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बिहार चुनाव....कभी लालू तो कभी नीतीश के लिए क्यों जरूरी हो जाते हैं बाहुबली अनंत सिंह?

मोकामा से निर्दलीय विधायक अनंत सिंह के 2018 तक जदयू से रिश्ते खराब हो गए थे. कभी नीतीश के कृपापात्र माने जाने वाले अनंत सिंह को पुलिस ने जेल में डाल दिया था. वह आरजेडी का दामन थामना चाहते थे लेकिन तेजस्वी राह का रोड़ा बन गए.

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मोकामा से निर्दलीय विधायक अनंत सिंह (फाइल फोटो)
मोकामा से निर्दलीय विधायक अनंत सिंह (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मोकामा से निर्दलीय विधायक हैं अनंत सिंह
  • इस बार आरजेडी ने अनंत सिंह को दिया टिकट
  • नीतीश और अनंत सिंह के रिश्ते 2015 तक ठीक रहे

राजनेताओं को जिताने के लिए जान लड़ाने वाले बाहुबलियों को जिस दिन लग गया कि चुनावी संग्राम में वो क्यों नहीं? उसी दिन वो सियासत में उतर गए. लेकिन यह एहसास बना रहा है कि अगर जलवा बरकरार रखना है तो उन पर सरकार का हाथ होना जरूरी है. अगर हालात ऐसे नहीं बन पाते तो सशक्त विपक्षी दल की सदस्यता अपरिहार्य है ताकि दबाव पड़ने पर कोई कहने वाला हो कि उनके साथ अन्याय हो रहा है. नेताओं की अपनी मजबूरियां हैं. परिस्थितियां तय करती हैं कि उन्हें मौन रहना है या मुखर होना. कुछ ऐसी ही कहानी है मोकामा से विधायक अनंत सिंह की. जब अनंत सिंह का परिवार लालू यादव के नजदीक था तब भी वह नीतीश कुमार के करीब बने रहे. राजद छोड़ी तो जदयू का दामन थाम लिया और 2 बार विधायक बने. पिछले चुनाव में निर्दलीय चुने गए अनंत सिंह इस बार राजद से टिकट पाने में सफल रहे.  

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मोकामा से निर्दलीय विधायक अनंत सिंह के 2018 तक जदयू से रिश्ते खराब हो गए थे. कभी नीतीश के कृपापात्र माने जाने वाले अनंत सिंह पुलिस ने जेल में डाल दिया था. वह आरजेडी का दामन थामना चाहते थे लेकिन तेजस्वी राह का रोड़ा बन गए. यह वही दौर था जब तेजस्वी को लगने लगा था कि बिहार में आरजेडी के शासन में जो गलतियां हुई हैं उसे वह नहीं दोहराएंगे. लालू जेल में थे. ऐसे में उन्होंने अनंत सिंह की एंट्री रोक दी. लेकिन 2 साल बाद तेजस्वी के विचार बदल गए और उन्होंने अनंत सिंह को मोकामा से आरजेडी का टिकट दे दिया और जदयू ने वहां से एक अनाम नेता को मैदान में उतार दिया. क्योंकि एक-एक सीट और अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहे तेजस्वी के लिए अनंत सिंह जरूरी हो गए.  

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पहले अनंत के भाई थे राजनीति में 

कहानी शुरू होती है 90 के दशक में, जब अनंत सिंह की एंट्री राजनीति में नहीं हुई थी. उनके बड़े भाई दिलीप सिंह लालू के साथ थे. 1990 में वह जनता दल से और 1995 में आरजेडी के टिकट पर विधायक और मंत्री बने थे. यही वह दौर था जब लालू और नीतीश के रास्ते अलग होने लगे थे. 1994 में जॉर्ज फर्नांडीस ने जनता दल से अलग होकर समता पार्टी बनाई तो नीतीश बिहार में उसका चेहरा बन गए. पटना के पत्रकार राहुल कहते हैं कि राजनीति में पार्टी लाइन से हटकर भी रिश्ते होते हैं. ऐसा कुछ था नीतीश कुमार और अनंत सिंह के परिवार के साथ. नीतीश जब बाढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते तो आरजेडी में रहते दिलीप सिंह और उनका परिवार नीतीश के खिलाफ प्रचार नहीं करता. भूमिहार विरादरी से आने वाले अनंत सिंह के परिवार की अपने इलाके में अच्छी पकड़ थी जिससे नीतीश को लाभ मिलता.  

पहली बार ऐसे आई खटास

लेकिन 1999 में नीतीश बाढ़ लोकसभा से हारते-हारते बचे. इस बार दिलीप सिंह ने नीतीश कुमार के खिलाफ प्रचार किया था हालांकि अनंत सिंह साइलेंट रहे थे. कहते हैं कि इस मसले पर दिलीप सिंह और अनंत सिंह में भी मतभेद उभरे. लेकिन नीतीश इसे नहीं भूले. फिर 2000 का विधानसभा चुनाव आया. जानकार कहते हैं कि श्यामसुंदर सिंह धीरज मोकामा से जदयू के दावेदार थे. लेकिन जब उन्हें पता चला कि बेऊर जेल में बंद सूरजभान भी यहां से चुनाव लड़ना चाहते हैं तो उन्होंने कदम पीछे खींच लिया. कहा जाता है कि नीतीश ने सूरजभान की पीठ पर हाथ रख दिया. सूरजभान निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत गए. क्योंकि जदयू ने यहां से खानापूर्ति के लिए उम्मीदवार उतारा था. हालांकि 2004 में सूरजभान ने एलजेपी का दामन थाम लिया और बलिया (बिहार) से सांसद बन गए. 

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नीतीश के लिए ऐसे जरूरी हो गए अनंत सिंह 

हालात तेजी से बदल रहे थे. चुनाव हारकर दिलीप सिंह हाशिए पर चले गए. सूरजभान के परिवार से लोहा लेने के लिए जदयू को कोई कद्दावर उम्मीदवार चाहिए था. नीतीश कुमार ने अनंत सिंह को आगे कर दिया. अनंत सिंह लगातार 3 बार मोकामा से विधायक चुने गए. नीतीश और अनंत के रिश्ते 2015 तक ठीक रहे लेकिन अनंत के गुर्गों की कारगुजारियों से सुशासन बाबू की स्वच्छ छवि पर सवाल उठने लगे. नीतीश किसी तरह अनंत से छुटकारा पाना चाहते थे. पिछले साल अगस्त में एक वीडियो वायरल हुआ जो पूरे बिहार में चर्चा का केंद्र बन गया. इसमें अनंत सिंह का एक रिश्तेदार दो एके-47 के साथ दिख रहा था. कहा गया कि ये हथियार अनंत सिंह के हैं. पुलिस ने उनके बाढ़ स्थित लदमा गांव में छापा मारा. यहां से एके-47 बरामद की गई. इसी केस में अनंत सिंह ने बाद में सरेंडर कर दिया और फिलहाल पटना की बेउर जेल में बंद हैं. यहां से नीतीश और अनंत सिंह के रिश्तों में तल्खी आ गई. 

और महागठंधन का साथ 

अनंत ने महागठबंधन का रुख कर लिया. कांग्रेस ने उनकी पत्नी को मुंगेर से लोकसभा का टिकट दिया. उन्हें राजद का भी साथ मिला. लेकिन जदयू ने उनके खिलाफ सूरजभान के रिश्तेदार और कैबिनेट मंत्री ललन सिंह को मैदान में उतार दिया. ललन सिंह ने तब अनंत सिंह के धुर विरोधी और गांव के ही उनके रिश्तेदार विवेका पहलवान को साध लिया था. दोनों परिवारों में दशकों से चल रही अदावत का भरपूर फायदा मिला और नीलम सिंह 3 लाख वोट पाने के बावजूद ललन सिंह से चुनाव हार गईं. अब अनंत सिंह और विवेका सिंह का परिवार एक हो चुका है.   

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कैसे जदयू से बाहर हुए थे अनंत सिंह 

2015 विधानसभा चुनाव से पहले बाढ़ में एक युवक की हत्या कर दी गई थी और 3 युवकों को अगवा कर लिया गया था. परिजनों ने आरोप लगाया था कि अनंत सिंह के गुर्गों ने यह काम कराया है. उस वक्त तक अनंत सिंह जदयू से विधायक थे. मृतक युवक यादव जाति से आता था और लालू ने इसे मुद्दा बना दिया. चुनाव से पहले ही अनंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया. लालू के दबाव में नीतीश ने अनंत सिंह का टिकट तो काट दिया लेकिन सीट पर दावा बरकरार रखा. पटना के वरिष्ठ पत्रकार राहुल का कहना है कि लालू से संबंध बनाये रखने के लिए नीतीश कुमार ने अनंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया लेकिन दिल से नहीं निकाल पाए थे. उन्होंने कोई कद्दावर प्रत्याशी अनंत सिंह के खिलाफ नहीं उतारा. अनंत सिंह चुनाव जीत गए. जब वह जेल से बाहर आए तो नीतीश की कसीदे पढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

 

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