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धनबाद सीट: कोयले की राजधानी, जहां दो बार से कांग्रेस को हरा रही है बीजेपी

कोयले की राजधानी के नाम से प्रसिद्ध धनबाद लोकसभा क्षेत्र, झारखंड के 14 लोकसभा क्षेत्रों में से एक है. 2009 और 2014 के चुनाव में बीजेपी के पशुपति नाथ सिंह जीते हैं. इस सीट पर कांग्रेस और बीजेपी में कड़ी टक्कर होती है. 

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धनबाद लोकसभा क्षेत्र
धनबाद लोकसभा क्षेत्र

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कोयले की राजधानी के नाम से प्रसिद्ध धनबाद लोकसभा क्षेत्र, झारखंड के 14 लोकसभा क्षेत्रों में से एक है. यह संसदीय क्षेत्र दो जिलों धनबाद और बोकारो में फैला हुआ और इसके अन्तर्गत 6 विधानसभा सीटें आती हैं. 2009 और 2014 के चुनाव में बीजेपी के पशुपति नाथ सिंह जीते हैं. इस सीट पर कांग्रेस और बीजेपी में कड़ी टक्कर होती है.  

धनबाद संसदीय क्षेत्र भले आर्थिक रूप से पिछड़ा हो, लेकिन यह अपने औद्योगिक क्षेत्रों के लिए जाना जाता है. झारखंड के अधिकांश औद्योगिक प्लांट (जैसे-बोकारो स्टील प्लांट, भारत कूकिंग कोल लिमिटेड, बीईएमएल लिमिटेड, बोकारो पॉवर सप्लाई कॉरपोरेशन प्राइवेट लिमिटेड) यही हैं. यहां मुंबई के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रेलवे सब डिवीजन है, जो राजस्व का दूसरा बड़ा स्त्रोत है.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

धनबाद लोकसभा सीट से 1951 और 1957 का चुनाव कांग्रेस के पीसी बोस ने जीता. 1962 में इस सीट से कांग्रेस पीआर चक्रवर्ती जीतने में कामयाब हुए. 1967 में निर्दलीय प्रत्याशी रानी ललिता राज्य लक्ष्मी जीतीं. 1971 में फिर इस सीट पर कांग्रेस ने वापसी की और उसके टिकट पर राम नारायण शर्मा जीते.

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1977 में इस सीट पर कम्यूनिस्ट पार्टी का कब्जा हो गया और उसके टिकट पर एके रॉय जीते. 1980 के चुनाव में भी एके रॉय जीतने में कामयाब हुए. 1984 में कांग्रेस ने फिर वापसी की और उसके टिकट पर शंकर दयाल सिंह जीते. 1989 का चुनाव कम्यूनिस्ट पार्टी के ही एके रॉय जीते और तीसरी बार सांसद बने.

1991 में इस सीट पर पर पहली बार बीजेपी का खाता खुला और उसके टिकट पर रीता वर्मा जीतीं. वह लगातार चार बार (1991, 1996, 1998 और 1999) जीतीं. अटल बिहारी सरकार में कई मंत्रालयों की मंत्री भी रहीं. 2004 में इस सीट से कांग्रेस के चंद्र शेखर दूबे जीते. 2009 में बीजेपी ने फिर वापसी की और उसके टिकट पर पशुपति नाथ सिंह जीते. 2014 में वह अपनी सीट बचाने में कामयाब हुए.

सामाजिक तानाबाना

धनबाद लोकसभा सीट पर शहरी मतदाताओं का दबदबा है. इस सीट पर करीब 62 फीसदी शहरी मतदाता और 38 फीसदी ग्रामीण मतदाता है. इस सीट पर अनुसूचित जाति की तादात 16 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की तादात 8 फीसदी है. इसके अलावा सीट पर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के लोगों की अच्छी तादात है. इस संसदीय क्षेत्र के तहत 6 विधानसभा सीटें (बोकारो, सिन्दरी, निरसा, धनबाद, झरिया, चन्दनकियारी) आती हैं. इसमें चंदनकियारी सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है.

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2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने चार सीटें (बोकारो, सिन्दरी, धनबाद, झरिया), मार्क्सिस्‍ट कोऑर्डिनेशन ने एक सीट (निरसा) और झारखंड विकास मोर्चा ने एक सीट (चन्दनकियारी) पर जीत हासिल की. इस सीट पर वोटरों की संख्या 18.89 लाख है, जिनमें 10.32 लाख पुरुष वोटर और 8.57 लाख महिला वोटर शामिल हैं. 2014 के चुनाव में सीट पर करीब 61 फीसदी मतदान हुआ था.

2014 का जनादेश

मोदी लहर में इस सीट पर बीजेपी के पशुपति नाथ सिंह दोबारा जीते. उन्होंने कांग्रेस के अजय कुमार दूबे को करीब 2.92 लाख वोटों से हराया. पशुपति नाथ सिंह को 5.43 लाख वोट मिले थे, जबकि अजय कुमार दूबे को 2.50 लाख. तीसरे नंबर पर मार्कसिस्ट को-ऑर्डिनेशन के आनंद महतो (1.10 लाख) और चौथे नंबर पर झारखंड विकास मोर्चा के समरेस सिंह (90 हजार) रहे.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

पशपुति नाथ सिंह की गिनती बीजेपी के तेजतर्रार नेताओं में होती है. पेशे से व्यापारी पशुपति नाथ सिंह ने 2005 के विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के टिकट पर धनबाद सीट से जीत दर्ज की थी. इसके बाद वह 2009 का लोकसभा चुनाव धनबाद लोकसभा सीट से लड़े और जीते. 2014 में उन्होंने सीट पर दोबारा जीत दर्ज की. लोकसभा चुनाव के दौरान दिए हलफनामे के मुताबिक, उनके पास 2.42 करोड़ की संपत्ति है. इसमें 50 लाख की चल संपत्ति है और 1.92 करोड़ की अचल संपत्ति शामिल है. उनके ऊपर एक आपराधिक मुकदमा भी दर्ज है.

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जनवरी, 2019 तक mplads.gov.in पर मौजूद आंकड़ों के अनुसार, पशुपति नाथ सिंह ने अभी तक अपने सांसद निधि से क्षेत्र के विकास के लिए 17.79 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. उन्हें सांसद निधि से अभी तक 22.78 करोड़ मिले हैं. इनमें से 5 करोड़ रुपए अभी खर्च नहीं किए गए हैं. उन्होंने 77 फीसदी अपने निधि को खर्च किया है.

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