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नेताओं की मजबूरी या मौका? MP में आज भी यहां करना पड़ता है 'खाटला चौपाल' के जरिए चुनाव प्रचार

MP Chunav 2023: खाटला बैठकों को लेकर BJP प्रत्याशी ने बताया, भीलों के गांव में अगर दामाद आता है, तब भी उसे अपने सास-ससुर या तडली-पटेल के सामने खाटला पर बैठने की इजाजत नहीं है, इससे आप खाटला का महत्व समझ सकते हैं. खाटला बैठकों के जरिए हमें एक तरह का मंच मिलता है. अपने ग्रामीण मतदाताओं से संवाद का एक स्वस्थ्य वातावरण मिलता है. 

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खाटला चौपाल में वोट मांग रहे नेता. (फोटो:aajtak)
खाटला चौपाल में वोट मांग रहे नेता. (फोटो:aajtak)

आज के दौर में जहां सोशल मीडिया और अन्य आधुनिक तौर तरीके चुनाव प्रचार अभियानों की दशा-दिशा बदल चुके हैं. लेकिन पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ और अलीराजपुर जिले में अभी भी आदिवासियों की परंपरागत खाटला बैठकें सबसे अधिक प्रासंगिक बनी हुई हैं. कांग्रेस हो या बीजेपी या फिर अन्य पार्टियों के उम्मीदवार, सभी इन दिनों आदिवासियों को रिझाने और उनके समक्ष अपनी बात रखकर वोट मांगने के लिए खाटला चौपाल लगा रहे हैं. क्या होती है खाटला चौपाल उर्फ खाटला बैठक?

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दरअसल, पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल झाबुआ और अलीराजपुर में आदिवासी समुदाय गांव, मजरों, टोलों में रहना पसंद करता है. इनकी बस्तियां परंपरागत रूप से सघन न होकर अलग-अलग मकान अपने खेतों में बनाकर रहते हैं. इन भील आदिवासियों की एक परंपरा होती है कि इनके गांव में अगर कोई मेहमान आता है जिसे यह सम्मान देना‌ चाहते हैं तो उसे यह समुदाय एक खाट यानी खटिया (आदिवासी समुदाय की भाषा में खाटला) पर बैठाते हैं और बाकी लोग नीचे बैठकर उनसे संवाद करते हैं. यह  परंपरा अनादिकाल से भील आदिवासियों में चली आ रही है.

कांग्रेस की खाटला चौपाल.

आज के चुनावी दौर में जब राजनीतिक दलों के नेता या उम्मीदवार इन आदिवासी गांवों में पहुंचते हैं तो‌ गांव की चौपाल पर खाटला लगाकर ग्रामीण उन्हें सम्मान देकर बैठाकर परस्पर संवाद करते हैं. ग्रामीण उनसे अपनी बात कहते हैं, तो उम्मीदवार अपनी बात रखते हैं. चुनाव प्रचार के एक पखवाड़े में हर गांव में खाटला चौपालें लगाई जाती हैं. 

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राजनीतिक दलों की मजबूरी या अवसर?

खाटला बैठकें राजनीतिक दलों या नेताओं की मजबूरी हैं या अवसर? इस सवाल पर अंचल की राजनीति पर नजर रखने वाले पत्रकार यशवंत सिंह पंवार कहते हैं, यह मजबूरी नहीं, बल्कि अवसर है. खाटला बैठकों के जरिए सीधा आदिवासी मतदाताओं से संवाद स्थापित हो जाता है. खाटला बैठकों के जरिए अगर कोई गिले-शिकवे हैं तो वह भी दूर हो जाते हैं. पंवार कहते हैं कि खाटला बैठकों में ग्रामीण आदिवासी इसलिए आते हैं कि खाट पर बैठने वाला गांव का अतिथि माना जाता है, उसे बैठक में शामिल होकर सम्मान दिया जाता है. 

खाटला हर किसी को नसीब नहीं होता: BJP उम्मीदवार

झाबुआ में BJP के उम्मीदवार भानू भूरिया इन दिनों खाटला बैठकों में व्यस्त हैं. aajtak की टीम ने उनसे काकरादरा गांव में खाटला बैठक करते देखा और उनसे बैठक की उपयोगिता जाननी चाही. भानू भूरिया ने बताया, खाटला हर किसी को नसीब नहीं होता. भील समुदाय जिसे सम्मान देना चाहता है, उसे ही खाटला देता है. 

दामाद को भी नहीं सास-ससुर के सामने खाटला पर बैठने की इजाजत 

भानू भूरिया बताते हैं, भीलों के गांव में अगर दामाद आता है, तब भी उसे अपने सास-ससुर या तडली-पटेल के सामने खाटला पर बैठने की इजाजत नहीं है, इससे आप खाटला का महत्व समझ सकते हैं. BJP प्रत्याशी कहते हैं, खाटला बैठकों के जरिए हमें एक तरह का मंच मिलता है. अपने ग्रामीण मतदाताओं से संवाद का एक स्वस्थ्य वातावरण मिलता है. 

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पढ़े-लिखे उम्मीदवार भी कर रहे खाटला बैठकें 

वहीं, aajtak ने झाबुआ विधानसभा क्षेत्र के सुरडिया गांव में कांग्रेस के उम्मीदवार डॉ विक्रांत भूरिया को भी खाटला बैठक करते पकड़ा और सवाल किया कि आपका अधिकतर समय पढ़ाई के लिए शहरों में बीता है. आपके पास हाईटेक टीम है फिर खाटला बैठकें क्यों? 

डॉ विक्रांत भूरिया

डॉ विक्रांत भूरिया का कहना था कि यह खाटला बैठकें बेहद प्रासंगिक हैं. यह संवाद का परंपरागत आदिवासी समुदाय का एक माध्यम है. मैं भी आदिवासी समुदाय से आता हूं, इसलिए खाटला बैठकों के जरिए समुदाय की परंपरा में भागीदारी कर अपनी राजनीतिक बात रख रहा हूं. 

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