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गुजरात फतह के लिए कांग्रेस ने तैयार किए 7 सेनापति, क्या खत्म कर पाएंगे 27 साल का वनवास?

गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने 7 कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए हैं, जिनके जरिए बीजेपी के खिलाफ मजबूत सोशल इंजीनियरिंग बनाने की कवायद में है. कांग्रेस ने गुजरात में दलित, ओबीसी, क्षत्रिय, पटेल और मुस्लिमों वोटों को लेकर सियासी संदेश दिया है. ऐसे में देखना है कि कांग्रेस क्या 27 साल के सत्ता के वनवास को खत्म कर पाएगी?

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राहुल गांधी और जिग्नेश मेवानी
राहुल गांधी और जिग्नेश मेवानी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सूबे में कांग्रेस ने नियुक्त किए सात कार्यकारी अध्यक्ष
  • कांग्रेस अपनी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग पर लौटी
  • बीजेपी को क्या इस बार कांग्रेस चुनावी मात दे पाएगी

गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस अपने सियासी समीकरण दुरुस्त करने में जुटी है. सूबे में 27 सालों से कांग्रेस सत्ता के वनवास झेल रही है. ऐसे में गुजरात की सियासी जंग फतह करने के लिए कांग्रेस ने सूबे में सात कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए हैं, जिसमें दलित, ओबीसी, पटेल, क्षत्रिय और मुस्लिम समुदाय के नेताओं को जगह दी गई. कांग्रेस कार्यकारी अध्यक्ष के जरिए गुजरात में अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले से 2022 के विधानसभा चुनाव को जीतने की रणनीति बनाई है. 

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आदिवासी समुदाय से आने वाले विधायक सुखराम राठवा को गुजरात विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस ने बना रखा है तो ओबीसी समाज के जगदीश ठाकोर के हाथों में गुजरात कांग्रेस की कमान है. वहीं, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने गुजरात में 7 कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए हैं. जिग्नेश मेवानी, ललित कागाथरा, रित्विक मकवाना, अंबरीश डेर, हिम्मत सिंह पटेल, कादिर पीरजादा और इंद्रविजय सिंह गोहिल को प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा गया है. 

दलित नेता मेवानी का मिला जिम्मा
गुजरात में दलित नेता के तौर पर अपनी पहचान बना चुके जिग्नेश मेवानी अब कांग्रेस के साथ हैं. ऐसे में कांग्रेस उन्हें गुजरात का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है. जिग्नेश मेवानी युवा होने के साथ-साथ कांग्रेस में फॉयर ब्रांड नेता के तौर पर जाने जाते हैं. ऐसे में पार्टी अब उनके जरिए दलित मतों को साधने की कवायद में है. ऐसे में चुनाव से पहले कार्यकारी नियुक्त कर दलित समुदाय को बड़ा सियासी संदेश देने का दांव माना जा रहा है, क्योंकि दलित राजनीति में सब से वो अहम नेता के तौर पर एक चहरा बन चुके हैं. 

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हार्दिक का विकल्प बने कागाथरा
पटेल आरक्षण आंदोलन का चेहरा रहे हार्दिक पटेल कांग्रेस अलविदा कह कर बीजेपी का दामन चुके हैं. हार्दिक की भरपाई के लिए कांग्रेस ने उनके पुराने साथी रहे ललित कागाथरा को गुजरात का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर आगे बढ़ाने की रणनीति चली है. पाटीदार आंदोलन के वक्त सौराष्ट्र में पटेलों के साथ सरकार के अन्याय की बात कागाथरा ने शुरू किया था. ललित कागाथरा खुद पाटीदार है और सौराष्ट्र में पाटीदार राजनीति पर खुद की अच्छी खासी पकड़ रखते हैं. कांग्रेस ने उन्हें 2017 में टंकरा सीट से चुनाव लड़वाया था, जहां से जीतकर विधायक बने थे. ऐसे में कांग्रेस ने उनके जरिए पाटीदार समुदाय को साधने का दांव चला है. 

ओबीसी पर कांग्रेस की खास नजर
गुजरात में कांग्रेस का सबसे फोकस ओबीसी वोटबैंक पर है. यही वजह है प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर जगदीश ठाकोर पार्टी की कमान संभाल ही रहे हैं और अब उनके साथ तीन ओबीसी नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है. रित्विक मकवाना, अंबरीश जे डेर और हिम्मत सिंह पटेल को गुजरात कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है. मकवाना ओबीसी के बड़े चेहरे हैं और विधायक हैं. वहीं, अंबरीश डेर विधायक हैं और ओबीसी के अहिर समुदाय से आते हैं. गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के अमरोली के आसपास के इलाके में अंबरीश की मजबूत पकड़ मानी जाती है. ताऊते चक्रवात में खूब काम किया और लोगों की काफी मदद की है. ऐसे ही हिम्मत सिंह पटेल भी ओबीसी समुदाय से आते हैं और संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ है. 

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मुस्लिम वोटबैंक पर कांग्रेस की निगाहें 
गुजरात में कांग्रेस अपने मुस्लिम वोटबैंक पर हर हाल में पकड़ बनाए रखना चाहती है, जिसमें सेंधमारी के लिए असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM हरसंभव कोशिश में जुटी है. ऐसी स्थित में कांग्रेस मुस्लिम वोटों को लेकर किसी तरह कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है, जिसके लिए कादिर पीरजादा को गुजरात कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर बड़ा सियासी संदेश दिया है. अहमद पटेल के रहते हुए कांग्रेस मुस्लिम वोटों को लेकर फ्रिकमंद नहीं रहती थी, लेकिन अब उनके निधन के बाद कांग्रेस को एक मुस्लिम चेहरे की दरकार थी.  

गोहिल के जरिए क्षत्रिय वोटों पर पकड़
कांग्रेस ने क्षत्रीय समुदाय से आने वाले इंद्रजीत गोहिल को गुजरात में पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है. गुजरात में क्षत्रिय समुदाय कांग्रेस का मजबूत वोटबैंक रहा है. शक्ति सिंह गोहिल के केंद्रीय राजनीति में सक्रिय हो जाने के बाद पार्टी ने इंद्रजीत गोहिल को आगे बढ़ाने की कवायद में है. इंद्रजीत युवा नेता के तौर पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई है और 2017 में पार्टी ने उन्हें चुनाव भी लड़ाया था, लेकिन जीत नहीं सके थे. इसके बावजूद पार्टी ने संगठन का जिम्मा देकर क्षत्रीय समुदाय को सियासी संदेश देने की कोशिश की है. 

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