गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पूरी ताकत से साथ चुनाव प्रचार किया. राहुल ने अपने दम पर गुजरात नवसर्जन यात्रा के तहत चार चरणों में प्रचार किया. राहुल सूबे के 135 विधानसभा क्षेत्रों में सीधे तौरे पर पहुंचे. जबकि 42 विधानसभाओं को उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से कवर किया. चाय दुकानों से लेकर राहुल मंदिर-मंदिर घूमते रहे, फिर भी वो 22 साल से सत्ता पर काबिज बीजेपी की नींव नहीं हिला पाए.
दरअसल, इसके पीछे बड़ी वजह स्थानीय नेतृत्व की कमजोरी भी माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषक ये भी दावे कर रहे हैं कि महज दो-तीन महीने किसी राज्य में जाकर चुनाव नहीं लड़ने से नतीजे अनुरूप नहीं आ सकते. ऐसे में संगठन की जो मजबूती बीजेपी के लिए तारणहार बनती है, वही कमजोर पार्टी संगठन कांग्रेस के लिए हार का सबब बनता दिखाई दे रहा है.
यहां तक कि जो बड़े स्थानीय नेता कांग्रेस के पास थे, उन्हें भी कांग्रेस साथ रखने में नाकाम रही. शंकर सिंह वाघेला वो नाम हैं, जो गुजरात की राजनीति में बड़ा दखल रखते हैं और उनका वहां काफी असर माना जाता है. लेकिन पार्टी नेतृत्व से नाराजगी के बाद 21 जुलाई 2017 को अपने 77वें जन्मदिन पर इस वरिष्ठ नेता ने कांग्रेस से रिश्ता खत्म करने का ऐलान कर दिया.
खली वाघेला की कमी
राहुल गांधी के पूरे चुनाव प्रचार को देखा जाए तो उनके साथ हर कदम पर गुजरात के प्रभारी अशोक गहलोत खड़े नजर आए. गहलोत के अलावा गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी, अर्जुन मोढवाडिया और शक्तिसिंह गोहिल ही राहुल के साथ सार्वजनिक मंचों पर नजर आए. गुजरात में कांग्रेस के ये वो स्थानीय नेता हैं, जो खुद चुनावी राजनीति में पिछड़ गए हैं. अर्जुन मोढवाडिया कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में शुमार हैं और वो पोरबंदर सीट से 2012 के बाद एक बार फिर चुनाव हार गए हैं.
दूसरी तरफ शक्तिसिंह गोहिल की बात की जाए तो वो भी इस बार चुनाव हार गए हैं. 2012 में वो अब्दासा सीट से चुनाव हारे थे, इस बार पार्टी ने उन्हें मांडवी सीट से टिकट दिया, बावजूद इसके वो अपनी सीट बचाने में कामयाब नहीं हो पाए. वहीं, भरत सिंह सोलंकी ने इस बार चुनाव ही नहीं लड़ा.
यानी गुजरात में कांग्रेस के जिन बड़े नेताओं के साथ राहुल गांधी प्रचार में जा रहे थे, उनका अपना कोई जनाधार नहीं बचा है. ऐसे में शंकर सिंह वाघेला जैसे बड़े गुजराती चेहरे की कमी कांग्रेस को खली.
दरअसल, वाघेला की कमी एक और वजह से भी महसूस की गई. राहुल गांधी पूरे प्रचार के दौरान हिंदी में भाषण देते रहे, जबकि पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने स्थानीय भाषा में ही गुजरात की जनता को संबोधित किया. अगर, वाघेला राहुल के साथ मंच साझा करते तो संभवत: वो गुजराती में अपनी अवाम को संबोधित कर पाते और कांग्रेस की बात ठीक से रख पाते.
यानी जिस बीजेपी में नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे बड़े गुजराती चेहरे थे. कांग्रेस के पास कोई नहीं था. राहुल भले ही पूरे दमखम के साथ वहां गए हों, लेकिन उनका राजनीतिक करियर मोदी-शाह के सामने टिक नहीं सका और बौना साबित हुआ.
यही वजह है कि शंकर सिंह वाघेला का फैक्टर भी बीजेपी के पक्ष में गया है, ऐसा माना जा रहा है. हालांकि, वो पिछले चुनाव में कांग्रेस के साथ थे और पार्टी को इस बार से कम सीटें मिली थीं. लेकिन मौजूदा चुनाव में पाटीदारों और ओबीसी का समर्थन मिलने से जातीय समीकरण कांग्रेस के पक्ष में दिखाई दे रहे थे और उसकी स्थिति मजबूत दिख रही थी.
ये भी कहा जा रहा है कि भले ही वाघेला बीजेपी के साथ नहीं थे, लेकिन कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. यहां तक कि ये बात सामने आई कि वाघेला के इशारे पर कांग्रेस और राकांपा के 11 विधायकों ने राष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस वोटिंग की, जिसके बाद एक दर्जन कांग्रेसी विधायक शक के दायरे में आ गए. अंतत: उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया.
दरअसल, वाघेला इस संबंध में कांग्रेस नेतृत्व को चेताते भी रहे. तीन दशक से अधिक समय से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले 77-वर्षीय वाघेला ने कहा था कि अगर कांग्रेस ने पहले से चुनाव की तैयारी शुरू कर दी होती, तो वह जीत सकती थी.
पार्टी छोड़ने पर वाघेला ने भी सफाई दी थी कि उन्होंने राहुल गांधी को ये साफ कर दिया था कि उन्हें सीएम नहीं बनना है. वाघेला को ये सफाई इसलिए देना पड़ी थी, क्योंकि उन पर सीएम पद की दावेदारी को लेकर डिमांड के आरोप लग रहे थे. हालांकि, चुनाव नतीजों ने मुख्यमंत्री के नाम पर चर्चा करने का मौका कांग्रेस को नहीं दिया है और राहुल एक और चुनावी परीक्षा में फेल हो गए हैं.