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कर्नाटक चुनाव: CM फेस को लेकर कांग्रेस और बीजेपी ने बनाई सस्पेंस की रणनीति, जानें वजह

कर्नाटक विधानसभा चुनाव को लेकर मतदान की तारीख का ऐलान कर दिया गया है. हालांकि राजनीतिक दलों पहले से ही चुनाव तैयारियां शुरू कर दी थी. चुनाव होने में अब 40 दिन का ही वक्त बचा है लेकिन अभी तक कांग्रेस और बीजेपी ने अपने सीएम फेस का ऐलान नहीं किया है. कर्नाटक में 10 मई  को मतदान होगा और 13 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे. 

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कर्नाटक विधानसभा चुनाव के ऐलान के साथ ही सत्ता की जंग तेज हो गई है, लेकिन ऐसे में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री कौन होगा? सीएम पद के चेहरे को लेकर कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां अपने पत्ते नहीं खोल रही हैं जबकि तीसरे नंबर की लड़ाई लड़ रही जेडीएस ने कुमारस्वामी के फेस को आगे रखा है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बीजेपी और कांग्रेस क्यों मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से बच रही हैं? 

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कर्नाटक चुनाव में बीजेपी ने लगातार यह रुख अपनाए हुए कि सीएम बसवराज बोम्मई की अगुआई में पार्टी चुनावी मैदान में उतरेगी, लेकिन पार्टी ने स्टैंड लिया है कि चुनावी नतीजे घोषित होने के बाद ही मुख्यमंत्री का निर्णय किया जाएगा. बीजेपी की तरह कांग्रेस भी सीएम फेस को लेकर कशमकश में है. कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार और पूर्व सीएम सिद्धारमैया को आगे जरूर कर रखा है, लेकिन किसी भी नेता को सीएम फेस घोषित नहीं किया है. आइए पांच-पांच प्वाइंट में समझते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी क्यों सीएम कैंडिडेट का पहले से ऐलान करने से बच रही हैं? 

बीजेपी के सामने ये हैं चुनौतियां

1. लीडरशिप की कमी

2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने साल भर पहले ही बीएस येदियुरप्पा को सीएम फेस घोषित कर दिया था, लेकिन इस बार सत्ता में होने के बावजूद खुद को किसी नाम के साथ बंधन में नहीं बांधना चाहती. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है कि येदियुरप्पा के बाद अब बीजेपी में कोई ऐसा स्थानीय चेहरा नहीं है, जिसके नाम पर कर्नाटक की जंग जीती जा सके. बोम्मई भले ही येदियुरप्पा के सियासी उत्तराधिकारी के तौर पर 2021 में सीएम बने हों, लेकिन येदियुरप्पा की तरह न तो उनका सियासी कद है, न ही राजनीतिक आधार और न ही प्रभाव है. 

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पिछले दो सालों में राज्य सत्ता के सिंहासन पर काबिज होते हुए भी बसवराज बोम्मई नेतृत्व पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ सके, खुद को साबित नहीं कर सके और न ही पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का विश्वास जीतने में सफल हुए हैं. इस तरह कुल मिलाकर प्रदेश स्तर पर बीजेपी में नेतृत्व की कमी साफ जाहिर है, जिसके चलते पार्टी ने किसी भी चेहरे को आगे करने के बजाय सामूहिक नेतृत्व में उतरने की रणनीति अपना रखी है. 

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2. सोशल इंजीनियरिंग

कर्नाटक की राजनीति में सामाजिक समीकरण हावी रहते हैं. लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय, यहां सियासी रूप से काफी हावी है. लिंगायत बीजेपी के परंपरागत वोटर माने जाते हैं तो वोक्कालिगा जेडीएस का कोर वोटबैंक है. लिंगायत समाज से आने वाले येदियुरप्पा खुद को चुनावी राजनीति से दूर हो चुके हैं. वह न तो चुनाव लड़ेंगे और न ही सीएम पद के दावेदार हैं. ऐसे में बीजेपी राज्य में इस बार लिंगायत और वोक्कालिगा दोनों प्रभावी जातियों को लेकर नई सोशल इंजीनियरिंग बनाना चाहती है. 

बीजेपी चुनाव कैंपेन कमेटी का जिम्मा लिंगायत समुदाय से आने वाले बीएस बोम्मई को दे रखा है तो चुनाव मैनेजमेंट की कमान केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे को दे रखी है, जो वोक्कालिगा समुदाय से आती हैं. बीजेपी 4 फीसदी मुस्लिम आरक्षण को खत्म कर उसे लिंगायत और वोक्कालिगा के बीच बांट दिया है. बीजेपी दोनों ही प्रभावी समाज के बीच संतुलन बना रही है. जातिगत समीकरण को देखते हुए लिंगायतों के समर्थन को बनाए रखना चाहती है.

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वोक्कालिगा के साथ पिछड़ी जातियों के बीच अपना वोट आधार बढ़ाना है. दलितों और आदिवासियों तक अपना आधार बढ़ाना है, इसीलिए पार्टी ने किसी नेता को सीएम पद के लिए प्रोजेक्ट नहीं करना सुरक्षित समझा रही है. 

3. गुटबाजी का खतरा

कर्नाटक में बीजेपी कई गुटों में बंटी हुई है. बसवराज बोम्मई, बीएस येदियुरप्पा, बीएल संतोष के अपने-अपने खेमे में हैं. कुछ कैबिनेट मंत्री भी हैं, जो खुद को सीएम पद का मजबूत दावेदार मानते हैं. आलम यह है कि राज्य में एक गुट के समर्थक नेता किसी दूसरे गुट के नेता को बर्दाश्त नहीं करना चाहते. विवादित बयान देना, पार्टी के कामों पर सवाल उठाना और सरकार पर भ्रष्टाचार के सार्वजानिक रूप से आरोप लगाते बीजेपी नेता मिल जाएंगे.

बसनगौड़ा आर पाटिल, केएस ईश्वरप्पा, एएच विश्वनाथ, सीपी योगेश्वर जैसे बीजेपी के दिग्गज नेता बोम्मई के खिलाफ बगावती तेवर पांच साल तक दिखाते रहे हैं. ऐसे में पार्टी किसी एक चेहरे पर दांव लगाती है तो दूसरे गुट के नेता उसे जिताने के बजाय कमजोर करने की कोशिश तेज कर देंगे. ऐसे में पार्टी को फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है.

4. 40% कमीशन का दाग

बीजेपी के खिलाफ विपक्ष ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को एक सियासी हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. बोम्मई सरकार खुद पर लगे भ्रष्टाचार के दाग को धुल नहीं पा रही. चुनाव से ठीक पहले बीजेपी विधायक मदल विरुपाक्ष घूसखोरी के मामले में अरेस्ट हुए हैं. इन पर कमीशन लेकर ठेका दिलाने का आरोप है.

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राज्य के स्कूल एसोसिएशन ने पीएम मोदी को पत्र लिख कर बताया कि बोम्मई सरकार में भ्रष्टाचार चरम पर है. कर्नाटक के स्टेट कॉन्ट्रैक्टर एसोसिएशन ने प्रेस कॉफ्रेंस कर बताया था कि कैसे कर्नाटक में हर काम के लिए 40 परसेंट कमीशन की डिमांड होती है. तभी से विपक्ष ने बोम्मई सरकार को 40 प्रतिशत वाली सरकार कहना शुरू कर दिया है. बीजेपी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बुरी तरह से घिरी हुई है. 2013 के चुनाव में पार्टी को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते ही सत्ता गंवानी पड़ी थी और अब फिर से उसी मुद्दे से घिर गई है. ऐसे में पार्टी बसवराज बोम्मई के चेहरे पर चुनावी मैदान में उतरने का रिक्स नहीं लेना चाहती है? 

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5. असम का मॉडल

कर्नाटक बीजेपी में येदियुरप्पा का मामला अलग था. वह एक प्रभावशाली लिंगायत नेता थे, उन्हें अपनी जाति से पूरा समर्थन और मान्यता प्राप्त थी जबकि मौजूदा सीएम बोम्मई के बारे में ऐसा कहना मुश्किल है. ऐसे में बीजेपी असम मॉडल की तर्ज पर कर्नाटक चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है. असम में बीजेपी ने चुनाव तक सर्बानंद सोनोवाल को नेतृत्व में रखा था, लेकिन चुनाव पीएम मोदी के चेहरे और केंद्र सरकार के काम पर लड़ा गया था. चुनावी नतीजे के बाद मुख्यमंत्री पद का ताज हिमंत बिस्वा सरमा के सिर सजा दिया गया था. 

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बीजेपी ने कर्नाटक में बोम्मई को जरूर नेतृत्व दे रखा है, लेकिन सीएम का चेहरा नहीं बनाया है. बीजेपी अब पूरा चुनाव मोदी सरकार की योजना के इर्द-गिर्द रख रही है. पीएम मोदी से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा राज्य का दौरा करके चुनावी माहौल को पूरी तरह से मोड़ने में जुटे है ताकि चुनाव किसी तरह से कांग्रेस बनाम बोम्मई होने के बजाय मोदी बनाम कांग्रेस हो जाए, इसीलिए पार्टी नेतृत्व के सवाल को ओपेन रखने और चुनाव जीतने की स्थिति में अपने पत्ते खोलने का दांव चल रही है. किसी भी चेहरे को सीएम प्रोजेक्ट करने के बजाय सामूहिक नेतृत्व के साथ उतरने की रणनीति है.

कर्नाटक में सस्पेंस बनाए रखने के कारण

1. कांग्रेस को गुटबाजी का खतरा

कर्नाटक में कांग्रेस का मामला बीजेपी जैसा ही है. बीजेपी की तरह कांग्रेस में भी कई धड़े हैं. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता पार्टी की गुटबाजी है. एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार का खेमा है तो दूसरी तरफ पूर्व सीएम सिद्धारमैया का गुट है. दोनों ही नेता खुले तौर पर सीएम पद के लिए अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं. हालांकि, वे पार्टी केंद्रीय नेतृत्व के फैसले का पालन करने का भी वादा करते हैं.

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ऐसे में कांग्रेस अपनी इस कलह को चुनाव तक हरहाल में रोके रखना चाहती है और दोनों ही नेताओं के सियासी कद व राजनीतिक आधार का फायदा उठाना चाहती है, जिसके चलते किसी भी नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने से बच रही है. कांग्रेस को पता है कि दोनों में से अगर किसी एक को प्रोजेक्ट करती है तो दूसरा गुट अपनी एनर्जी उसे मजबूत करने के बजाय कमजोर करने में लगा देगा.

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2. जातीय समीकरण की मजबूरी

कर्नाटक में सीएम फेस का ऐलान किए बिना ही चुनावी समर में उतरने के पीछे कांग्रेस की जातीय समीकरण की भी मजबूरी है. कांग्रेस ने कर्नाटक में इस बार डीके शिवकुमार को पार्टी की कमान सौंप रखी है, जो वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. जेडीएस के सियासी ग्राफ गिरने और एचडी देवगौड़ा के उम्र दराज हो जाने के बाद कुमारस्वामी खुद को वोक्कालिगा समाज के नेता के तौर पर खड़ा नहीं कर सके हैं, जबकि डीके शिवकुमार ने अपनी पकड़ मजबूत बनाई है. पिछले विधानसभा चुनावों में वोक्कालिगा समुदाय के वोटों में तीन गुना बंटवारा देखा गया है. इस बार कांग्रेस इन वोटों को एकमुश्त जुटाना चाहती है. सिद्धारमैया कोरबा समुदाय से आते हैं, लेकिन उन्हें ओबीसी के मजबूत नेता के तौर पर जाना जाता है. 

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कांग्रेस के दोनों नेता कर्नाटक के दो महत्वपूर्ण सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं. पार्टी इनके समर्थन को अपने साथ बनाए रखना चाहती है. इन दोनों ही जातियों की अच्छी खासी संख्या है, जिसे कांग्रेस हर हाल में अपने साथ जोड़कर रखना चाहती है. 2013 में कांग्रेस की जीत के लिए यह दांव महत्वपूर्ण था. 2018 में कांग्रेस के लिए इस वोट में गिरावट देखी गई. इस बार अच्छे प्रदर्शन के लिए कांग्रेस को इन वोटों की वापसी लगाए हुए. सिद्धारमैया-शिवकुमार दोनों को चुनावी अभियान में सक्रिय रखने और चुनाव के बाद के नेतृत्व की स्थिति को स्पष्ट करने की रणनीति है. 

3. खड़गे कार्ड कैश कराने का दांव

कर्नाटक में कांग्रेस ने किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया है तो उसकी एक बड़ी वजह मल्लिकार्जुन खड़गे माने जा रहे हैं. खड़गे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जो कर्नाटक से आते हैं और दलित समुदाय से हैं. 24 साल बाद गांधी परिवार से बाहर कोई कांग्रेस अध्यक्ष बना है, जिसका सियासी फायदा पार्टी कर्नाटक के चुनाव में उठाना चाहती है. राज्य में दलित मतदाता 19.5 फीसदी हैं, जो राज्य में सबसे बड़े जातीय समूह के रूप में हैं.

पिछले चुनाव में बीजेपी को दलित बहुल सीटों पर बहुत ज्यादा फायदा मिला था, जिसे कांग्रेस खड़गे कार्ड के जरिए अपने प्रति लामबंद करना चाहती है. ऐसे में पार्टी किसी नेता को सीएम कैंडिडेट प्रोजेक्ट करती है तो खड़गे कार्ड बेसर हो सकता है. खड़गे कांग्रेस के कोर वोटर रहे दलित समुदाय के विश्वास को कायम रखने में जुटे हैं. 

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4. राहुल गांधी का विक्टिम कार्ड

कांग्रेस की कमान भले ही राहुल गांधी के हाथों में न हो, लेकिन आज भी पार्टी की सियासत उनके इर्द-गिर्द सिमटी हुई. वो ही पार्टी का चेहरा है. कर्नाटक में दिए मोदी सरनेम वालों को चोर कहने वाले बयान के चलते राहुल गांधी की सदस्यता खत्म हो गई है. उन्हें बंगला खाली कराने भी नोटिस मिल चुका है. कांग्रेस इस चुनाव में राहुल गांधी की सदस्यता खत्म होने को विक्टिम कार्ड के तौर पर इस्तेमाल कर रही है.

राहुल गांधी पांच अप्रैल को कर्नाटक के उसी जगह से चुनाव प्रचार का आगाज करने जा रहे हैं, जहां 2019 में उन्होंने मोदी सरनेम वाला बयान दिया था. राहुल ने भारत जोड़ो यात्रा के समय राज्य में बहुत ज्यादा वक्त गुजारा था, जिससे कांग्रेस को चुनाव में सियासी फायदे की उम्मीद है. ऐसे में पार्टी किसी नेता को सीएम फेस बनाती है तो राहुल विक्टिम कार्ड फेल हो सकता है. 

5. कर्नाटक कांग्रेस के लिए संजीवनी

कांग्रेस के लिए कर्नाटक चुनाव जीतना हर कीमत पर जरूरी है. लगातार हो रही हार के बीच कर्नाटक का चुनाव लोकसभा चुनाव की परीक्षा से पहले कांग्रेस के लिए बड़ा सियासी बूस्टर साबित हो सकता है. कांग्रेस जब भी संकट से घिरी नजर आई है तो कर्नाटक सबसे बड़ा सहारा बना है. 1977 में कांग्रेस का देश भर से सूपड़ा साफ हो गया था. उस समय कर्नाटक ही एक ऐसा राज्य था जो इंदिरा गांधी के साथ खड़ा रहा था. तब कर्टनाक की चिकमंगलूर सीट से उपचुनाव लड़ इंदिरा गांधी संसद पहुंची थीं.  इसी तरह से सोनिया गांधी ने सियासत में कदम रखा तो अपना पहला चुनाव कर्नाटक के बेल्लारी से लड़ा था और बीजेपी की सुषमा स्वराज को हराकर संसद पहुंची थीं.

कांग्रेस आज अपने राजनीतिक इतिहास में सबसे कमजोर स्थिति में है. कांग्रेस का जनाधार सिमटता जा रहा है. पार्टी केंद्र की सत्ता से 9 सालों से बाहर है. एक के बाद एक राज्य की सरकार खोती जा रही है. कांग्रेस की राजनीतिक जमीन सिकुड़ती जा रही है. सिर्फ तीन राज्य में पार्टी सत्ता में हैं. ऐसे में कांग्रेस के लिए कर्नाटक चुनाव की जीत उसके वापसी की उम्मीद जगा सकती है. कर्नाटक में चार दशक से हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड चला आ रहा है. यही वजह है कि कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ गई हैं, लेकिन पार्टी किसी तरह का कोई सियासी जोखिम नहीं लेना चाहती है, इसीलिए कांग्रेस किसी को सीएम फेस का चेहरा घोषित करने के बजाय सस्पेंस बनाए रखने का दांव चल रही है.

 

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