हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कल वोट डाले जाएंगे. हिमाचल की सियासत में 55 साल से बेताज बादशाह माने जाने वाले वीरभद्र सिंह का ये आखिरी चुनाव है. वे हिमाचल में 6 बार मुख्यमंत्री बने. इतना ही नहीं वह 25 साल की उम्र में सांसद बनने का इतिहास भी रच चुके हैं. वीरभद्र 80 साल के उम्र के पढ़ाव पर हैं. इस उम्र में भी हिमाचल की सियासी रणभूमि जीतने के लिए दिन रात एक किए हुए हैं.
हिमाचल में कांग्रेस का चेहरा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने आजतक से खास बातचीत में कहा कि यह उनका आखिरी चुनाव है. इसके बाद जीवन में वो कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे. उन्होंने कहा कि 6 बार मुख्यमंत्री रह चुका हूं, 25 साल की उम्र में सांसद बना था. ये हमारा आखिरी चुनाव है. इसके बाद जीवन में कभी चुनाव नहीं लड़ूंगा.
वीरभद्र का सियासी सफर
वीरभद्र सिंह का जन्म 23 जून 1934 को शिमला में हुआ था. स्कूली शिक्षा शिमला से प्राप्त कर उन्होंने दिल्ली से स्नातक की डिग्री हासिल की. वीरभद्र सिंह के राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1962 में लोकसभा चुनाव में निर्वाचित होने के साथ हुई. 1967 में लोकसभा चुनाव में वे दूसरी बार निर्वाचित हुए.
1971 में तीसरी बार लोकसभा चुनाव में विजयी रहे। 1976-77 के दौरान वह पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सहायक मंत्री रहे. 1980 के लोकसभा चुनावों में उन्हें चौथी बार चुना गया. 1982-83 में वे उद्योग राज्य मंत्री रहे.
1983, 1985, 1993, 2003 और 2012 में वे कुल पांच बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 2009 में वे पांचवीं बार लोकसभा के सदस्य के रूप में चुने गए. 31 मई 2009 को उन्हें केंद्रीय स्टील मंत्री बनाया गया. 19 जनवरी 2011 को उन्होंने सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्योगों के केंद्रीय मंत्री का पदभार संभाला. राजनीति के अलावा वीरभद्र सिंह इंडो-सोवियत मैत्री समिति के सदस्य भी हैं.
हिमाचल का सियासी समीकरण
हिमाचल प्रदेश में कुल 68 विधानसभा सीटें हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य की 68 सीटों में से कांग्रेस को 36, बीजेपी को 26 तो अन्य को 6 सीटें मिली थीं. कांग्रेस को 2007 की तुलना में 2012 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटों का फायदा हुआ था, वहीं बीजेपी को 2007 की तुलना में 2012 में 16 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था.
2012 विधानसभा चुनाव में मिले वोटों पर नजर डालें तो कांग्रेस को 43 फीसदी और बीजेपी को 39 फीसदी वोट मिले थे. 2007 की तुलना में कांग्रेस का वोट 5 फीसदी बढ़ा जबकि बीजेपी को 5 फीसदी वोट का नुकसान उठाना पड़ा. बीजेपी महज 4 फीसदी वोटों से कांग्रेस से पीछे रही लेकिन कांग्रेस की तुलना में उसे 10 सीटें कम मिलीं.