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बिहार चुनाव: पिछले 3 चुनावों में मांझी विधानसभा सीट पर हुआ सबसे कड़ा मुकाबला

2015 में इस सीट पर कांग्रेस के विजय शंकर दुबे ने जीत हासिल की थी. कांग्रेस उस समय आरजेडी और जेडीयू के साथ महागठबंधन का हिस्सा थी. दुबे ने सिर्फ 20.5 फीसदी वोट हासिल करते हुए एलजेपी के केशव सिंह को हराया था.

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सांकेतिक तस्वीर (पीटीआई)
सांकेतिक तस्वीर (पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार में विधानसभा चुनाव
  • 10 नवंबर को होगी मतगणना
  • कई सीटों पर कड़ा मुकाबला

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले पुराने गठबंधन टूटे हैं और नए गठबंधन बन गए हैं. बनते-बिगड़ते सियासी समीकरणों ने राजनीतिक विश्लेषकों के लिए नई चुनौती पैदा की है. इस बार बिहार चुनाव में ऐसा लग रहा है कि ज्यादातर सीटों पर मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के उम्मीदवारों के बीच होने की संभावना है. चुनावी ट्रेंड ये बताते हैं कि देश के किसी भी हिस्से में ज्यादातर दो या अधिकतम तीन उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होता है.

लेकिन चुनाव के आंकड़ों की मानें तो बिहार में एक सीट ऐसी है, जहां पिछले चुनावों में कम से कम आठ उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला हो चुका है. यहां जीत का अंतर इतना कम होता है कि कोई अनुमान लगाना मुमकिन नहीं होता. हम बात कर रहे हैं कि बिहार के सारण जिले की मांझी विधानसभा की, जो पटना से ब​मुश्किल 90 किलोमीटर दूर है.

ENOP फैक्टर

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अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा (TCPD) ने पार्टियों की प्रभावी संख्या (effective number of parties - ENOP) की गणना की है. इसके जरिये उन उम्मीदवारों की छंटनी की जाती है जो किसी विशेष चुनाव में महत्वपूर्ण वोट शेयर प्राप्त नहीं कर पाते.

अगर किसी सीट पर ज्यादातर वोट दो उम्मीदवारों के बीच बंट जाते हैं तो ENOP का वैल्यू दो होगा. अगर ENOP का वैल्यू ज्यादा है तो इसका मतल​ब है कि ज्यादा उम्मीदवार मुकाबले में रहे और उन्होंने कुल वोटों में से महत्वपूर्ण वोट शेयर हासिल किया. ENOP की गणना कैसे की जाती है, आप यहां देख सकते हैं.

मांझी विधानसभा में अब तक 16 बार चुनाव हुए हैं, जिनमें से कांग्रेस ने सात बार और जेडी(यू) ने तीन बार जीत दर्ज की है. पिछले दो बार से इस सीट पर मुकाबला काफी कड़ा हो गया है.

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2005 में इस सीट पर ईएनओपी 2.86 था, जिसका म​तलब है कि मुकाबला तीन से भी कम उम्मीदवारों के बीच था. 2010 में ENOP 8 तक चला गया, और 2015 में यह 9 था. पिछले 15 वर्षों में बिहार की किसी अन्य सीट पर इतना कड़ा मुकाबला नहीं हुआ.

 
जीत के लिए वोट प्रतिशत
 
2005 में सिर्फ दो प्रमुख उम्मीदवार थे, जब जेडीयू के गौतम सिंह ने 42 फीसदी वोट हासिल किया था. उन्होंने कांग्रेस के रवींद्र नाथ मिश्रा को हराया था, जिन्हें 40.81 फीसदी वोट मिले थे. इस चुनाव के बाद से मुकाबला ज्यादा प्रतियोगियों के बीच होने लगा. 2010 में जेडीयू के गौतम सिंह ने आरजेडी के हेम नारायण सिंह को 7,900 (7 फीसदी) वोटों से हराया. जीत का अंतर तीसरे नंबर पर रहे ओमप्रकाश प्रसाद को मिले वोटों के बराबर था, जो कि निर्दलीय उम्मीदवार थे.

2015 में इस सीट पर कांग्रेस के विजय शंकर दुबे ने जीत हासिल की थी. कांग्रेस उस समय आरजेडी और जेडीयू के साथ महागठबंधन का हिस्सा थी. दुबे ने सिर्फ 20.5 फीसदी वोट हासिल करते हुए एलजेपी के केशव सिंह को हराया था. केशव सिंह को 14.4 फीसदी वोट मिले थे. इस जीत का अंतर एक निर्दलीय उम्मीदवार रवीन्द्र नाथ मिश्रा को मिले वोटों के बराबर था, जो 7वें नंबर पर थे.

इस बार मांझी सीट पर 3 नवंबर को दूसरे चरण में मतदान होंगे. इसलिए इस सीट से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की सूची 19 अक्टूबर को जारी होगी. लेकिन जेडीयू की माधवी सिंह और सीपीआई (एम) के सत्येंद्र यादव की उम्मीदवारी घोषित हो चुकी है. इस बार जेडीयू का बीजेपी के साथ गठबंधन में है तो सीपीआई (एम) महागठबंधन का हिस्सा है. पिछले चुनाव में सत्येंद्र यादव को करीब 12.6 फीसदी वोट मिले थे, जो कांग्रेस के विजेता उम्मीदवार से सिर्फ 8 फीसदी कम थे.

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क्या ये मुकाबला वास्तविक है?

अशोका यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर और TCPD के सह-निदेशक गिल्स वर्नियर्स का मानना है कि कड़ा मुकाबला कम वोट शेयर हासिल करके भी जीतने में मदद करता है क्योंकि कुल वोट कई उम्मीदवारों के बीच बंट जाते हैं.

उन्होंने कहा, “पार्टी सिस्टम में बिखराव को रोकने के लिए ये ​प्रणाली अपनाई गई है कि जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे, वह विजेता होगा. हमारे संस्थापकों ने सोचा था कि इससे प्रमुख दावेदारों पर दबाव कम होगा और गंभीर उम्मीदवारों की संख्या पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए उन्हें बहुमत नहीं, बल्कि सबसे ज्यादा वोट हासिल करना होगा.”

वर्नियर्स का मानना है कि “इसका एक अनचाहा नुकसान ये है कि यह स्टार दावेदारों के लिए भी प्रतियोगिता की सीमा को कम कर देता है. बढ़े हुए मुकाबले में उनकी जीत आसान हो जाती है, क्योंकि बचे हुए वोट विपक्षियों में बंट जाते हैं.”

चुनाव विश्लेषण और पोल सर्वे एजेंसी सीवोटर फाउंडेशन के संस्थापक यशवंत देशमुख के मुताबिक, ज्यादा कड़े मुकाबले वाली ऐसी सीटों पर विजेता उम्मीदवारों का कम वोट शेयर आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि भारत में जीतने के लिए हासिल किया जाने वाला वोट शेयर हमेशा कम रहा है.

इंडिया टुडे से बात करते हुए देशमुख ने कहा, “जीत के लिए कम वोट शेयर की सीमा इस चुनावी सिस्टम की बुनियादी खामी है. भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में आजादी के बाद से ही कभी द्विध्रुवीय चुनाव नहीं हुआ. राज्य और विधानसभा स्तर के चुनावों में जीतने की सीमा 30 फीसदी वोट शेयर के आसपास रही है. बिहार इससे अलग नहीं है. व्यापक रूप से देखें तो बिहार में मुकाबला द्विध्रुवीय दिखता है, लेकिन यहां हमेशा हर सीट पर बहु-कोणीय मुकाबला होता है.”

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देशमुख ने कहा, “चुनाव के लिहाज से बिहार बहुत हद तक तमिलनाडु की तरह है. फर्क सिर्फ इतना है कि तमिलनाडु में विभिन्न जाति-आधारित पार्टियां DMK या AIADMK के साथ हो जाती हैं और अंततः मुकाबला द्विध्रुवीय हो जाता है. लेकिन चूंकि बिहार में ऐसी स्थिति नहीं है कि जाति-आधारित पार्टियां एक छतरी के नीचे एकजुट हों. उनके लिए अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना प्रतिष्ठा का मामला है.”

उनके मुताबिक, “बिहार में वोटकटवा उम्मीदवारों के कारण मुकाबला और कड़ा है. मान लीजिए कि एक उम्मीदवार किसी एक जाति से है और दूसरा उम्मीदवार किसी दूसरी जाति से है. तो दूसरा चुनाव जीतने के लिए पैसा देकर पहली जाति के एक और उम्मीदवार को खड़ा कर सकता है. ये उम्मीदवार पहले वाले का वोट काटने का काम करेगा और दूसरे की जीत की संभावना बढ़ जाएगी.”

 

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