पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिले नादिया के कृष्णानगर लोकसभा सीट पर इन दिनों काफी सियासी गहमागहमी बनी हुई है. सियासी अखाड़े में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के दो हाई-प्रोफाइल उम्मीदवार हैं. जहां टीएमसी की मौजूदा सांसद महुआ मोइत्रा बीते कुछ समय से सुर्खियों में बनी हुई हैं, तो वहीं बीजेपी ने कृष्णानगर के शाही परिवार की सदस्य अमृता रॉय को चुनाव मैदान में उतारकर सबको चौंका दिया है.
रॉय की शादी कृष्णानगर के प्रसिद्ध राजा महाराजा कृष्णचंद्र के परिवार में हुई, जिन्होंने 1728 से 1783 तक, यानि 55 वर्षों तक शासन किया. महाराजा कृष्णचंद्र रॉय के 39वें वंशज सौमिश चंद्र रॉय की पत्नी और भाजपा उम्मीदवार को "राजमाता" या रानी माँ कहा जाता है.
वहीं फायरब्रांड नेता मोइत्रा पिछले पांच सालों के दौरान संसद में खूब सक्रिय रही. महुआ ने नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अपने तीखे भाषणों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा. हालांकि, यह कैश-फॉर-क्वेरी विवाद पर उनकी खूब किरकिरी भी हुई और बाद में उन्हें अपनी सांसदी से तक हाथ धोना पड़ा था.
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मॉडर्न वर्सेस ट्रेडिशनल एलीट?
कृष्णानगर की राजनीतिक लड़ाई में एक "आधुनिक" कामकाजी पेशेवर को "पारंपरिक" अभिजात वर्ग के साथ सियासी मुकाबला करते देखा जाएगा. मोइत्रा ने बंगाल की चुनावी राजनीति के लिए जेपी मॉर्गन चेज़ में एक इन्वेस्टमेंट बैंकर का शानदार करियर छोड़ दिया. उन्हें अक्सर "एलीट" वर्ग का नेता माना जाता है. भाजपा ने महंगे बैग का उपयोग करने और लग्जरी पार्टियों में भाग लेने को लेकर उन पर निशाना साधा. दूसरी ओर, "राजमाता" अमृता, पेशे से एक फैशन डिजाइनर हैं, अपनी शाही पहचान के कारण ट्रेडिशनल और एलीट वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं.
राजनीति में नई होने के बावजूद, अमृता रॉय को उनके शाही परिवार के वंश के कारण मोइत्रा के लिए एक मजबूत चुनौती के रूप में देखा जा रहा है, जिनके साथ कृष्णानगर के लोगों का अभी भी भावनात्मक संबंध है. चुनौती को भांपते हुए, टीएमसी लीडरशीप ने इतिहास को खंगालने में तनिक भी देरी नहीं की और राजा कृष्णचंद्र पर 1757 में प्लासी की ऐतिहासिक लड़ाई में ब्रिटिश शासकों का पक्ष लेने का आरोप लगाया और शाही परिवार की विरासत को उपनिवेशवाद समर्थक और राष्ट्र-विरोधी करार दिया.
शाही इतिहास पर लड़ाई
टीएमसी प्रवक्ता कुणाल रॉय ने बंगाल और भारत के हितों के खिलाफ औपनिवेशिक ताकतों के साथ मिलकर काम करने के लिए शाही परिवार की आलोचना की. अमृता ने टीएमसी के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि राजा कृष्णचंद्र को नवाब सिराज-उद-दौला के शोषणकारी शासन को समाप्त करने के लिए अंग्रेजों का समर्थन करने के लिए मजबूर किया गया था, जो एक "अत्याचारी" शासक था. उन्होंने कहा कि सिराज-उद-दौला ने कथित तौर पर सनातन धर्म और बंगाली भाषा को धमकी दी थी. मुस्लिम शासक ने कथित तौर पर जबरन धर्मांतरण द्वारा इस्लामी प्रभुत्व थोपकर हिंदू संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश की.
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महाराजा कृष्णचंद्र की विरासत मिश्रित रही है. राजनीतिक पत्रकार स्निग्धेन्दु भट्टाचार्य ने हाल के एक लेख में रेखांकित किया कि 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, कृष्णचंद्र को प्लासी की लड़ाई में उनकी भूमिका के लिए अंग्रेजी प्रेस में महिमामंडित किया गया था. प्रेस ने कंपनी शासन को उनके समर्थन के लिए उन्हें उसी अनुपात में पुरस्कृत किया गया था. उन्होंने उल्लेख किया कि बाद में कृष्णचंद्र की विरासत को ब्रिटिश सेनाओं के साथ मिलीभगत करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा गया.
भट्टाचार्य ने इस पर ऐतिहासिक विवरण और साहित्य का अध्ययन करके सनातन धर्म को बचाने के कृष्णचंद्र के प्रयासों के अमृता के दावों का खंडन किया. उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि हिंदुओं के इस्लाम में धर्मांतरण की घटनाएं काफी हद तक सिराज-उद-दौला के खौफनाक इरादों के बजाय दमनकारी जाति व्यवस्था का परिणाम थीं, क्योंकि उनके शासन के अंत के बाद भी धर्मांतरण जारी रहा.
कृष्णचंद्र के बारे में कई किवदंतिया हैं प्रसिद्ध
हालांकि, कृष्णचंद्र को बंगाल के इतिहास में उनके शासन के तहत कला को समृद्ध करने और संरक्षण प्रदान करने के लिए भी जाना जाता है. उनके और उनके शासन के बारे में किंवदंतियां कहती हैं कि उन्होंने दुर्गा पूजा और जगद्धात्री पूजा के उत्सव का समर्थन करके हिंदू और बंगाली संस्कृति तथा रीति-रिवाजों को बढ़ावा दिया. कुछ कहानियां मुस्लिम शासकों के साथ उनके तनावपूर्ण संबंधों और ईस्ट इंडिया कंपनी से उनकी निकटता का संकेत देती हैं.
जून मैकडैनियल की एक पुस्तक में, लोककथाओं का वर्णन है कि जब कृष्णचंद्र एक मुस्लिम शासक द्वारा कैद किए जाने के कारण दुर्गा पूजा में शामिल नहीं हो सके थे तो देवी दुर्गा ने उन्हें देवी जगद्धात्री के रूप में पूजा करने का आदेश दिया. इसलिए, उन्हें बंगाल में जगद्धात्री पूजा को लोकप्रिय बनाने के लिए भी जाना जाता है. प्रणब चटर्जी ने अपनी किताब में लिखा कि कृष्णचंद्र को नवाब मीर कासिम द्वारा मौत की सजा दी गई थी. चटर्जी का कहना है कि रॉबर्ट क्लाइव ने मौत की सज़ा को खारिज कर दिया और उन्हें शाही उपाधि और अन्य सम्मानों से सम्मानित किया.
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इतिहास और राजनीति का मिलन
ऐतिहासिक नैरेटिव्स राज्य में समकालीन ध्रुवीकरण वाले राजनीतिक नैरेटिव्स में फिट बैठते हैं जिनका इस चुनाव पर असर पड़ सकता है. सबसे पहले, हिंदू राजा द्वारा अत्याचारी मुस्लिम शासक के शोषण से सनातन धर्म की रक्षा करने की कथा हिंदू उत्पीड़न के इतिहास और हिंदू पुनरुत्थान को दर्शाती है और यह भाजपा के बड़े तर्क के अनुरूप है. दूसरा, चूंकि कृष्णानगर नादिया जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों का हिस्सा है, इस निर्वाचन क्षेत्र में बड़ी संख्या में मतुआ समुदाय के लोग रहते हैं. मतुआ समुदाय के लोग नामशूद्र समुदाय से ताल्लुक रखने वाले हिंदू शरणार्थी हैं जो पूर्वी पाकिस्तान (आधुनिक बांग्लादेश) में सांप्रदायिक और जातीय उत्पीड़न से बचने के बाद यहां बस गए थे.
मुस्लिम शोषण के खिलाफ हिंदुओं के रक्षक के रूप में महाराजा कृष्णचंद्र का आह्वान मतुआ समुदाय की सामूहिक यादों को फिर से ताजा कर देता है, जो सीमा के दूसरी ओर सांप्रदायिक हिंसा से बचकर यहां आ गए थे. सीएए नियम बनाए जाने के साथ, भाजपा को मतुआ समुदाय से अधिक समर्थन मिलने की उम्मीद है, जो अंततः भारत में बहुप्रतीक्षित औपचारिक नागरिकता प्राप्त करने की उम्मीद कर रहे हैं. लेकिन साथ ही, मतुआ समुदाय के वर्गों ने टीएमसी का भी समर्थन किया है क्योंकि उन्हें ममता बनर्जी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से लाभ हुआ है.
दोनों की चुनौतियां
तीसरा, यह लड़ाई इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि बीजेपी ने कथित कैश-फॉर-क्वेरी घटना में मोइत्रा पर राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है. वहीं टीएमसी ने बीजेपी के उम्मीदवार की शाही विरासत को धूमिल करने के लिए ऐतिहासिक राष्ट्र-विरोधी उदाहरणों का जिक्र किया है. साथ ही, महुआ मोइत्रा को विपक्षी खेमे में एक प्रमुख और मुखर भाजपा विरोधी महिला चेहरे के रूप में देखा जाता है. भाजपा शासन की "प्रतिशोध की राजनीति" का शिकार होने का नैरिटव और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी से मिले समर्थन के बाद कृष्णानगर से उनकी फिर से चुनाव की दावेदारी से मुकाबला रोचक हो गया है. हालांकि, अमृता की शाही विरासत और छवि लोगों के बीच मातृसत्तात्मक अपील का आह्वान करती है, जो मोइत्रा के लिए चुनौती बन सकती है.
दिलचस्प हैं मुकाबला
यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमृता की शाही अपील, मतुआ समुदाय के लिए भाजपा की सीएए की वकालत, संदेशखाली घटना के संबंध में टीएमसी पर कटाक्ष और भ्रष्टाचार के आरोप मोइत्रा के खिलाफ भाजपा के लिए प्रभावी राजनीतिक हथियार साबित होंगे? या फिर ममता बनर्जी की अपील और उनकी कल्याणकारी योजनाएं, भाजपा के खिलाफ एक "साहसी" सेनानी के रूप में मोइत्रा की लोकप्रियता, और लोकसभा से उनकी बर्खास्तगी और जनता की सहानुभूति टीएमसी को बढ़त दिलाएगी? कुल मिलाकर इस बार कृष्णानगर में मुकाबला दिलचस्प होने जा रहा है.
(लेखक अंबर कुमार घोष एक राजनीतिक विश्लेषक हैं. वह भारत के जादवपुर विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं. )