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गुजरात के आदिवासी वोटों की फाइट... मोदी-केजरीवाल के बाद अब राहुल की बारी

गुजरात में 15 फीसदी आदिवासी समुदाय को साधने पर बीजेपी से लेकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तक की नजर है. पीएम मोदी और अरविंद केजरीवाल के बाद अब कांग्रेस नेता राहुल गांधी दाहोद में आदिवासी समुदाय के बीच पहुंचे हैं. गुजरात में आदिवासी समुदाय के लिए 27 सीटें आरक्षित है, जिसके लिए सियासी जंग जारी है.

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पीएम नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी
पीएम नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • गुजरात में 15 फीसदी आदिवासी वोटर काफी अहम हैं
  • गुजरात में आदिवासी वोटों को लेकर सियासी संग्राम

गुजरात में विधानसभा चुनाव भले ही साल के आखिर में है, लेकिन सियासी बिसात अभी से बिछाई जाने लगी है. सूबे में सभी राजनीतिक दलों की नजर आदिवासी वोटों पर है. पीएम नरेंद्र मोदी और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के बाद अब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी आदिवासी समुदाय को साधने के लिए उतर रहे हैं. राहुल गांधी ने मंगलवार को दाहोद में आदिवासी सत्याग्रह रैली को संबोधित किया. 

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एक दिवसीय दौरे पर गुजरात पहुंचे राहुल गांधी दाहोद में 'आदिवासी सत्याग्रह' रैली को संबोधित करने के साथ-साथ पार्टी नेताओं से मुलाकात करेंगे. राहुल दाहोद के स्वामी विवेकानंद स्कूल में कांग्रेस विधायकों और आदिवासी समुदाय के नेताओं के साथ बैठक करेंगे. इसे गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है, जहां इस बार सबसे अहम और सियासी जंग आदिवासी समुदाय के वोटों की है. 

पीएम नरेंद्र मोदी ने भी दाहोद में आदिवासी रैली की थी

गुजरात में 15 फीसदी आदिवासी समाज को कांग्रेस का परंपरागत वोटर माना जाता है, जिन्हें साधने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले महीने 20 अप्रैल को दाहोद में उतरे थे. मोदी ने विकास की सौगात देने के साथ-साथ आदिवासी महासम्मेलन के जरिए बड़ा सियासी संदेश दिया था. मोदी आदिवासी समुदाय के लिए पीने के पानी से लेकर रोजगार और विकास का एजेंडा सेट करते नजर आए थे. इस दौरान पीएम मोदी आदिवासियों की पारंपरिक कोटी, आभूषणों और साफा में नजर आए थे. 

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केजरीवाल ने भरूच में आदिवासी सम्मेलन किया

वहीं, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए आम भारतीय ट्राइबल पार्टी के साथ गठबंधन किया है. बीटीपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेश बसावा के साथ अरविंद केजरीवाल ने एक मई को भरूच में आदिवासी संकल्प महासम्मेलन को संबोधित किया था. इस मौके पर केजरीवाल ने कहा था कि बीजपी और कांग्रेस सिर्फ अमीरों को अमीर बना रही है, लेकिन मैं आपको कहता हूं कि हमें एक मौका दे दो हम आपकी गरीबी दूर कर देंगे. हम लोग आपके साथ खड़े हैं और हम गरीबों और आम लोगों की पार्टी है. 

15 फीसदी आदिवासी का 27 सीटों पर असर
गुजरात में 15 फीसदी आदिवासी समाज कई उपजातियों में बंटा हुआ है. इनमें भील, डुबला, धोडिया, राठवा, वर्ली, गावित, कोकना, नाइकड़ा, चौधरी, धानका, पटेलिया और कोली (आदिवासी) हैं. आदिवासी समुदाय गुजरात की 182 विधानसभा सीटों में से 27 सीटों पर खास प्रभाव रखते हैं और पांच जिलों में इनकी अच्छी खासी आबादी है. बनासकांठा, साबरकांठा, अरवल्ली, महिसागर, पंचमकाल दाहोद, छोटा उदेपुर, नर्मदा, भरूच , तापी, वलसाड, नवसारी, डांग, सूरत में अदिवासी समाज के लोग जीत-हार का फैसला करते हैं. 

15 फीसदी आदिवासी वोटबैंक की सियासी ताकत देखते हुए सभी पार्टियां अपनी ओर खींचने की कवायद करती हैं. बीजेपी और कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी भी बीटीपी के जरिए अपने पाले में करने की जुगत में है. इसीलिए सभी पार्टियां आदिवासी वोटों को अपने-अपने पाले में करने के लिए अभी से जुट गई हैं. हालांकि, गुजरात में आदिवासी वोटों की पहली पसंद कांग्रेस रही है. 

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आदिवासी बहुल सीटों पर कांग्रेस का दबदबा
2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में आदिवासी समाज का 50 फीसदी से ज्यादा वोट कांग्रेस को मिला था और 35 फीसदी वोट ही बीजेपी को मिल सका था. 10 फीसदी वोट अन्य के खाते में गया था. आदिवासी समाज कांग्रेस का कोर वोटबैंक माना जाता है और पिछले कई चुनाव से कांग्रेस के पाले में खड़ा है. 

2007 के चुनाव में 27 आदिवासी बहुल सीटों में से कांग्रेस ने 14 सीटें जीती थी, तो 2012 में 16 सीटों पर कब्जा जमाया था. 2017 में कांग्रेस ने 14 आदिवासी सीटें अपने नाम की थीं, वहीं एक सीट बीटीपी (भारतीय ट्राइबल्स पार्टी) को मिली थी और 9 सीटें ही बीजेपी को मिल सकी थी. 

दाहोद में आदिवासी वोटबैंक का अच्छा खासा दबदबा है. इसीलिए पीएम मोदी के बाद राहुल गांधी दाहोद में ही आदिवासी समुदाय को साधने के लिए सियासी केंद्र बनाया है तो केजरीवाल ने भरूच को. ऐसे में देखना है कि इस बार आदिवासी वोटों की पहली पसंद गुजरात में कौन बनता है? 

 

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