौ बीसी आदि के तहत मुकदमे लंबित हैं. अपराधिक पृष्ठभूमि वालों को टिकट देने में सबसे अव्वल राष्ट्रीय जनता दल है. जिसके मुखिया लालू यादव स्वयं चारा घोटाले के अपराध में सजा काट रहे हैं. आरजेडी के 54 उम्मीदवार सीरीयस क्राइम के आरोपों में घिरे हैं यानी सबसे ज्यादा 73 फीसदी.
इसके बाद केंद्र और राज्य दोनों में सत्ताधारी दल बीजेपी का नंबर आता है. बीजेपी के 45 उम्मीदवार यानी कुल उम्मीदवारों में से 72 फीसदी गंभीर अपराधों के आरोपी हैं. एलजेपी के 49 (59 फीसदी), कांग्रेस के 43 (57 फीसदी), जेडीयू के 29 (43 फीसदी) और बीएसपी 19 उम्मीदवार यानी 31 फीसदी के खिलाफ गंभीर अपराधों में मुकदमे चल रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी 2020 को अपने फैसले में कहा था कि अब हरेक राजनीतिक दल को चुनाव से पहले तीन बार स्थानीय अखबार, न्यूज चैनल और अपनी वेबसाइट पर अपने उम्मीदवारों के खिलाफ चल रहे अपराधिक मुकदमों की पूरी तफसील देने के साथ ये भी बताना होगा कि आखिर इसे ही क्यो टिकट दिया गया. कोर्ट ने ये भी साफ कर दिया कि सिर्फ ये कहने से काम नहीं चलने वाला कि उम्मीदवार जिताऊ है इसलिए टिकट दे दिया.
ये तो हुई बाहुबल की बात यानी आपराधिक दबंगई और रंगबाजी से चुनाव पर असर डालने की. इसके बाद नंबर आता है धनबल का. एडीआर और एनईडब्ल्यू की अनुसंधान रिपोर्ट के मुताबिक 1064 उम्मीदवारों में से 375 यानी 35 फीसदी तो करोड़पति हैं. जेडीयू उम्मीदवारों की औसत संपदा 8.12 करोड़. आरजेडी के उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 6.9 करोड़, कांग्रेस की छह करोड़, एलजेपी की 4.62 करोड़ औऱ बीजेपी की 3.10 करोड़ औसत संपत्ति है. कुल उम्मीदवारों में से 93 यानी नौ फीसदी के पास पांच करोड़ या उससे ज्यादा रुपये की संपत्ति है. कुल उम्मीदवारों में से 123 यानी 12 फीसदी दो से पांच करोड़ रुपये की संपदा का स्वामी हैं. कुछ उम्मीदवार ऐसे भी हैं जिनके पास संपदा के नाम पर शून्य है.