
लोकसभा चुनाव के लिए सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और विपक्षी इंडिया ब्लॉक, दोनों ही खेमे एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए रणनीतिक तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. तिनका-तिनका जुटाया जा रहा है, एक-एक परसेंट वोट की जुगत में नेताओं और सियासी दलों को साधने की कोशिशें भी की जा रही हैं.
बिहार की सियासत के दो माहिर खिलाड़ियों जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के प्रमुख नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) अध्यक्ष लालू यादव के बीच भी यह जंग अब दिलचस्प हो चली है. कभी लालू यादव के खासमखास रहे आनंद मोहन का परिवार अब जेडीयू में शामिल हो गया है.
पूर्व सांसद और बाहुबली नेता आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद ने जेडीयू का दामन थाम लिया है. लवली आनंद के लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा है. उनके बेटे चेतन आनंद विधायक हैं. आरजेडी के टिकट पर विधायक निर्वाचित हुए चेतन ने जेडीयू के फिर से एनडीए में लौटने के बाद नीतीश सरकार के शक्ति परीक्षण के दौरान पाला बदल लिया था. सुशासन बाबू नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू और एनडीए के लिए आनंद फैमिली क्यों जरूरी है? अब चर्चा इसे लेकर भी शुरू हो गई है.
एनडीए के लिए क्यों जरूरी आनंद फैमिली
बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं और एनडीए की अगुवाई कर रही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सूबे की सभी सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है. 'अबकी बार, चार सौ पार' का नारा देकर चुनाव मैदान में उतरे एनडीए के सामने हिंदी बेल्ट में अपना किला बचाए रखने की चुनौती है और इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए गठबंधन छोटे-छोटे वोट ब्लॉक्स को टारगेट कर रहा है.
नीतीश कुमार, चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी जैसे सहयोगियों के सहारे बीजेपी अलग-अलग जातियों को साधने की कोशिश में थी लेकिन चर्चा उसके राजपूत पॉलिटिक्स की पिच पर लालू की पार्टी से पिछड़ने को लेकर भी हो रही थी. आरजेडी के पास आनंद फैमिली थी ही, जेल में बंद चल रहे प्रभुनाथ सिंह और जगदानंद सिंह जैसे कद्दावर चेहरे भी हैं.
इसके ठीक उलट एनडीए के पास ऐसे चेहरे का अभाव था जो पूरे राज्य में अपने समाज में मजबूत पैठ रखता हो. जेडीयू में सिवान की सांसद कविता सिंह हों या बीजेपी के राजीव प्रताप रूडी, राधा मोहन सिंह और आरके सिंह, राजपूत नेता हैं तो लेकिन एक खास बेल्ट के बाहर इनका प्रभाव नहीं है.
आनंद फैमिली का पूरे बिहार में प्रभाव
आनंद मोहन की बात करें तो राजपूत राजनीति की बुनियाद पर सियासी सफर का आगाज करने वाले पूर्व सांसद का पूरे बिहार और बिहार के बाहर भी अच्छा प्रभाव है. सहरसा से आने वाले आनंद मोहन खुद शिवहर सीट से सांसद निर्वाचित हुए और उनकी पत्नी लवली आनंद भी वैशाली से सांसद रह चुकी हैं. अब आनंद फैमिली के आरजेडी से एग्जिट और जेडीयू में एंट्री को राजपूत राजनीति का यही शून्य भरने की एनडीए की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है.
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इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि आनंद मोहन जब जेल में थे, सीएम नीतीश कुमार महाराणा प्रताप की जयंती पर आयोजित शौर्य दिवस कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे. राजपूत समाज के कार्यक्रम में नीतीश के मंच पर पहुंचते ही आनंद मोहन की रिहाई की मांग को लेकर नारेबाजी शुरू हो गई.
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नीतीश ने मंच से लोगों को शांत कराते हुए कहा कि इन सबकी चिंता मत करो, उनकी पत्नी से पूछ लीजिएगा कि हम क्या कोशिश कर रहे हैं. जब उनकी गिरफ्तारी हुई थी तब भी जॉर्ज साहब (जॉर्ज फर्नांडिस) के साथ हमलोग मिलने गए थे. इसके कुछ ही महीने बाद बिहार सरकार ने जेल मैनुअल में बदलाव कर दिया जिससे आनंद मोहन की रिहाई का रास्ता साफ हो सका. रिहाई के बाद आनंद मोहन अपनी पुरानी पिच को मजबूत करने में लग गए और वह राजपूत संगठनों के मंचों पर नजर आने लगे.
आनंद मोहन की एंट्री से कितना और कहां लाभ होगा
आनंद मोहन की जेडीयू में एंट्री से एनडीए को मिथिलांचल और कोसी के साथ ही सीमांचल में भी लाभ मिल सकता है. आनंद मोहन सहरसा जिले के नवगछिया से आते हैं. उत्तर बिहार के साथ ही हाजीपुर, वैशाली और आसपास की लोकसभा सीटों पर भी उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है. बिहार में साढ़े तीन फीसदी राजपूत वोटर हैं. ऐसे में आनंद मोहन अकेले लड़कर भले ही चुनाव जीतने की स्थिति में नजर न आएं लेकिन जिस दल के साथ चले जाएं उसके वोट बैंक में एक बफर वोट बैंक जरूर जोड़ सकते हैं.