केरल की आलप्पुझा लोकसभा सीट पर नौ उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं. मार्क्सवादी कम्युनिस्टा पार्टी (माकपा) ने एडवोकेट ए एम आरिफ को टिकट दिया है जबकि कांग्रेस ने एडवोकेट शनिमोल ओसमान पर भरोसा जताया है और मैदान में उतारा है. वहीं भारतीय जनता पार्टी ने डॉ. के.एस. राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है. अम्बेडकराइट पार्टी ऑफ इंडिया ने ए. अखिलेश को प्रत्याशी बनाया है जबकि बहुजन समाज पार्टी की तरफ से प्रशांत भीम कैंडिटेड हैं.
बहरहाल, आलप्पुझा एक वीआईपी संसदीय क्षेत्र मानी जाती है, क्योंकि यहां से दिग्गज कांग्रेसी और पूर्व केंद्रीय मंत्री के.सी. वेणुगोपाल सांसद हैं. वैसे तो इस संसदीय क्षेत्र की कम्युनिस्ट विरासत रही है, लेकिन ज्यादातर समय यह कांग्रेस का गढ़ रहा है. शुरुआती तीन आम चुनाव में यहां से कम्युनिस्ट उम्मीदवार जीते थे, लेकिन पिछले कई बार से इस सीट पर कांग्रेस का ही कब्जा है.
आलप्पुझा केरल में लक्षदीप सागर के पास बसा एक शहर है. यह अपने पर्यटन और खासकर हाउसबोट क्रूज के लिए मशहूर है. समुद्र के किनारे होने की वजह से यहां कृषि और मरीन इकोनॉमी काफी फली-फूली है और पर्यटन कारोबार भी काफी मजबूत है. हैंडलूम और मरीन प्रोडक्ट के अलावा यहां का सबसे मजबूत उद्योग जूट उत्पादन का है.
सात विधानसभाओं वाली सीट
इस संसदीय क्षेत्र को पहले एलेप्पी के नाम से जाना जाता था. इसके तहत सात विधानसभा क्षेत्र आते हैं. अरूर, चेरथला, आलप्पुझा, अम्बलप्पुझा, हरिपद, कायमकुलम, करुणागप्पली, सभी सामान्य सीटें हैं. यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है, हालांकि माकपा ने यहां उसे कड़ी टक्कर दी है. सबसे पहले 1951-52 में आम चुनाव हुए जिसमें निर्दलीय उम्मीदवार पीटी पुन्नोसे ने कांग्रेस उम्मीदवार ए.पी. उदयभानु को करीब 76 हजार वोटों से हराया था. इसके बाद 1957 में यह सीट सीपीआई, 1962 में सीपीआई, 1967 में सीपीआई, 1971 में आरएसपी, 1977 में कांग्रेस, 1980 में माकपा, 1984 में कांगेस, 1989 में कांग्रेस, 1991 में माकपा, 1996 में कांग्रेस, 1998 में कांग्रेस, 1999 में कांग्रेस, 2004 में माकपा, 2009 में कांग्रेस और फिर 2014 में कांग्रेस के खाते में रही.
2014 के चुनाव का आंकड़ा
केरल में राजनीतिक मुकाबला असल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के बीच होता है. साल 2014 में कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल यूडीएफ की तरफ से उम्मीदवार थे. कड़े मुकाबले में उनको 4,68,679 वोट मिले और वह करीब 57 हजार वोटों से विजयी हुए. उन्हें कुल वोटों का 51.62 फीसदी हिस्सा मिला जो पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले 5.25 फीसदी कम है. माकपा के सी.बी चंद्रबाबू को 4,11,044 वोट मिले. उन्हें 44.42 फीसदी वोट मिले जो पिछले चुनावों से 0.85 फीसदी कम है.
दिलचस्प यह था कि एनडीए की तरफ से यहां रिवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी ऑफ केरला (बोल्शेविक यानी आरएसपी-बी) के एवी थमरक्षणन उम्मीदवार थे जिनको 43,051 वोट मिले. नोटा के खाते में 11,338 वोट आए. आम आदमी पार्टी के डी. मोहनन को महज 9,414 वोट मिले, जो नोटा से भी कम है. साल 2009 में भी के.सी वेणुगोपाल ने सीपीएम नेता डॉ. के.एस मनोज को करीब 57 हजार वोटों से हराकर विजय हासिल की थी.
गौरतलब है कि साल 2014 में केरल की कुल 20 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को 12, सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ को आठ सीटें मिली थीं. बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था, हालांकि उसका कैंडिडेट तिरुअनंतपुरम में दूसरे स्थान पर था, जहां से शशि थरूर सांसद हैं. यूडीएफ में कांग्रेस के 8, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के 2 और रिवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी तथा केरल कांग्रेस (मणि) के एक-एक सांसद हैं.
2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, इसलिए पार्टी इस बार लोकसभा चुनाव को लेकर काफी सचेत है और अपने सभी बेहतरीन उम्मीदवार फिर से उतारने की तैयारी कर रही है.
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2014 में यहां 6,11,877 पुरुष और 6,59,447 महिला मतदाता थे और कुल मिलाकर 1,271,324 मतदाता थे, जिसमें से 9,97,464 यानी 78.46 फीसदी ने वोट डाले थे.
सांसद का प्रदर्शन
केरल के आलप्पुझा लोकसभा सीट पर फिलहाल कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल सांसद हैं. 4 फरवरी, 1963 को जन्मे वेणुगोपाल उच्च एक उच्च शिक्षित सांसद हैं. कालीकट यूनिवर्सिटी से गणित में एमएससी करने वाले वेणुगोपाल ने राजनीतिक पारी एक छात्र नेता के तौर पर शुरू की थी और वह पांच साल तक केरल स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष रहे जो कि एनएसयूआई की राज्य इकाई है. वे राज्य युवक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं और 1996 से 2009 के बीच तीन बार केरल विधानसभा के सदस्य रहे हैं.
साल 2004 से 2006 के बीच वह केरल सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे. केंद्र की यूपीए सरकार के दौरान वह नागर विमानन राज्य मंत्री भी रहे हैं. इसके अलावा वह कई तरह की संसदीय प्रतिनिधिमंडल के भी सदस्य रहे हैं. वह सबसे पहले साल 2009 में लोकसभा के सांसद चुने गए. इसके बाद साल 2014 में 16वीं लोकसभा के सदस्य के रूप में फिर निवार्चित हुए.
पिछले पांच साल के प्रदर्शन की बात करें तो लोकसभा में उनकी उपस्थिति का आंकड़ा 80 फीसदी से ज्यादा है. उन्होंने 130 से भी ज्यादा बार चर्चाओं में हिस्सा लिया है और 340 से ज्यादा सवाल पूछे हैं. सांसदों को पांच साल में 25 करोड़ रुपये की सांसद निधि खर्च के लिए मिलती है. लेकिन केसी गोपालन को सिर्फ 24.77 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई. इसमें भी उन्हें ब्याज सहित सरकार से महज 20.22 करोड़ रुपये मिले और इसमें से उन्होंने 17.81 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.
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