बिहार की राजनीतिक लड़ाई ने उस समय दिलचस्प मोड़ ले लिया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ पटना में रोड शो किया और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रविशंकर प्रसाद के लिए वोट मांगे. पहले चार चरणों में राज्य की उन्नीस सीटों पर मतदान हो चुका है और बाकी तीन चरणों में 21 सीटों पर मतदान होगा. भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 2019 में बिहार की 40 में से 39 सीटें जीती थीं. बिहार एनडीए के लिए अन्य जगहों पर हुए नुकसान की 'भरपाई' वाला राज्य रहा है और केंद्र में सरकार गठन में अहम भूमिका निभाता है.
बिहार में लोकसभा चुनाव 2024 के लिए अब तक हुए सभी चरणों में मतदान राष्ट्रीय औसत से कम रहा है. एनडीए ने 2019 में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था. इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन (अब इंडिया ब्लॉक) ने 2020 के विधानसभा चुनावों में एनडीए को चौंका दिया था. बिहार में इस बार एनडीए की टैली में गिरावट से इनकार नहीं किया जा सकता है.
लोकसभा की बिसात
दोनों पक्षों ने जबरदस्त गठबंधन बनाया है. जनता दल (यूनाइटेड) की घरवापसी से एनडीए को मजबूती मिली है. चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास), जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा भी एनडीए में शामिल हैं. दूसरी ओर, इंडिया ब्लॉक में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, वामपंथी दल और मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी शामिल है. इस बार, भाजपा 17 सीटों पर और जदयू 16 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. लोक जनशक्ति पार्टी ने पांच उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. HAM और RLM एक-एक सीट के लिए लड़ रहे हैं. दूसरी तरफ, राजद 23 सीटों पर, कांग्रेस 9, वामपंथी दल 5 और वीआईपी 3 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. मुख्य मुकाबला 9 सीटों पर राजद और भाजपा, 16 सीटों पर जदयू और राजद और 5 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच है.
'जाति सर्वेक्षण' vs 'आरक्षण सीमा में वृद्धि'
दोनों पक्षों के पास निश्चित वोट ब्लॉक हैं और लड़ाई ईबीसी/एमबीसी वोट के लिए है. एनडीए उच्च जातियों (ब्राह्मण, राजपूत), कुर्मी/कोइरी-कुशवाहा (सीएम और डिप्टी सीएम का जाति समूह), महादलित और दलित (चिराग पासवान और जीतनराम मांझी का जाति समूह)- लगभग 35 प्रतिशत आबादी का समर्थन प्राप्त होने का दावा करती है. वहीं इंडिया ब्लॉक मुसलमानों और यादवों (32 प्रतिशत) का समर्थन मिलने का दावा करता है. अति पिछड़ा वर्ग (MBCs) और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (EBCs), जिनकी सैकड़ों उपजातियां हैं, आबादी का 33 प्रतिशत हिस्सा हैं और किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं.
जब नीतीश कुमार इंडिया ब्लॉक के साथ थे, तब उन्होंने जाति सर्वेक्षण कराया और उसकी रिपोर्ट जनता के सामने जारी की. यह काफी हद तक इंडिया ब्लॉक के जाति जनगणना के वादे के प्रभाव को कम करता है. हालांकि, आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा हटाने का वादा और 'जितनी आबादी, उतना हक' का नारा इस समूह को काफी हद तक प्रभावित करता है. उच्च और निम्न ओबीसी (यादवों को छोड़कर) सहित 71 प्रतिशत ओबीसी ने 2019 में एनडीए को वोट दिया, 56 प्रतिशत यादवों ने 2019 में इंडिया ब्लॉक का समर्थन किया था. 2020 के विधानसभा चुनाव में, महागठबंधन 10 प्रतिशत गैर-यादव ओबीसी वोट अपने पक्ष में करने में सफल रहा था.
बिहार में गैर-यादव ओबीसी वोटों को अपने पक्ष में किए बिना महागठबंधन के लिए एनडीए को मात देना मुश्किल है. इंडिया ब्लॉक ने अपनी रणनीति बदल दी है और इस बार अपने एंकर वोटिंग ब्लॉक MY (मुस्लिम-यादव) से सिर्फ 10 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. इसने गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक पर जदयू-भाजपा की पकड़ को तोड़ने के लिए छह कुशवाहा समाज के उम्मीदवारों को खड़ा किया है.
महिलाएं और युवा हैं प्रमुख वोट ब्लॉक
पीएम मोदी और नीतीश कुमार सरकार दोनों की योजनाओं के कारण एनडीए को महिलाओं के वोट पर भरोसा है. जबकि मोदी की लोकप्रियता बरकरार है, क्या नीतीश स्कूली लड़कियों के लिए साइकिल, शराबबंदी और अन्य लोकप्रिय योजनाओं के कारण महिला वोटों पर उतना ही प्रभाव रखते हैं? 2019 में, जहां एनडीए को 46 प्रतिशत महिला मतदाताओं का समर्थन मिला, वहीं महागठबंधन को 27 प्रतिशत. इस तरह एनडीए को महागठबंधन पर 19 प्रतिशत की बढ़त मिली. एक्सिस माई इंडिया एग्जिट पोल के मुताबिक पुरुष मतदाताओं में एनडीए की बढ़त सिर्फ 17 फीसदी थी. एनडीए को उम्मीद है कि यह साइलेंट वोट बैंक इस बार भी उसके साथ बरकरार रहेगा. क्योंकि बीजेपी और जदयू उन्हें यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर राज्य से अधिक राजद या इंडिया ब्लॉक के सांसद जीतते हैं तो बिहार में 'जंगल राज' की वापसी होगी.
दूसरी ओर, तेजस्वी यादव राज्य में बेरोजगारी की समस्या और अग्निपथ योजना विरोधी प्रदर्शनों के आधार पर युवा वोटों पर भरोसा कर रहे हैं. 2020 के विधानसभा चुनावों में, महागठबंधन को 18-25 और 26-35 आयु वर्ग के बीच 47 प्रतिशत समर्थन मिला, जबकि एनडीए को क्रमशः 34 प्रतिशत और 36 प्रतिशत समर्थन मिला. ऐसा लगता है कि तेजस्वी ने डिप्टी सीएम रहते हुए जेडीयू-आरजेडी सरकार द्वारा दिए गए 2.5 से 4 लाख नौकरियों का सफलतापूर्वक श्रेय लिया है. इंडिया ब्लॉक को उम्मीद है कि इससे युवाओं के बीच उनकी छवि को और बढ़ावा मिलेगा, जिससे 2019 की तुलना में और भी अधिक समर्थन मिलेगा, जो गेम-चेंजर बन सकता है.
बिहार में गठबंधन की राजनीति
बिहार में गठबंधन की राजनीति में समय-समय पर अहम बदलाव हुए हैं. 2004 और 2009 के आम चुनावों में, राम विलास पासवान की एलजेपी पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का हिस्सा थी. बदलाव को भांपते हुए लोजपा 2014 और 2019 में एनडीए में के साथ रही. 2020 के विधानसभा चुनाव में वह एनडीए से अलग हो गई और केवल जेडीयू के खिलाफ उम्मीदवार उतारे, जिससे 28 सीटों पर नीतीश कुमार की पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा. राजद ने 2004 के बाद से 2009 को छोड़कर सभी आम चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. जदयू ने 2004 के बाद से 2019 को छोड़कर सभी आम चुनावों में भाजपा के साथ गठबंधन किया. विधानसभा चुनाव में, जद (यू) ने 2015 में राजद के साथ गठबंधन किया और पिछले 10 वर्षों में भाजपा और राजद दोनों के साथ सरकारें बनाईं. HAM, RLM (तत्कालीन राष्ट्रीय लोक समता पार्टी) और VIP ने अतीत में भाजपा और राजद दोनों के साथ गठबंधन किया है.
2019 में, एनडीए ने लगभग 53 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 39 सीटें जीतीं, जबकि महागठबंधन ने 31 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सिर्फ एक सीट जीती. अपनी स्थापना के बाद पहली बार राजद लोकसभा चुनावों में बिहार में खाता भी नहीं खोल सकी. झारखंड के विभाजन के बाद, 2004 से 2019 तक चार चुनावों में, जद (यू) ने 22 प्रतिशत का अपना वोट शेयर बरकरार रखा है. भाजपा को 9 प्रतिशत वोट शेयर का फायदा हुआ है, जो 2004 में 15 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 24 प्रतिशत हो गया. यह 9 फीसदी वोट बड़े पैमाने पर राजद के ओबीसी और एससी वोट बैंक के एक वर्ग का है.
जबकि एलजेपी का वोट शेयर पिछले कुछ वर्षों में स्थिर रहा है, कांग्रेस पार्टी का वोट शेयर 2004 में 4 से बढ़कर 2019 में 9 सीटों पर लड़ने के कारण दोगुना हो गया है. राजद का वोट शेयर 2004 में 31 प्रतिशत से आधा होकर 2019 में 15 प्रतिशत हो गया और उसी अवधि में इसकी सीटों की संख्या 16 सीटों से घटकर शून्य हो गई. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राजद 2004 में 26 सीटों पर लड़ी थी और 2019 में 19 सीटों पर.
बिहार में बन रहे ये तीन परिदृश्य
अगर इंडिया ब्लॉक को एनडीए की कीमत पर पांच प्रतिशत वोट शेयर मिलता है, तो वह छह सीटें तक जीत सकता है, जबकि एनडीए की पांच सीटों में कमी हो सकती है. अगर इंडिया ब्लॉक को एनडीए की कीमत पर 7.5 प्रतिशत वोट शेयर मिलता है, तो वह 11 सीटें तक जीत सकता है, जबकि एनडीए को 10 सीटों का घाटा हो सकता है. अगर इंडिया ब्लॉक को एनडीए की कीमत पर 10 फीसदी वोट शेयर मिलता है, तो वह 15 सीटें तक जीत सकता है, जबकि एनडीए को 14 सीटों का घाटा हो सकता है.
अंत में, बिहार में लोकसभा चुनाव परिणाम दोनों गठबंधनों (एनडीए और इंडिया ब्लॉक) की कमजोर कड़ियों- जद (यू) और कांग्रेस के प्रदर्शन पर निर्भर करता है. 2020 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों का स्ट्राइक रेट क्रमशः 37 प्रतिशत और 27 प्रतिशत रहा, जो सबसे कम था. इस बार के लोकसभा चुनाव में जद (यू) अपनी 16 सीटों में से 10 पर राजद का सामना करेगी, जबकि कांग्रेस अपनी 9 सीटों में से 5 पर भाजपा का सामना करेगी. ये 15 सीटें बिहार की राजनीतिक लड़ाई की दिशा तय कर सकती हैं. (रिपोर्ट: अमिताभ तिवारी)