आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने बिहार एनडीए में चिराग पासवान पर बड़ा दांव लगाया है और उनके चाचा पशुपति पारस को किनारे लगा दिया है. सवाल उठता है कि आखिर एक सांसद वाली लोक जलशक्ति पार्टी (रामविलास) को बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए 5 सीट लड़ने के लिए क्यों दीं? और आखिर क्यों पांच सांसदों वाली राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (राष्ट्रीय अध्यक्ष पशुपति पारस) को एक भी सीट लड़ने के लिए नहीं दी गई?
दरअसल, चिराग अपनी पार्टी के इकलौते सांसद हैं. पिछले कुछ चुनाव पर नजर डालें तो चिराग पासवान की बिहार की राजनीति में क्या सियासत और प्रभाव है, इसका अंदाजा साफ तौर पर लगाया जा सकता है. खासकर 2020 के विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो साफ है कि चिराग पासवान की पार्टी ने भले ही उन चुनाव में सिर्फ एक सीट पर जीत हासिल की थी. मगर उन्होंने जिस तरीके से नीतीश कुमार की पार्टी के खिलाफ उम्मीदवार खड़े किए थे, उसके कारण जनता दल यूनाइटेड को उन्होंने बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी बना दिया था जो एक वक्त में बिहार में पहले नंबर की पार्टी हुआ करती थी.
'2020 में चिराग की पार्टी ने दिखा दिया था प्रभाव'
आंकड़ों पर अगर नजर डालें तो 2020 से बिहार विधानसभा चुनाव में कम से कम 120 सीट ऐसी थीं, जहां पर वोट कटवा पार्टी या उम्मीदवारों ने दूसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचा. इस चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी ने 134 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे. दिलचस्प बात यह है कि 120 सीट में 54 सीट पर चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ने ही दूसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवारों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा था.
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'तो बाजी पलट देते LJP उम्मीदवार'
आंकड़े बताते हैं कि 54 सीटों पर लोजपा तीसरे नंबर पर आई थी और लोजपा उम्मीदवार को पहले स्थान और दूसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवारों के जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले थे. इसका मतलब साफ है कि लोक जनशक्ति पार्टी के इन 54 उम्मीदवारों के वोट अगर दूसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवार को मिल जाते तो फिर चुनाव में बाजी पलट सकती थी.
'इन पार्टियों को पहुंचाया था बड़ा नुकसान'
आंकड़े बताते हैं कि विधानसभा चुनाव में 25 सीट ऐसी थीं, जहां पर जनता दल यूनाइटेड दूसरे नंबर पर आई थी और पहले और दूसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवार के जीत के अंतर से ज्यादा वोट लोजपा उम्मीदवार को मिला था. इसी तरीके से 12 सीट ऐसी थी जहां पर चिराग पासवान की पार्टी ने राजद को नुकसान पहुंचा और 10 सीटों पर कांग्रेस को.
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'गेमचेंजर साबित हुए थे चिराग'
2020 विधानसभा चुनाव में अगर एनडीए और महागठबंधन के बीच जीत और हर के अंतर पर नजर डालें तो साफ स्पष्ट है कि चिराग पासवान अगर इन चुनाव में गेम चेंजर साबित हुए और उनकी वजह से ही एक तरफ जहां नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे नंबर पर आ गई, वहीं दूसरी तरफ तेजस्वी यादव सरकार नहीं बना पाए.
एनडीए को कुल 1,57,01,226 वोट मिले थे, जबकि महागठबंधन को 1,56,88,458 वोट प्राप्त हुए थे. यानी दोनों गठबंधन में जीत और हार का अंतर सिर्फ 12768 वोट था.
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'अगर चिराग मैदान में नहीं होते तो...'
अब विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी के आंकड़ों पर नजर डालें तो पूरे राज्य में चिराग पासवान की पार्टी को 23,83,457 वोट मिले थे और उनका वोट प्रतिशत 5. 66 फीसदी था जो साफ तौर पर बताता है कि चिराग पासवान अगर मैदान में नहीं होते तो फिर बाजी पूरी तरीके से पलट सकती थी.
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