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वोट देने क्यों नहीं निकलते बिहार के मतदाता?, क्या कोरोना संकट भी डालेगा असर?

टीएन शेषन के चुनाव सुधार के बाद बिहार में निचले तबके के लोगों ने खूब वोट किया और 1995 के चुनाव में लालू यादव को जीत मिली. लालू ने राज्य में सत्ता का समीकरण तो बदल दिया लेकिन आर्थिक विकास कहीं नहीं था. इस तथ्य ने उन लोगों को नाराज किया जिन्हें लालू ने सियासी तौर पर ताकतवर बनाया था.

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बिहार में क्यों कम होता है मतदान (सांकेतिक-पीटीआई)
बिहार में क्यों कम होता है मतदान (सांकेतिक-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • टीएन शेषन के चुनाव सुधार से 90 के दशक में बढ़ी वोटिंग
  • 3 चुनावों में वोटिंग का औसत 51% से थोड़ा ही ज्यादा रहा
  • 2010 में करीब 53% तो 2015 के चुनाव में 56.6% वोट पड़े
  • बिहार में वोटिंग का प्रतिशत कुछ खास नहीं बढ़ेगाः देशमुख

बिहार के बारे में कहा जाता है कि यह राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश है और यहां की जनता राजनीति में खासतौर से रुचि लेती है. अगर ऐसा है तो क्या वजह है कि बिहार में मतदान का प्रतिशत सबसे खराब रहता है? यहां की जनता वोट देने क्यों नहीं निकलती?

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इंडिया टुडे की डेटा इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) ने चुनाव आयोग के आंकड़ों के आधार पर बिहार में वोटर टर्नआउट का विश्लेषण किया और पाया कि बिहार में राजनीति को लेकर जो अति-उत्साह दिखाई देता है वह ईवीएम में दर्ज नहीं होता, क्योंकि लोग वोट देने नहीं जाते.  

बिहार में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हुए मतदान का औसत 51 फीसदी से थोड़ा ज्यादा रहा है, जिसका अर्थ है कि राज्य के लगभग आधे मतदाताओं ने अपनी लोकतांत्रिक ताकत का प्रयोग नहीं किया.

बिहार में मतदान का सुनहरा दौर
1990, 1995 और 2000 के विधानसभा चुनावों को बिहार का सुनहरा दौर माना जा सकता है क्योंकि इन चुनावों में सबसे ज्यादा वोटिंग हुई थी. 1990 के चुनाव में 62.04 फीसदी, 1995 में 61.8 फीसदी और 2000 में 62.5 फीसदी मतदान हुआ था.

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फरवरी 2005 में किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें नहीं मिलीं, नतीजतन उसी साल अक्टूबर-नवंबर में फिर से चुनाव हुए थे. फरवरी 2005 में हुए चुनाव में सिर्फ केवल 46 फीसदी वोट पड़े. इसके बाद नवंबर में दोबारा हुए चुनाव में 45.8 फीसदी वोटिंग हुई​ थी.

हालांकि, उसके बाद मतदान प्रतिशत में सुधार हुआ है लेकिन ये अब भी काफी कम है. 2010 के चुनावों में करीब 53 फीसदी वोट पड़े थे. 2015 के चुनाव में 56.6 फीसदी वोट पड़े.

अगर हम देश के सभी राज्यों में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हुए मतदान का औसत निकालें तो बिहार 52 फीसदी के साथ सबसे नीचे है. उत्तर प्रदेश का औसत 55 फीसदी और जम्मू-कश्मीर का 57 फीसदी है. बाकी सभी राज्यों में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हुए मतदान का औसत 60 फीसदी से ज्यादा है.

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त्रिपुरा (91), मेघालय (88), सिक्किम (81), पुडुचेरी (86) और मणिपुर (84) जैसी छोटी विधानसभाओं के चुनाव में वोटिंग का प्रतिशत सबसे ज्यादा है. बड़े राज्यों में पश्चिम बंगाल (83), असम (79) और आंध्र प्रदेश (75) चार्ट में शीर्ष पर हैं.

21वीं सदी में बिहार
आंकड़ों से पता चलता है कि 2000 के चुनाव के बाद बिहार में वोटिंग 15 फीसदी तक कम हो गई. 1990 के दशक में 60 फीसदी से ज्यादा मतदान वाले राज्य में आखिर हुआ क्या? चुनाव विश्लेषक और पोल सर्वे एजेंसी सीवोटर के संस्थापक यशवंत देशमुख का दावा है कि बिहार में कम मतदान होने के कई कारण हैं.
 
देशमुख का कहना है कि बिहार में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद होने लगा. “1995 से पहले बिहार में मतदान के आंकड़े राज्य में हुए मतदान की सही तस्वीर पेश नहीं करते थे. 1995 से पहले मतदान कम होता था क्योंकि समाज में निचले त​बके के लोग प्रभावी तौर पर मतदान नहीं कर पाते थे. ऊंची जातियों का  दबदबा और बूथ कैप्चरिंग जैसी चीजें उन्हें वोटिंग से दूर करने में सफल हो जाती थीं.”

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टीएन शेषन ने अकेले ही भारत में चुनाव कराने के तरीकों को बदल दिया. टीएन शेषन की देख-रेख में हुए 1995 के चुनाव एक अहम पड़ाव साबित हुए. उनके प्रयासों के चलते बिहार में पहली बार बूथ कैप्चरिंग पर पूरी तरह रोक लग गई. लालू प्रसाद यादव सोच रहे थे कि वे चुनाव जीत नहीं सकेंगे, लेकिन जब नतीजा आया तो लालू यादव को एहसास हुआ कि शेषन ने क्या किया है. निचले तबके के लोगों ने खूब वोट किया और लालू यादव को जीत मिली.”

देशमुख कहते हैं, “दूसरा अहम पड़ाव 1999 के चुनाव में ईवीएम के प्रयोग की शुरुआत का था. ईवीएम आने के ​बाद बूथ कैप्चरिंग पर लगाम लग गई.”
 
पिछड़े तबके का उभार
यशवंत देशमुख का कहना है कि चुनाव सुधारों के बाद राज्य की राजनीति में बदलाव आया और लालू प्रसाद यादव ने एक नई राजनीति की शुरुआत की. उन्होंने कहा, “1995 के चुनाव में लालू प्रसाद यादव ने 'गरीब' और पिछड़े लोगों की राजनीति की शुरुआत की और इस तबके को उनके वोटों की ताकत का एहसास कराया. लालू ने न सिर्फ पिछड़े तबके को ताकतवर मतदाता बनाया, बल्कि उन्होंने खुद को सामाजिक न्याय के मसीहा के रूप में पेश करके ऊंची जातियों के वर्चस्व को तोड़ दिया. ज्यादा संख्या में लोगों की भागीदारी से बिहार में मतदान प्रतिशत भी बढ़ गया.”

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हालांकि, इसी दौरान बिहार ने कई चुनावों का सामना किया, लेकिन कोई आर्थिक बदलाव नजर नहीं आया, जिससे मतदाताओं में असंतोष व्याप्त हुआ. 1995 से लेकर 2000 के बीच बिहार के लोगों ने 5 चुनावों (3 लोकसभा और 2 विधानसभा) का सामना किया. इसलिए जो नए वोटर चुनावी प्रक्रिया में शामिल हुए थे, उनकी चुनाव में दिलचस्पी कम हुई.

आर्थिक बदलाव नहीं आने से निराशा
इसके अलावा, लालू ने राज्य में सत्ता का समीकरण तो बदल दिया लेकिन आर्थिक विकास कहीं नहीं था. इस तथ्य ने उन लोगों को नाराज किया जिन्हें लालू ने सियासी तौर पर ताकतवर बनाया था.

देशमुख का कहना है कि लालू ने ऊंची जातियों के वर्चस्व को कम किया, लेकिन कई बार वोट करने के बाद भी कोई आर्थिक बदलाव नहीं आया तो लोगों ने खुद को ठगा महसूस किया, क्योंकि उनसे बदलाव का वादा किया गया था. उन्होंने वोट देना बंद कर दिया. लालू ने लोगों को ताकतवर बनाया, लेकिन लोगों ने उसी ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया.
 
जैन विश्वविद्यालय, बेगलुरु के प्रो-वाइस-चांसलर और राजनीतिक विश्लेषक संदीप शास्त्री कहते हैं, “अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में पार्टियों की ओर से राजनीतिक गोलबंदी की रणनीति सीमित कर दी गई है. मोटे तौर पर जाति-आधारित लामबंदी है और इससे कई बार उत्साह कम हो जाता है. लोगों की ये धारणा बन जाती है कि किसी विशेष जातीय समूह का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी के जीतने की संभावना बहुत कम है.”

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वे कहते हैं, “इसे स्थानीय स्तर के जाति बुनावट, तनाव और संघर्षों से जोड़ा जा सकता है, जो मतदाताओं को, खासकर हाशिए के लोगों को मतदान करने से रोकते हैं.”
 
क्या इस बार का चुनाव अलग होगा?
विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले चुनावों में बिहार में कम मतदान के पीछे मतदाताओं के अपने कारण थे. लेकिन इस बार दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है. इसके कारण चुनाव प्रचार और जमीनी अभियान पूरी तरह से बाधित हैं. साथ ही नए गठबंधन बने हैं और पार्टियों में अलगाव हुआ है. इसी साल, कुछ समय पहले लॉकडाउन हुआ था और देश के कई हिस्सों में काम करने वाले प्रवासी मजदूर राज्य में लौटे हैं.  

शास्त्री कहते हैं, "चुनावी अभियान के दौरान लोगों के मुद्दों को को प्राथमिकता नहीं दी जाती. कम मतदान का एक कारण ये भी हो सकता है. इससे मतदाता की उदासीनता बढ़ जाती है क्योंकि पार्टियों की ओर से उठाए गए मुद्दे लोगों को नहीं जोड़ते."

यशवंत देशमुख का मानना है, “नीतीश कुमार के सत्ता में आने और 15 साल तक शासन करने के बाद भी लोगों में बहुत हताशा है, क्योंकि वे अब भी विकास से दूर हैं. चूंकि बिहार के मतदाता अपना पक्ष शायद ही बदलते हैं, इसलिए नीतीश कुमार या सुशील मोदी से नाराज लोगों के कहीं और जाने की संभावना कम है, लेकिन ये भी हो सकता है कि वोटर नाराज होकर घर बैठ जाएं और मौजूदा सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा दर्ज करने के लिए वोट ही न दें. कोरोना महामारी और कारणों को ध्यान में रखते हुए मेरा अनुमान यही है कि इस बार भी बिहार में मतदान का प्रतिशत कुछ खास नहीं बढ़ेगा.”

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