करीब दो साल पहले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हुए थे. इस चुनाव में आजमगढ़ लोकसभा सीट से तत्कालीन सांसद समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव भी विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे. अखिलेश ने विधानसभा के लिए निर्वाचन के बाद लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. अखिलेश के इस्तीफे से रिक्त हुई आजमगढ़ सीट के लिए उपचुनाव हुए जिसमें सपा को पूर्वांचल के अपने इस गढ़ में शिकस्त का सामना करना पड़ा. सपा उम्मीदवार धर्मेंद्र यादव को हराकर बीजेपी के दिनेशलाल यादव निरहुआ संसद पहुंच गए.
अब आप सोच रहे होंगे कि इस उपचुनाव, बीजेपी की जीत, सपा की हार की चर्चा क्यों? दरअसल, इस उपचुनाव के नतीजे आने के बाद जीतने और दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार से अधिक चर्चा हुई तीसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार की और वह उम्मीदवार थे शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली. बसपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे गुड्डू जमाली तीसरे स्थान पर रहे लेकिन चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार के मुकाबले वोट का अंतर 50 हजार से भी कम का ही रहा. बीजेपी उम्मीदवार निरहुआ को 3 लाख 12 हजार 768 वोट मिले थे. सपा के धर्मेंद्र 8679 वोट के अंतर से चुनाव हार गए थे. गुड्डू जमाली को 2 लाख 66 210 वोट मिले थे.
आजमगढ़ उपचुनाव को दो साल बीत चुके हैं. देश अब लोकसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है. चुनाव अलग है, समय अलग है, राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं लेकिन एक बात जो समान नजर आ रही है, वह है बसपा की रणनीति. बसपा दलित-मुस्लिम का नया समीकरण गढ़ने की रणनीति पर ही बढ़ती नजर आ रही है. सूत्रों की मानें तो बसपा ने पिछले तीन दिन में पांच लोकसभा सीट के लिए उम्मीदवार तय कर दिए हैं. पांच में चार उम्मीदवार मुस्लिम वर्ग से हैं.
मायावती की पार्टी ने कन्नौज से पूर्व सपा नेता अकील अहमद, पीलीभीत से पूर्व मंत्री अनिल अहमद खान फुल बाबू ,अमरोहा से मुजाहिद हुसैन और मुरादाबाद सीट से इरफान सैफी की उम्मीदवारी पर मुहर लगा दी है. इनमें से कुछ सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी अधिक है. ऐसे में कहा ये भी जा रहा है कि इन सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारने के अलावा बसपा के पास कोई और विकल्प नहीं है.
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पीलीभीत, मुरादाबाद और अमरोहा मुस्लिम बाहुल्य सीटें हैं. ब्राह्मण बाहुल्य कन्नौज में भी बसपा मुस्लिम चेहरे पर ही दांव लगाने की तैयारी में है. इस लोकसभा क्षेत्र में यादव और दलित वर्ग की आबादी भी करीब-करीब उतनी ही है जितनी मुस्लिम.
इंडिया गठबंधन पर क्या होगा माायवती की रणनीति का असर
बसपा ने कन्नौज सीट से यादव या दलित की बजाय मुस्लिम चेहरे पर दांव लगाया तो इसे भी बसपा की ओर से प्रदेश के मुस्लिमों को एक संदेश देने की रणनीति से जोड़कर ही देखा जा रहा है. दरअसल, बीजेपी के खिलाफ वोट करने के मुस्लिम वोटर्स के पैटर्न का लाभ यूपी में सपा और देश में कांग्रेस को मिलता रहा है. दोनों ही पार्टियां यूपी में गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतर रही हैं. इसे मुस्लिम वोट का बिखराव रोकने की रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा था.
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अब कहा यह भी जा रहा है कि बसपा की इस रणनीति से इंडिया गठबंधन को नुकसान उठाना पड़ सकता है. यूपी चुनाव में भी बसपा की रणनीति कुछ ऐसी ही थी. पार्टी भले ही एक सीट पर सिमट गई लेकिन कई सीटों पर सपा की हार के अंतर से अधिक वोट उसके उम्मीदवारों को मिले थे. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इंडिया गठबंधन बसपा की इस रणनीति से कैसे पार पाता है?