याद कीजिए 2014 का लोकसभा चुनाव. चुनावी रणभूमि थी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सहारनपुर सीट. तब चुनावी तैश में कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद ने कुछ ऐसा कहा था कि भारी विवाद खड़ा हो गया था. तब के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को लेकर दिया गया इमरान मसूद का बोटी-बोटी वाला ये बयान जबर्दस्त विवादों में रहा. मसूद ने ये बयान तब दिया था जब नरेंद्र मोदी को मतदाताओं के बीच अपनी साख साबित करनी ही थी. यूं तो ये बयान मोदी की अपील को चुनौती देते हुए दी गई थी.
लेकिन चुनावी दंगल में इसका ठीक विपरित असर हुआ. इस बयान के बाद सहारनपुर में बीजेपी के पक्ष में मतदाताओं की गोलबंदी हुई. इसका नतीजा ये रहा कि इमरान मसूद को बीजेपी के राघव लखनपाल ने लगभग 65000 वोटों से शिकस्त दी.
अब 2019 के चुनावी परिदृश्य में आ जाइए. इस बार जीत न तो इमरान मसूद को मिली और न ही राघव लखनपाल अपना वर्चस्व बरकरार रख पाए. इन दोनों को पटखनी दी एसपी-बीएसपी के संयुक्त उम्मीदवार हाजी फजलूर रहमान ने.
अब 2024 में पुराना राजनीतिक परिदृश्य फिर से जीवंत होने वाला है क्योंकि एक समय के प्रतिद्वंद्वी रहे भाजपा के राघव लखनपाल शर्मा और अब इंडिया ब्लॉक के उम्मीदवार इमरान मसूद एक बार फिर से सहारनपुर की चुनावी दौड़ में विपरीत छोर पर खड़े हैं.
सहारनपुर एक मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र है, जो पांच विधानसभा सीटों से बना है- सहारनपुर, सहारनपुर ग्रामीण, देवबंद, रामपुर मनिहारान और बेहट. इस बार यहां राजनीतिक मुकाबला दिलचस्प होने की उम्मीद है क्योंकि ये दो कद्दावर प्रतिद्वंद्वी फिर से आमने-सामने आ गए हैं. बसपा ने एक रणनीतिक कदम उठाते हुए अपने मौजूदा सांसद को टिकट नहीं दिया है और मुस्लिम और दलित वोट बैंक को सुरक्षित करने की उम्मीद में एक स्थानीय मुस्लिम चेहरे माजिद अली को चुना है. इस निर्वाचन क्षेत्र के जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार इस लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिमों और दलितों कुल वोट लगभग 64% है, इसमें से मुस्लिम 42% और दलित 22% हैं.
इस बार विकास के मात्र गिने-चुने काम और खेती-बारी की स्थानीय समस्याओं का मुद्दा चुनाव में मुख्य रूप से छाया रहने वाला है और इसी से नतीजे भी तय होंगे.
उत्तर प्रदेश के सबसे उत्तरी भाग में स्थित सहारनपुर, एक महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति रखता है क्योंकि इसकी सीमा तीन राज्यों - उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से लगती है. अगर ऐतिहासिक रूप से देखें तो कभी हरिद्वार भी इसी का हिस्सा था तब उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का हिस्सा था.
आज, सहारनपुर अपनी उत्कृष्ट लकड़ी की कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है, जो इसे व्यापारियों के लिए एक आकर्षक केंद्र बनाता है. व्यापार का अच्छा खासा प्रभाव रहने के बावजूद ये जिला मुख्य रूप से कृषि आधारित है. गन्ना, धान और गेहूं इसकी प्रमुख फसलें हैं. इस क्षेत्र के आम भी अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं.
हालांकि, चूंकि वर्तमान राजनीतिक माहौल अस्थिर बना हुआ है, इसलिए यहां के लोगों में प्रशासन के खिलाफ कई नाराजगी है. नांगल के ठाकुर बहुल गांव में स्थानीय लोगों ने कई सरकारी नीतियों पर असंतोष व्यक्त किया. यहां के महत्वपूर्ण मुद्दों में आवारा पशुओं की समस्या, पड़ोसी राज्य हरियाणा और पंजाब की तुलना में गन्ने की काफी कम दरें, चीनी मिल मालिकों द्वारा बकाया भुगतान न करना और मजदूरों की भारी कमी शामिल हैं.
जब हम निवर्तमान बसपा सांसद द्वारा गोद लिए गए गांव शेखपुरा कदीम पहुंचे तो ग्रामीणों द्वारा दर्ज की गई शिकायतें निराशाजनक थीं. यहां की प्रमुख चिंताएं अपर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं को लेकर थीं. गांव का डंपिंग ग्राउंड क्षेत्र के एकमात्र स्कूल और मस्जिद के प्रवेश द्वारों के पास ही भरा हुआ पाया गया. इससे स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होने के खतरे हैं. युवाओं ने नौकरियों में कमी और प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक की बार-बार होने वाली घटनाओं पर भी चिंता व्यक्त की.
इसके विपरीत, क्षेत्र के अपेक्षाकृत समृद्ध गांव चकवाली में प्रगति के नजारे देखने को मिलते हैं.यहां एक पंचायत भवन निर्माणाधीन था, जहां पुस्तकालय की भी सुविधा होगी. दिलचस्प बात यह है कि गांव ने विभिन्न केंद्रीय और राज्य योजनाओं का लाभ उठाकर अपनी पेयजल समस्या का समाधान ढूंढ लिया है. हालांकि, जब हमने सरकारी आवास को लेकर महिलाओं से बात की तो उनकी प्रतिक्रियाएं मिली-जुली थीं. कुछ महिलाओं ने सरकार से पक्के मकान मिलने की पुष्टि की, तो कई ने कहा कि आवेदन जमा करने के बावजूद उन्हें घर नहीं मिल पाया है.
किसे हासिल है बढ़त?
जैसे-जैसे सहारनपुर में वोटिंग की तारीख नजदीक आ रही है, राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं. जब हमने देवबंद के मुस्लिम बहुल क्षेत्र मंगलौर का दौरा किया. दिलचस्प बात यह है कि यहां हमने भाजपा उम्मीदवार राघव लखनपाल के प्रचार कार्यालय का उद्घाटन देखा. यहां माहौल भगवा रंग में रंगा हुआ था और भाजपा समर्थक रंग-बिरंगे गमछे और झंडे लिए हुए थे.
उल्लेखनीय रूप से इस भगवा समंदर में मुस्लिम समुदाय के चेहरे भी थे जो राजनीतिक निष्ठा में बदलाव का संकेत दे रहे थे. बीजेपी के एक स्थानीय मुस्लिम पार्टी कार्यकर्ता ने दावा किया कि भाजपा ने क्षेत्र में पिछले स्थानीय पंचायत चुनावों में 4500 वोट हासिल करने में सफल रही थी. इससे पता चलता है कि भाजपा धीरे-धीरे अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भी स्वीकार्यता हासिल कर रही है. भाजपा के चुनाव शिविर में पार्टी उम्मीदवार राघव लखनपाल के साथ यूपी के कैबिनेट मंत्री और स्थानीय विधायक कुंवर ब्रजेश सिंह भी मौजूद थे. उन्होंने बड़ी उम्मीद से दावा किया कि वे 2019 के चुनावों में अपनी हार से अब आगे बढ़ चुके हैं. उन्होंने दावा किया कि इस चुनाव में बीजेपी 2 लाख से अधिक वोटों के अंतर से सीट जीतने जा रही है.
वहीं अगर विपक्षी खेमे में देखें तो एक स्थानीय राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले इमरान मसूद ने भी अपनी चुनावी संभावनाओं के बारे में ऐसा ही विश्वास जताया. उन्होंने वर्तमान सरकार के प्रति लोगों का मोहभंग उजागर किया और कहा कि ये असंतोष समाज के सभी वर्गों में फैला हुआ है, जिससे बदलाव की चाहत पैदा हो रही है. इमरान के प्रचार अभियान के दौरान उनके साथ बातचीत के दौरान हमें उनके दावों के बारे में पता चला. इमरान मसूद ने दावा किया कि उन्हें व्यापक स्तर पर समर्थन मिल रहा है, खासकर दलित और किसान समुदायों से.
बोटी-बोटी या रोटी-रोटी
इमरान मसूद से जब पीएम मोदी के बारे में दस साल पहले दिए गए उनके विवादास्पद बयान पर सवाल पूछा गया तो इमरान ने एक व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ जवाब दिया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव पिछले मुद्दों के बजाय रोटी रोटी जैसे बुनियादी मुद्दों से अधिक जुड़ा हुआ है.
सहारनपुर का सियासी समीकरण
2014 के संसदीय चुनावों में सहारनपुर में भाजपा उम्मीदवार राघव लखनपाल ने कांग्रेस के इमरान मसूद को लगभग 65,000 वोटों के महत्वपूर्ण अंतर से हराया था. इस चुनावी दंगल में सभी प्रमुख दलों की भागीदारी थी: भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), और बहुजन समाज पार्टी (बसपा), जिसमें भाजपा को कुल वोटों में से 39.6% वोट मिले, उसके बाद कांग्रेस को 34.2%, बसपा को 19.7% वोट मिले. जबकि एसपी के खाते में 4.4% वोट ही आए.
2017 के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव देखा गया. इस दौरान कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन हुआ था. जिससे सहारनपुर संसदीय सीट के भीतर पांच विधानसभा सीटें उनके बीच विभाजित हो गईं. बीजेपी और बीएसपी के साथ त्रिकोणीय मुकाबले के बावजूद एसपी-कांग्रेस गठबंधन ने 35.3% वोट शेयर के साथ तीन सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी ने 35.5% वोट हासिल करते हुए दो विधानसभा सीटें जीतीं: देवबंद और रामपुर मनिहारन.
2019 के लोकसभा चुनावों में राजनीतिक युद्ध के मैदान में एक नया गठबंधन देखा गया. इस बार बसपा और सपा के अलायंस को कुल वोटों का 42% मत मिला. बसपा के हाजी फजलुर रहमान विजयी हुए. बीजेपी के राघव लखनपाल ने 40% वोट हासिल किए और कांग्रेस के इमरान मसूद 17% के साथ तीसरे स्थान पर धकेल दिया.
2022 के विधानसभा चुनावों को देखें तो पॉलिटिकल डॉयनामिक्स में और अधिक बदलाव देखे गए. समाजवादी पार्टी (एसपी) ने राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के साथ गठबंधन किया और बेहट और सहारनपुर में कुल वोट शेयर के 40.5% के साथ जीत हासिल की. हालांकि, भाजपा ने कुल वोटों का 38% हासिल करते हुए अपनी राजनीतिक जमीन पुष्ट की और सहारनपुर नगर, देवबंद और रामपुर मनिहारान की तीन सीटें जीतीं. इस चुनाव में बसपा और कांग्रेस असर नहीं दिखा सकीं और उन्हें क्रमश: 18% और 1% से भी कम वोट शेयर हासिल हुआ.
दिलचस्प बात यह है कि 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले इमरान मसूद कांग्रेस छोड़कर सपा में शामिल हो गए और बाद में चुनावी हार के बाद एक तरह से राजनीतिक हिंडोले में बसपा में चले गए. हालांकि आगामी लोकसभा चुनावों से पहले वह राजनीतिक यात्रा के एक पूर्ण चक्र और एक प्रतीकात्मक "घर वापसी" करते हुए कांग्रेस में लौट आए हैं.