बंगाल में जिस समय नक्सलवाद पनप रहा था उसी दौरान बिहार की निचली जातियों में असंतोष के स्वर मुखर होने लगे थे. पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी में 1967 में जब कानू सान्याल इसकी स्थापना कर रहे थे उस समय बिहार में कई जातीय सेनाएं अस्तित्व में आ चुकी थीं. लेकिन नक्सल आंदोलन की धार ज्यादा उग्र थी. धीरे-धीरे यह बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र तक फैल गया.
भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी आंदोलन ने भूमिहीन किसानों की मांगों को मजबूती दी जिसने भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल दी. नक्सलवादी और माओवादी दोनों ही आंदोलन हिंसा पर आधारित हैं. लेकिन दोनों में फर्क है. नक्सलवादी आंदोलन विकास के अभाव और गरीबी से निकला है जबकि माओवाद चीनी नेता माओत्से तुंग की राजनीतिक विचारधार से प्रभावित है. दोनों ही आंदोलन के समर्थक भूखमरी, गरीबी और बेरोजगारी से आजादी की मांग करते हैं.
आजादी के बाद बिहार में बड़ी कोशिशों के बाद भी जमींदारी प्रथा का उन्मूलन पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया. जिनके पास जमीनें थीं उनके पास खूब थीं, बाकी मजदूर बनने को मजबूर थे. जमींदारों के अत्याचार की कहानियां भी खूब थीं. कई जगहों पर ऐसा देखा गया था कि जमीन किसी और को दे दी गई है लेकिन उस पर कब्जा जमींदार का बना ही रहा था.
जो बोएगा वही काटेगा
विनोबा भावे ने जब भूदान आंदोलन चलाया तो आरोप लगे कि जमीदारों ने वो जमीनें दान कर दीं जो परती थीं या जो खेती के लिए मुफीद नहीं थीं.
सरकार में बड़ी जातियों का प्रभुत्व था. कहा जाता है कि अपनी जमीनें बचाने के लिए कई लोग राजनीति में कूद पड़े थे. सत्ता की हनक में प्रशासन उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता था. ऐसे में अंसतोष की आग बढ़ती जा रही थी. कई जातीय सेनाएं बन गई थीं जो अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रही थीं लेकिन इसे बड़े आंदोलन में बदला भाकपा माले (लिबरेशन) ने, बाद में उसकी जगह एमसीसी (माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर) ने ले ली. इन संगठनों ने ऐलान किया जो बोएगा वही काटेगा.
उन्होंने कई जगहों पर खेतों पर लाल झंडे लगाने शुरू कर दिए. वह मजदूरों-छोटे किसानों को आगे करते बाद में जिन पर जमीदारों का कहर टूटता. अगर वह एमसीसी की बात नहीं मानते तो उसकी सजा भी उन्हें ही मिलती. खूनी जंग की गवाह बनी जहानाबाद की धरती जहां दोनों मजबूत स्थिति में थे.
सवर्ण बिहार छोड़कर जाने लगे थे
90 के दशक में हालात बुरे हो गए थे. नरसंहारों का दौर शुरू हो गया था. सवर्ण बिहार छोड़कर जाने लगे थे. नरसंहार के बाद कई लोग इतनी हिम्मत भी नहीं जुटा पाते थे कि वह अपने परिजनों के अंतिम संस्कार में जाएं. हजारों एकड़ जमीन पर लाल झंडा फहरा दिया गया था. यह जमीन परती पड़ी हुई थी. आरोप यह भी लगते थे कि लालू की सरकार को कम्युनिस्टों का समर्थन था इसलिए भी उन पर कोई एक्शन नहीं हो रहा था. धीरे-धीरे सवर्ण भी एकजुट होने लगे.
1994 में मध्य बिहार के भोजपुर जिले के बेलऊर में ब्रह्मेश्वर मुखिया ने रणवीर सेना की स्थापना की. सवर्णों से अपील की गई कि जिनके पास लाइसेंसी हथियार हैं वो लोग संगठन से जुड़ें. लेकिन बाद में अवैध हथियारों का जखीरा भी जमा होने लगा. कहा जाता है कि उस समय भोजपुर में आर्थिक नाकेबंदी लगी हुई थी, कई गांवों में फसलें जला दी गई थीं. इससे सवर्ण किसानों में गुस्सा था जिसने रणवीर सेना की जमीन तैयार की.
1999 में शंकरबिघा में 23 और नारायणपुर में 11 दलितों की हत्या कर दी गई. आरोप रणवीर सेना पर लगा. इसका प्रतिकार होना तय था. 18 मार्च 1999 की रात जहानाबाद के सेनारी गांव को घेर लिया गया. अगड़ी जाति के 34 लोगों की गला रेतकर हत्या कर दी गई. इस मामले में कई गिरफ्तारियां हुईं. महीनों तक नेताओं के आने जाने का सिलसिला जारी रहा. प्रशासन कथित तौर पर मुस्तैद था कि इसके प्रतिकार में कहीं इससे बड़ी घटना न हो जाए. मुस्तैदी का कुछ दिनों तक असर भी पड़ा लेकिन बदले की आग में जल रहे विरोधी अवसर की तलाश में थे.
30 नवंबर की रात को जहानाबाद के लक्ष्मणपुर बाथे गांव को घेर लिया गया और 61 दलितों की हत्या कर दी गई. इसका आरोप रणवीर सेना पर लगा. इसको छोड़कर कई नरसंघार हुए जिसमें गरीब दलित और गरीब सवर्ण ही मारे गए क्योंकि रणवीर सेना ने ऐलान कर रखा था कि अगर माले या एमसीसी ने एक मारे तो वह उनके 10 लोगों को मारेंगे.
रणवीर सेना के मुखिया ब्रह्मेश्वर मुखिया की जून 2012 में हत्या कर दी गई, जानकारों का कहना है कि रणवीर सेना मुकाबला करने में कामयाब रही लेकिन इसमें दोनों ओर से सैकड़ों लोग मारे गए और जो मारे गए वो गरीब लोग थे चाहे वो सवर्ण हों या दलित या पिछड़े. अब ऐसे उग्र संगठन बिहार में हाशिए पर हैं और जनता को भी एहसास हो चुका है कि हिंसा से कुछ हासिल होने वाला नहीं है.