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Himachal Election 2022: बगावत-रवायत और OPS... हिमाचल में BJP के सामने तीन मुश्किलें

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत लगा रखी है, लेकिन उसकी राह में कई मुश्किलें खड़ी हो गई है. एक तरफ सेब किसानों का मुद्दा छाया हुआ है तो दूसरी तरफ उसके अपने नेताओं के निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरने और हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड ने चिंता बढ़ा दी है.

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हिमाचल मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर
हिमाचल मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान महज दो दिन के बाद थम जाएगा, जिसके चलते राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है. बीजेपी अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है तो कांग्रेस सरकार में वापसी के लिए बेताब है. पहाड़ी राज्य में रास्ते जितने टेढ़े मेढ़े है, उससे कहीं ज्यादा कठिन राजनीति की डगर है. बीजेपी की सियासी राह में तीन मुश्किलें खड़ी हो गई हैं, जिसमें पार्टी नेताओं की बगावत से लेकर हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन की रिवायत और सरकारी कर्मचारियों के बुढ़ापे का सहारा पुरानी पेंशन बहाल की मांग है. 

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पांच साल पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड 

हिमाचल की सियासत में हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड रहा है. 1985 से पांच साल कांग्रेस और पांच साल बीजेपी हिमाचल में राज कर रही हैं. एक चुनाव में कांग्रेस तो दूसरे चुनाव में बीजेपी. इस तरह से हिमाचल की सियासत में दोनों ही पार्टियां बारी-बारी से सत्ता का स्वाद चखती रही है. 2017 के चुनाव में बीजेपी सत्ता में आई थी और जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बने थे. 

सत्ता परिवर्तन की रिवायत को देखते हुए कांग्रेस को अपनी वापसी की उम्मीद दिख रही है तो बीजेपी के चिंता पैदा कर रहे हैं. यही वजह है कि प्रियंका गांधी इस ट्रेंड को बरकरार रखने की अपील मतदातओं से कर रही हैं. बीजेपी के लिए हिमाचल में सत्ता परिवर्तन के रिवायत ने मुश्किलें खड़ी कर रखी है, जिसके चलते अमित शाह से लेकर पीएम मोदी तक इस ट्रेंड को बदलने की लोगों से अपील कर रहे हैं. 

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बीजेपी के लिए बागी नेताओं बने चुनौती

हिमाचल में बीजेपी के लिए सबसे मुश्किल उसके अपने ही नेताओं ने खड़ी कर रही है. बीजेपी के 21 नेताओं ने बगावत का झंडा उठाकर चुनावी ताल ठोक रखी है. बीजेपी ने 11 मौजूदा विधायकों के टिकट काटे हैं तो दो मंत्रियों की क्षेत्र बदल दिए हैं. ऐसे में बीजेपी ने जिन नेताओं के टिकट काटे हैं, उनमें से ज्यादातर नेताओं ने निर्दलीय चुनावी मैदान में कूद गए हैं. इसके अलावा कई नेता जो चुनाव लड़ने की दावेदारी कर रहे थे, लेकिन टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय ताल ठोक दी है. इसके चलते बीजेपी की कई सीटों पर सियासी समीकरण गड़बड़ा गए हैं.

हालांकि, जेपी नड्डा से लेकर जयराम ठाकुर तक बीजेपी के बागी नेताओं को समझाने की कवायद कर चुके हैं, लेकिन बात नहीं बन पा रही. पीएम मोदी ने कांगड़ा जिले की फतेहपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे कृपाल परमार को फोन करके समझाने की कोशिश की थी. इस बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था, जिसमें निर्दलीय चुनाव लड़ रहे बीजेपी के बागी नेता कृपाल परमार को बैठ जाने की गुजारिश पीएम मोदी कर रहे थे. इस बात से समझा जा सकता है कि बीजेपी के लिए बागी नेता कितनी बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है, क्योंकि हिमाचल बहुत छोटा राज्य है, जहां पर जीत हार में बहुत ज्यादा वोटों का अंतर नहीं होता है. 

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OPS ने बढ़ाई बीजेपी की टेंशन

हिमाचल प्रदेश के चुनाव में बीजेपी के गले की फांस पुरानी पेंशन स्कीम बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. कांग्रेस ने वादा किया है कि अगर राज्य में उनकी सरकार बनती है तो फिर कर्मचारियों के लिए ओल्ड पेंशन स्कीम को लागू किया जाएगा. कांग्रेस के नेता लोगों को विश्वास दिलाने के लिए छत्तीसगढ़ और राजस्थान में वादा पूरा करने का हवाला दे रहे हैं, जहां पर पुरानी पेंशन को लागू किया जा चुका है. 

हिमाचल में बड़ी संख्या में रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं और मौजूदा कर्मचारी भी ओपीएस की मांग को लेकर अड़े हुए हैं, जो बीजेपी के लिए चुनाव में चिंता का सबब बन गया है. राज्य में करीब साढ़े चार लाख सरकारी कर्मचारी हैं और रिटायर्ड कर्मचारी भी बड़ी संख्या में हैं. इस तरह से हर एक विधानसभा सीट पर तीन से चार हजार वोटर हैं. हिमाचल जैसे राज्य में यह वोटर किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. ऐसे में देखना है कि कांग्रेस के इस सियासी दांव की बीजेपी क्या काट करती है? 


 

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