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बिहार: कैसे हुआ था सम्राट कामदेव का एनकाउंटर? एसपी की पत्नी ने सुनाई कहानी

रीता वर्मा लोकसभा सांसद भी रह चुकी हैं. उन्होंने बताया कि कामदेव सिंह दबंग था. इसलिए सारे ठेके उसके पास ही जाते थे. उस जमाने में वो नेपाल से स्मगलिंग का काम करता था. इंटरपोल भी उसके पीछे पड़ी थी.

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जानें, कामदेव सिंह के एनकाउंटर की कहानी (फाइल फोटो)
जानें, कामदेव सिंह के एनकाउंटर की कहानी (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कामदेव सिंह गंगा नदी में कूद गए थे
  • पैर के तलवे बुरी तरह से फट गए थे
  • कामदेव सिंह के एनकाउंटर के लिए चुपचाप गई थी पुलिस

बेगूसराय के सम्राट कामदेव सिंह की मौत को लेकर आज भी विवाद होता है. रिकॉर्ड के मुताबिक उसकी मौत पुलिस एनकाउंटर में हुई थी, हालांकि उनके पुत्र राजकुमार सिंह पुलिस पर हत्या का आरोप लगाते हैं. ये सवाल आज भी कायम है कि कामदेव सिंह पर कोई गोली चलाई गई या उनकी मौत गंगा में डूबने से ही हुई. Aajtak.in ने इस मुद्दे पर बात की तत्कालीन पुलिस अधीक्षक शहीद रणधीर प्रसाद वर्मा की पत्नी रीता वर्मा और कामदेव सिंह के पुत्र राजकुमार से.
 
रीता वर्मा लोकसभा सांसद भी रह चुकी हैं. उन्होंने बताया कि कामदेव सिंह दबंग था. इसलिए सारे ठेके उसके पास ही जाते थे. उस जमाने में वो नेपाल से स्मगलिंग का काम करता था. इंटरपोल भी उसके पीछे पड़ी थी. मेरे पति की पोस्टिंग ही बेगूसराय में अपराध पर रोक लगाने के लिए हुई थी. वो अपराधियों के पीछे पड़ गए. कामदेव सिंह को पकड़ने के लिए उन्होंने तीन-चार बार छापेमारी भी की. लेकिन दिक्कत ये होती थी कि पुलिस के लोग ही जानकारी लीक कर देते थे. इसलिए अगली बार जब उन्होंने रेड प्लान की तो किसी को जानकारी नहीं दी. उन्होंने डीएसपी तक को इस बात की जानकारी नहीं दी और अपने साथ केवल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और उसके कमांडेंट को रखा. 

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पूर्व सांसद बताती हैं कि इस बात की जानकारी मुझे भी नहीं थी. मैं कभी-कभी उनको मजाक में कहती भी थी कि आपको अपनी पत्नी पर भी भरोसा नहीं है. आपको लगता है कि मैं भेद खोल दूंगी. खैर, मेरे पति अंधेरा होने के बाद रेड के लिए निकले. उस समय गांव में कोई दावत का प्रोग्राम था. कामदेव सिंह के गांव में होने पर अक्सर ही इस तरह के प्रोग्राम का आयोजन किया जाता था. कामदेव सिंह अक्सर रुकने के लिए ऊंचाई वाले स्थान पर चला जाता था, जिससे उसके पास सतर्क रहने का मौका रहे. इसके साथ ही खुद को गार्ड करने के लिए वो किसी ना किसी को खड़ा कर देता था. उस दिन भी एक 13-14 साल के लड़के को गार्ड करने के लिए खड़ा किया गया था. लड़के को सिर्फ यह देखना था कि कोई आ तो नहीं रहा है. लेकिन अंधेरा होने की वजह से लड़के को भी पता नहीं चला.

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रीता वर्मा के मुताबिक, 'रेड के लिए जो टीम गई थी वो बिल्कुल शांत तरीके से गई. लाइट बंद कर दी गई थी, गाड़ियां काफी पहले ही रोक दी गई थी. पुलिस और सीआरपीएफ की टीम काफी दूर तक पैदल चलकर गांव के अंदर दाखिल हुई. काफी देर तक लड़के को पता नहीं चला कि उनकी तरफ कोई बढ़ रहा है. अंत समय में जैसे ही लड़के को इस बात का अहसास हुआ वो कामदेव सिंह की तरफ दौड़ा. तब तक कामदेव सिंह अलर्ट हो गया. वो गंगा नदी की तरफ भागा. पुलिस और सीआरपीएफ की टीम भी उसके पीछे भागी. मेरे पति एथलीट हुआ करते थे. इसलिए काफी तेजी से वो पीछे भागे. अंत में कामदेव सिंह ने देखा कि अब आगे भागने के लिए कोई रास्ता नहीं है तो वो गंगा में कूद गया.  

क्या पुलिस ने कामदेव पर गोली चलाई थी? इस सवाल के जवाब में रीता वर्मा ने कहा कि उसे रुकने के लिए कहा गया था, लेकिन कामदेव सिंह भागता रहा, जिसके बाद पीछे से गोली चलाई गई थी. आखिरकार भागने का कोई मौका नहीं देखकर वो गंगा में कूद गया. रात में लाश ढूंढ़ना बहुत मुश्किल था. लाश शायद बांध में लगे पत्थरों के बीच फंस गई थी, इसलिए ऊपर भी नहीं आई. आखिरकार जाल मंगवाया गया और दूसरे दिन कामदेव सिंह की लाश को निकाला गया.  

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उन्होंने बताया कि बाद में जब कामदेव सिंह का पोस्टमॉर्टम हुआ तो पता चला कि उसके पैर के तलवे बुरी तरह से फट गए थे. क्योंकि वो काफी ऊंचाई से कूदा था और पत्थर से टकराने से उसका पैर फट गया था. इसके साथ ही काफी गहरी अंदरूनी चोटें आई थीं. गांववालों के बीच कामदेव सिंह 'रॉबिन हुड' के तौर पर भी जाना जाता था. क्योंकि वो खुद तो बड़े-बड़े ठेके लेता ही था, समर्थकों को भी ठेके दिलवाता था. उस दौर में बेगूसराय में वर्चस्व की लड़ाई जोरों पर थी. मुख्य तौर पर यह लड़ाई भूमिहार समुदायों के बीच की थी. इस समुदाय के कई लोग राजनीतिक संरक्षण पाने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे तो कुछ लोग कांग्रेस से. इसलिए लड़ाई भूमिहार समुदायों के बीच की ही थी. 

हालांकि पुलिस एनकाउंटर को लेकर कामदेव सिंह के बेटे राजकुमार सिंह कहते हैं कि उनका कोई एनकाउंटर नहीं हुआ था. बल्कि किसी व्यक्ति के इशारे पर उनको गलत तरीके से निशाना बनाकर उनकी हत्या की गई थी. राजकुमार सिंह ने दावा किया कि कामदेव सिंह की हत्या दिन के उजाले में की गई थी, रात में नहीं.   

उन्होंने कहा कि जिस दिन मेरे पिता की हत्या हुई थी वो सरकारी काम पर थे. वो गंगा नदी के तट पर बांध बनाने का काम करवा रहे थे. लेकिन गलत निशानदेही पर वो पुलिस का शिकार बन गए. आरोप लगाया गया कि उनकी एक बड़ी टीम थी, लेकिन पुलिस ने क्या उनकी हत्या के बाद किसी अन्य व्यक्ति को दबोचा? क्या किसी सरगने का खुलासा हुआ? नहीं. क्योंकि उन्हें राजनीतिक तरीके से निशाना बनाया गया. 

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गांजा तस्करी के आरोप पर राजकुमार सिंह ने कहा कि उस दौर में नेपाल में गांजे की खेती पूरी तरह से वैध थी. दूसरी बात वो हर तरह के नशे के खिलाफ थे. उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी चाय तक नहीं पी. उनके जानने वाले लोग भी कभी उनके सामने बीड़ी, सिगरेट या तंबाकू का सेवन नहीं करते थे. ऐसे में यह कहना कि वह गांजा की तस्करी करते थे, पूरी तरह बेबुनियाद है. वो ठेकेदारी का काम करते थे. टेपरिकॉर्डर, कपड़े आदि मंगवाने का काम करते थे.

 

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