
उत्तर प्रदेश की सियासत पर नजर रखने वालों को यह बात चौंका रही थी कि आखिर जब उत्तर प्रदेश की लड़ाई दो ध्रुवों में बंट चुकी है, सियासी लड़ाई की लाइन भी बिल्कुल तय है कि मोदी के पक्ष में या मोदी के विरोध में, तो ऐसे में समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े बड़े ओबीसी और दलित चेहरों ने क्यों अलग लाइन ले ली और क्यों सबकुछ गंवाकर मझधार में खड़े हो गए.
लोग सीधा सा सवाल पूछ रहे थे की स्वामी प्रसाद मौर्य को अखिलेश यादव से अलग होने से क्या मिला? पल्लवी पटेल को सपा मुखिया से पंगा लेकर और समाजवादी पार्टी के गठबंधन से बाहर आकर क्या मिलेगा? सलीम शेरवानी ने समाजवादी पार्टी तो छोड़ दी लेकिन आखिर इससे उन्हें हासिल क्या होगा? केशवदेव मौर्य को अखिलेश से पंगा लेकर क्या मिलने वाला है और इन सब से इतर चंद्रशेखर रावण उत्तर प्रदेश में अकेले लड़कर कौन सा तीर मार लेंगे?
दरअसल, इन सवालों के जवाब ना तो इन नेताओं के पास है और ना ही जनता ये समझ पाई कि ये किस सियासत का हिस्सा है. सियासत के इन बड़ों नामों ने आखिर चुनाव के पहले ऐसे फैसले क्यों लिए कि उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में तन्हा ही रहना पड़े?
समानांतर तैयार हो रहे पीडीए (PDA) पर अखिलेश ने कसी नकेल!
तो बता दें कि 2024 का खेल ये नेता भी समझ रहे थे और अखिलेश यादव भी, लेकिन मुलायम सिंह के जिस चरखा दांव की चर्चा हमेशा सियासत में होती रही है अखिलेश यादव ने कुश्ती का ये दांव इन नेताओं के साथ चल दिया. अखिलेश यादव का यह चरखा दांव सिर्फ समानांतर तैयार हो रहे पीडीए (PDA) के इन नेताओं के खिलाफ ही नहीं बल्कि कांग्रेस के खिलाफ भी था. अखिलेश ने ऐसा चरखा चला कि कांग्रेस के पांव तले ज़मीन खिसक गई और समानांतर PDA बना रहे ये नेता ना घर के रहे ना घाट के!
दरअसल, यह सभी नेता अपने लिए या अपनों के लिए अखिलेश यादव पर ज्यादा से ज्यादा टिकटों का दबाव बना रहे थे. पल्लवी पटेल तीन सीट चाहती थीं, स्वामी प्रसाद मौर्य अपने बेटे और आधा दर्जन समर्थकों के लिए टिकट चाहते थे, चंद्रशेखर आजाद रावण अखिलेश के गठबंधन में चार सीटें मांग रहे थे, सलीम शेरवानी अपने लिए राज्यसभा का टिकट और अपने समर्थकों के लिए लोकसभा का टिकट चाहते थे. जबकि, केशव देव मौर्य भी लोकसभा की दावेदारी मांग रहे थे. लेकिन अखिलेश यादव यह सब देने को तैयार नहीं थे.
ऐसे में अखिलेश से नाराज़ इन सभी नेताओं ने कांग्रेस की राह पकड़ने की सोची. बताया जाता है कि राज्यसभा चुनाव के पहले एक समानांतर PDA ग्रुप भी बनकर तैयार था जो अखिलेश यादव के PDA का जबाब भी था और एक ग्रुप के तौर पर कांग्रेस के साथ गठबंधन को भी तैयार था. कहा जाता है कि स्वामी प्रसाद मौर्य इस ग्रुप को लीड कर रहे थे कि अगर कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं किया तो उनका यह काल्पनिक PDA कांग्रेस के साथ खड़ा होगा और फिर कांग्रेस के साथ मिलकर बीजेपी से मुकाबला करेगा.
याद करिए कुछ हफ्ते पहले का वह दौर जब अखिलेश यादव बार-बार कांग्रेस पार्टी को गठबंधन में सीटों को जल्दी फाइनल करने की बात कह रहे थे, कांग्रेस टाल -मटोल कर रही थी और ये नेता या तो अखिलेश का साथ छोड़ रहे थे या PDA को लेकर अखिलेश पर वार कर रहे थे.
यह वही वक्त था जब पल्लवी पटेल ने राज्यसभा में सवर्ण प्रत्याशियों को मुद्दा बनाकर अखिलेश यादव पर PDA को ठगने का आरोप लगाया और खुद के ओरिजिनल PDA होने का दावा किया. ये वही वक्त था जब स्वामी प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था और एमएलसी की सीट भी छोड़ दी थी. ये वही वक्त था सलीम शेरवानी और आबिद रज़ा जैसे मुस्लिम चेहरों ने सपा पर मुसलमानों की उपेक्षा का आरोप लगाकर छोड़ दिया था.
अखिलेश का चरखा दांव और 'समानांतर PDA' वाले नेता सड़क पर
इन सभी नेताओं को पक्का यकीन था कि कांग्रेस पार्टी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में नहीं जाएगी क्योंकि लगभग सपा अकेले लड़ने की तैयारी कर चुकी थी और वह कांग्रेस को दर्जन भर से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं थी. स्वामी प्रसाद मौर्य कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं के संपर्क में थे, पल्लवी पटेल सीधे गांधी परिवार की टच में थीं और इन नेताओं ने लगभग समानांतर पीडीए तैयार भी कर लिया था लेकिन तभी अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह का आजमाया हुआ पुराना चरखा दांव चल दिया.
इंडिया ब्लॉक के सभी बड़े घटकों ने कांग्रेस पार्टी को आगाह कर दिया कि अगर अखिलेश यादव से गठबंधन नहीं हुआ तो फिर इंडिया ब्लॉक टूट जाएगा, ऐसे में कांग्रेस पार्टी के साथ इस गठबंधन में आने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता और अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस के लिए 17 सीटों का ऐलान कर बता दिया कि वह कांग्रेस के साथ ही जा रहे हैं. राहुल और प्रियंका के इस मामले में आखिरी वक्त पर इंटरवेंशन के बाद सपा और कांग्रेस की डील फाइनल हो गई और समानांतर पीडीए बनाकर चल रहे ये नेता सड़क पर आ गए.
चूंकि, अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन के कोऑर्डिनेशन को देख रहे थे ऐसे में सभी पार्टियों को अखिलेश यादव से ही सीटें करनी थ. एक बार कांग्रेस और सपा की डील तय हो गई उसके बाद यह सभी नेता ना घर के रहे ना घाट के. कांग्रेस पार्टी उनकी तरफ से अखिलेश यादव से बात करने की कोशिश करती रही लेकिन जब वह अपने नेताओं के टिकट के लिए अखिलेश पर दबाव बना पाने की स्थिति में नहीं है तो फिर इन नेताओं के लिए कितना दबाव बना पाएगी.
कांग्रेस की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पल्लवी पटेल राहुल गांधी की दोनों रैलियों में शामिल हुईं, वाराणसी में राहुल की जीप पर दिखाई दीं, भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन में मुंबई के मंच पर भी नजर आईं लेकिन कांग्रेस पार्टी पल्लवी पटेल की कोई मदद नहीं कर पाई.
बताया जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने ही पल्लवी पटेल को ये सुझाव दे दिया कि जब बात नहीं बन पा रही तब वह अपनी तीन सीटों पर उम्मीदवार उतार दें. यही नहीं कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के प्रभारी अब अखिलेश यादव से स्वामी प्रसाद मौर्य को दोबारा एडजस्ट करने का आग्रह कर रहे हैं.
कुल मिलाकर कांग्रेस पार्टी ने इस काल्पनिक समानांतर PDA को हवा तो दी लेकिन उनके साथ नहीं दे पाए और यह भी यह सभी नेता बीच मझधार में अटक गए हैं.
क्या होता है चरखा दांव?
चरखा दांव के लिए मुलायम सिंह यादव मशहूर रहे हैं. पहलवानी के दिनों में और सियासत में भी. इस दांव में कोई भी पहलवान अपने विपक्षी की गर्दन और पैर, दोनों एक ही वक्त में काबू में कर लेता है. इसके बाद एक हाथ से गर्दन को उल्टा दबाया जाता, और दूसरे हाथ से पैर गर्दन की तरफ खींचे जाते हैं.
इससे विपक्षी पहलवान चरखे के पहिए जैसा गोल हो जाता है. इस तरह पहलवान चरखे की पोजिशन में विपक्षी को लॉक (जकड़) कर लेता है और उसे हार मानने पर मजबूर कर देता है.
कहा जाता है कि मुलायम सिंह यादव इसी चरखा दांव के माहिर थे. राजनीति में भी उनके कदम चरखा दांव जैसे ही होते थे, जिसमें विपक्षी दल फंसकर रह जाते थे.