बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. तीन चरणों में प्रदेश की जनता अपनी अगली सरकार और विधानसभा में अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए वोट करेगी. दरभंगा विधानसभा सीट के लिए तीसरे और अंतिम चरण में 7 नवंबर को वोट डाले जाएंगे.
बीजेपी ने इस बार भी संजय सरावगी को टिकट दिया है. सरावगी के सामने महागठबंधन की ओर से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने अमरनाथ गामी को उम्मीदवार बनाया है. जन अधिकार पार्टी ने सियाराम पासवान को मैदान में उतारा है.
दरभंगा विधानसभा सीट का अतीत देखें तो यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का मजबूत किला रहा है. साल 2005 के विधानसभा चुनाव से ही इस सीट पर भाजपा का कब्जा है. इस सीट पर साल 2005 में दो दफे हुए चुनाव में से दोनों ही बार भाजपा के संजय सरावगी ने विजय पताका फहराया था. साल 2010 के चुनाव में भी भाजपा ने संजय सरावगी पर भरोसा जताया और सरावगी ने 26 हजार वोट के बड़े अंतर से अपने निकटतम प्रतिद्वंदी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के उम्मीदवार को पराजित कर इस भरोसे को सही साबित किया था.
पिछले यानी साल 2015 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने संजय सरावगी पर ही दांव लगाया. इस बार भी सरावगी कड़े मुकाबले में विधानसभा पहुंचने में सफल रहे. सरावगी ने विपक्षी महागठबंधन के उम्मीदवार पूर्व महापौर ओमप्रकाश खेरिया को हराया था. हालांकि, इस दफे जीत का अंतर जरूर कम रहा. सरावगी को 7000 वोट के अंतर से जीत मिली थी.
भाजपा ने इस बार भी संजय सरावगी को ही उम्मीदवार बनाया है. सरावगी के सामने राष्ट्रीय जनता दल ने अमरनाथ गामी और जन अधिकार पार्टी ने सियाराम पासवान को उतारा है.
दबदबा कायम रखना चाहेगी भाजपा
भाजपा चाहेगी कि दरभंगा विधानसभा सीट पर उसका दबदबा कायम रहे. वहीं, विपक्षी खेमा भाजपा के किले को ध्वस्त करने के लिए पूरा जोर लगाएगा. दरभंगा विधानसभा क्षेत्र में करीब 3 लाख मतदाता हैं, जो अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए 7 नवंबर को मतदान करेंगे. पिछले चुनाव में इस सीट पर करीब 58 फीसदी मतदान हुआ था. अधिक मतदान सीटिंग पार्टी के खिलाफ माना जाता है, लेकिन संजय सरावगी अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को करीब 7000 मतों से मात देने में सफल रहे थे.
भाजपा के पास है जेडीयू का साथ
पिछले चुनाव में कम अंतर से सीट बचाने में सफल रही भाजपा को मात देना महागठबंधन के लिए आसान नहीं होगा. भाजपा के साथ इस दफे जेडीयू भी है, जो पिछले चुनाव में महागठबंधन के साथ थी. भाजपा-जेडीयू के साथ होने से महागठबंधन के लिए चुनावी राह और मुश्किल होगी.