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सूरजभान सिंह: वो बाहुबली, जिसके अपराध की तपिश से सिहर उठा था बिहार

5 मार्च 1965 को गंगा किनारे बसे पटना जिले के मोकामा में जन्मे सूरजभान सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. अपराध की सीढ़ियां सूरजभान ने इतनी तेजी से चढ़ीं कि लोग उसके नाम से ही कांपने लगे. रंगदारी, अपहरण और हत्या जैसे अपराध उसके लिए आम हो चुके थे.

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बिहार के बाहुबली नेता सूरजभान सिंह
बिहार के बाहुबली नेता सूरजभान सिंह
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार के बाहुबली नेता रह चुके हैं सूरजभान
  • साल 2000 में 26 मुकदमे दर्ज थे
  • फिलहाल चुनाव लड़ने पर लगी हुई है रोक

बिहार में बात जब राजनीति की आती है तो कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव और नीतीश कुमार की बात होती है. लेकिन अगर डॉन, बाहुबलियों और अपराधियों का जिक्र न हो तो बिहार की सियायत अधूरी कहलाएगी. शहाबुद्दीन, अनंत सिंह जैसे दबंगों के बीच एक बाहुबली नेता ऐसा भी रहा, जिसके गुनाहों का सूरज उसकी उम्र के साथ चढ़ता चला गया.

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5 मार्च 1965 को गंगा किनारे बसे पटना जिले के मोकामा में जन्मे सूरजभान सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. अपराध की सीढ़ियां सूरजभान ने इतनी तेजी से चढ़ीं कि लोग उसके नाम से ही कांपने लगे. रंगदारी, अपहरण और हत्या जैसे अपराध उसके लिए आम हो चुके थे.

मोकामा के एक छोटे से गांव की गलियों में खेलते-कूदते बड़े हुए सूरजभान सिंह के पिता एक व्यापारी सरदार गुलजीत सिंह की दुकान पर नौकरी करते थे. इसी से घर चलता था. उनके बड़े भाई की नौकरी सीआरपीएफ में लगी तो परिवार को बड़ा सहारा मिला. पिता सोचते थे कि लंबी-चौड़ी कद काठी वाला छोटा बेटा भी फौज में जाएगा. 

लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था. सूरजभान की किस्मत की लकीरें तो उसे सियासत और जुर्म की उस दुनिया में ले गईं, जहां उसके नाम का सिक्का चलता था. सूरजभान पहले बाहुबली, फिर विधायक और इसके बाद सांसद बने. शुरुआत में सूरजभान को ऐसे लोगों की संगत मिली, जिनके साथ मिलकर पहले उसने रंगदारी और फिर वसूली करनी शुरू कर दी.

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कुछ ऐसे शुरू हुई कहानी

80 के दशक में सूरजभान छोटे-मोटे अपराध करते थे. लेकिन नब्बे का दशक आते-आते उनके क्राइम का ग्राफ तेजी से बढ़ने लगा. उन्हें आगे बढ़ाने का श्रेय दो लोगों को जाता है कांग्रेस के विधायक और मंत्री रह चुके श्याम सुंदर सिंह धीरज और अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह को.

दरअसल कभी श्याम सुंदर के लिए बूथ कब्जाने वाले बाहुबली दिलीप सिंह ने उन्हें चुनावी रण में न सिर्फ चुनौती दी बल्कि जीते और लालू प्रसाद यादव की सरकार में मंत्री बन गए. दिलीप सिंह को धीरज ने ही पाला-पोसा था. ऐसे में उनके पाले-पोसे शख्स ने उन्हें ही चुनावी मैदान में शिकस्त दे दी, इस बात से वे बौखला गए. इस दौरान उनकी नजर पड़ी दिलीप गैंग के ही एक लड़के पर, जिसमें जुर्म की दुनिया में छा जाने का भूत सवार था. वो लड़का सूरजभान ही था.

जब दिलीप मंत्री बनकर वाइट कॉलर जॉब में आ गए तो उन्हें सियासत भी करनी थी और रुतबा भी बरकरार रखना था. इस दौरान सूरजभान ने उस गुलजीत सिंह से भी रंगदारी मांग ली, जो उनकी आंखों के सामने बड़ा हुआ था और जिनके यहां पिता नौकरी करते थे. गुलजीत इस बर्ताव से दंग थे. उन्होंने सूरज के पिता को बताया. पिता ने बेटे को समझाने की खूब कोशिश की लेकिन तब तक 'गंगा में बहुत पानी बह चुका था'.

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जुर्म की आंच में परिवार ही खाक हो गया

बेटे ने जब कदम पीछे हटाने से मना कर दिया तो पिता को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई. कहां तो वे बेटे को फौज में भेजने का सपना देख रहे थे और कहां बेटा जुर्म की दुनिया में खो चुका था. उन्होंने गंगा में कूदकर आत्महत्या कर ली. कहा जाता है कि इस घटना के कुछ दिन बाद सीआरपीएफ में काम करने वाले उनके बड़े भाई ने भी मौत को गले लगा लिया.

सिर पर दिलीप सिंह का हाथ

अब सूरजभान के सिर पर दिलीप सिंह का हाथ था. उसके मोकामा के बाहर भी जड़ें जमाने की कोशिशें तेज कर दीं. इस दौरान उसकी दुश्मनी नाटा सरदार से हुई. दोनों तरफ जमकर खून-खराबा हुआ. बेगूसराय में एक और डॉन था अशोक रॉय उर्फ अशोक सम्राट. उसने भी मोकामा में सूरजभान पर हमला बोला. इस दौरान सूरजभान के पैर में गोली लगी. जान तो बच गई लेकिन चचेरा भाई और शूटर मारे गए. बाद में कुछ वजहों से दिलीप और सूरजभान के रिश्तों में खटास आ गई. इस दौरान श्याम सुंदर धीरज को भी एक बाहुबली की जरूरत थी. सूरजभान ने धीरज का हाथ पकड़ा जरूर लेकिन अब उनके सपने बड़े हो चुके थे. 

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साल 2000 में बने विधायक फिर सांसद

सूरजभान ने मोकामा से साल 2000 में तत्कालीन बिहार सरकार में मंत्री दिलीप सिंह के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीतकर निर्दलीय विधायक बन गए. उस वक्त पुलिस रिकॉर्ड में उन पर उत्तर प्रदेश और बिहार में कुल 26 मामले दर्ज थे. इसके बाद साल 2004 में वह रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट से बलिया (बिहार) के सांसद बने. कहा तो ये भी जाता है कि वे कभी नीतीश कुमार के संकटमोचक भी थे.

अपराधों की लंबी फेहरिस्त

जनवरी 1992 में बेगूसराय के मधुरापुर में रहने वाले रामी सिंह की हत्या हुई. तड़के 5 बजे रामी सिंह पर चार लोगों ने गोलियां चलाकर मौत की नींद सुला दिया. इसमें सूरजभान का भी नाम आया और लोअर कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई. 

पूर्व मंत्री बृज बिहारी की हत्या से दहल गया था राज्य

3 जून 1998 की शाम थी. बृज बिहारी प्रसाद राबड़ी देवी सरकार में साइंस एंड टेक्नोलॉजी मंत्री थे. इलाज के लिए उन्हें पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया था. जब वह पार्क में शाम को टहल रहे थे तो 6-7 हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं. गोलियां चलाने वालों में गोरखपुर का नामी डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला भी था. इस घटना ने पूरे प्रदेश को दहलाकर रख दिया. मामले में सूरजभान को पुलिस ने आरोपी बनाया. खूब बवाल मचा और जांच सीबीआई को सौंपी गई. साल 2009 में निचली अदालत ने सूरजभान समेत सारे अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा दी. हालांकि बाद में सूरजभान को बरी कर दिया गया. 

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उमेश यादव हत्याकांड

साल 2003 में दिनदहाड़े मोकामा के पूर्व पार्षद और अपराधी उमेश यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. उमेश के परिजनों ने सूरजभान पर इल्जाम लगाया. लेकिन मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद सूरजभान को बरी कर दिया गया. 

हालांकि ये तो ऐसे मामले हैं, जो कानून और पुलिस की निगाहों में आए. लेकिन कुछ अपराधों का चिट्ठा तो कभी खुला ही नहीं. कभी लोग सूरजभान के नाम से डरते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. सूरजभान के चुनाव लड़ने पर रोक है. हालांकि उनकी पत्नी वीणा देवी मुंगेर की सांसद रह चुकी हैं. उनके बेटे आशुतोष सिंह की साल 2018 में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. 

 

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