चुनाव भावनात्मक आधार पर जीते जा सकते हैं लेकिन सत्ता नहीं चलाई जा सकती. भूखे पेट के आगे भावनाएं जवाब दे जाती हैं. फिर बिहार तो भयंकर अकाल और राजनीतिक अस्थिरता से गुजरकर अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था. पाटलिपुत्र की धरती ने अब तक राजनीतिक आंदोलन देखे थे. जातिय आंदोलन देखे थे. 1970 का दशक बिहार में सबसे बड़े छात्र आंदोलन का साक्षी बन रहा था. देखें बिहार चुनाव पर आजतक की खास पेशकश पाटलिपुत्र.