मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव करीब हैं. सत्तारूढ़ बीजेपी का उन सीटों पर लगातार फोकस है, जहां उसे पिछले चुनाव में हार मिलती आई है. सोमवार को पार्टी ने एक बार फिर 39 सीटों के उम्मीदवार घोषित किए. इनमें चौंकाने वाले नामों को शामिल किया है और विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार बनाया है. तीन केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद सिंह पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते को कैंडिडेट बनाया गया है. इसके अलावा, सांसद राकेश सिंह, गणेश सिंह, राव उदय प्रताप सिंह, रीति पाठक को भी टिकट मिला है. संगठन के बड़े चेहरे कैलाश विजयवर्गीय एक बार फिर मध्य प्रदेश की एक्टिव पॉलिटिक्स का हिस्सा होंगे. इन सभी चेहरों को टिकट देकर पार्टी ने बड़ा संदेश दिया है.
जबलपुर से सांसद राकेश सिंह पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. उन्हें बीजेपी ने जबलपुर पश्चिम से टिकट दिया है. दमोह सांसद और केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल भी पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरेंगे. पार्टी ने उन्हें नरसिंहपुर से टिकट दिया है. सीधी से सांसद रीति पाठक भी पहली बार विधायक का चुनाव लड़ेंगी. उन्हें सीधी से टिकट मिला है. जबकि, सतना से सांसद गणेश सिंह पहले भी विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. गणेश को सतना विधानसभा सीट से टिकट मिला है. होशंगाबाद से सांसद राव उदय प्रताप सिंह भी पहले विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. पार्टी ने उन्हें गाडरवारा टिकट दिया है.
फग्गन सिंह कुलस्ते: 33 साल बाद विधानसभा चुनाव लड़ेंगे
दिलचस्प बात यह है कि आदिवासी नेता फग्गन सिंह कुलस्ते 33 साल बाद विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. फग्गन को निवास सीट से टिकट मिला है. इससे पहले निवास सीट से उनके भाई राम प्यारे चुनाव लड़े थे और हार गए थे. फग्गन 6 बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा सांसद रहे. अभी मंडला सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं. इस बार पार्टी ने प्रदेश की राजनीति में उतारने का फैसला लिया है. उन्होंने 1990 में पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी. वो 1992 तक विधायक रहे. 2012 में फग्गन राज्यसभा के लिए चुने गए थे. कुलस्ते 1999 से से 2004 तक वाजपेयी मंत्रालय में राज्य मंत्री रहे. फग्गन अब तक 2019, 2014, 2004, 1999, 1998, 1996 का लोकसभा चुनाव जीते हैं. 2009 में वो हार गए थे. कांग्रेस के बसोरी सिंह मसराम जीते थे.
नरेंद्र सिंह तोमर: दो बार ग्वालियर से विधायक बने
नरेंद्र सिंह तोमर को मुरैना जिले की दिमनी सीट दी गई है. इस सीट को तोमर की पसंदीदा माना जाता है. यहां से अब तक उनके करीबी चुनाव लड़ते आए हैं. इस बार वो खुद लड़ेंगे. 'मुन्ना भैया' के नाम से चर्चित तोमर ग्वालियर से दो बार विधायक रह चुके हैं. मुरैना जिले के ओरेठी गांव में जन्म हुआ. इमरजेंसी के वक्त तोमर जयप्रकाश नारायण के देशव्यापी आंदोलन में शामिल हुए. जेल गए और राजनीति में सक्रियता बढ़ा दी. सबसे पहले एसएलपी कॉलेज के अध्यक्ष बने. उसके बाद पहली बार ग्वालियर विधानसभा से चुनाव लड़े, लेकिन बाबू रघुवीर सिंह से 600 वोटों से हार गए. इस चुनाव के बाद नरेंद्र सिंह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1998 में वो ग्वालियर विधानसभा सीट से चुनाव जीते. 2003 में भी इसी सीट से चुनाव जीतकर उमा भारती मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाए गए. उसके बाद वो बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में रहे.
2009 में पहली बार सांसद बने थे तोमर
2009 में पार्टी ने तोमर को मुरैना लोकसभा सीट से टिकट दिया और वो जीतकर संसद पहुंचे. 2014 में ग्वालियर लोकसभा सीट से अशोक सिंह को चुनाव हराया. 2019 में तोमर ने एक बार फिर मुरैना से जीत हासिल की. पिछले महीने बीजेपी ने तोमर को चुनाव प्रबंधन कमेटी का चेयरमैन बनाया है. ऐसे में इलेक्शन मैनेजमेंट का पूरा जिम्मा भी उनके ही पास है. तोमर को सीएम पद का दावेदार भी बताया जाता है.
कैलाश विजयवर्गीय: 6 बार विधायक चुने गए
बीजेपी ने कैलाश विजयवर्गीय को इंदौर-1 से टिकट दिया है. विजयवर्गीय 2015 के बाद प्रदेश की राजनीति में सक्रिय देखे जाएंगे. विजयवर्गीय 1990 से लगातार 6 बार विधायक चुने गए. वो लगातार 12 साल तक मंत्री रहे. 2003 में सबसे पहले उमा भारती, फिर बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए. कैलाश ने साल 1990 में इंदौर की चार नंबर विधानसभा सीट से टिकट लड़ा और जीत हासिल की. उसके बाद 1993, 1998 और 2003 में अपने गृह क्षेत्र दो नंबर सीट से विधायक रहे. संगठन ने 2008 और 2013 में विजयवर्गीय को महू विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया. उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारा और जीत हासिल की. कैलाश ने 2018 का विधानसभा चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था. 2018 में उनके बेटे आकाश इंदौर-3 सीट से चुनाव जीते थे.
15 साल से संगठन में जिम्मेदारी संभाल रहे कैलाश
बाद में विजयवर्गीय केंद्रीय राजनीति में सक्रिय हो गए थे. वो लगातार चार बार राष्ट्रीय महामंत्री बनाए गए. 2015 में पश्चिम बंगाल के प्रभारी का दायित्व भी संभाल चुके हैं. वो हरियाणा विधानसभा चुनाव में इलेक्शन कैंपेन कमेटी के चैयरमेन भी बनाए गए थे. विजयवर्गीय ने 1975 में ABVP से अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत की. 1983 में इंदौर में पार्षद चुने गए. साल 2000 में पहली बार मेयर चुने गए थे.
प्रहलाद सिंह पटेल: पहली बार सिवनी से सांसद बने थे
प्रहलाद सिंह पटेल नरसिंहपुर से चुनाव लड़ेंगे. यहां से उनके भाई जालम सिंह सिटिंग विधायक हैं. जालम का टिकट काटा गया है. प्रहलाद ने अब तक विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा है. पटेल ने पीसीएस की परीक्षा पास की और डीएसपी की नौकरी मिली तो उसे जॉइन नहीं किया था. उन्होंने लॉ की डिग्री हासिल की और राजनतिक जीवन में आ गए. वो पहली बार साल 1980 में जबलपुर विश्वविद्यालय में छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव लड़े और जीते. उसके बाद उन्होंने कभी पलट कर नहीं देखा. 1989 में सिवनी से पहली बार सांसद बने. 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कोयला राज्य मंत्री रहे. इस समय वो दमोह से सांसद हैं और मोदी कैबिनेट में पर्यटन मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. लोधी समुदाय से आने वाले पटेल को भी सीएम पद का दावेदार माना जाता है.
पटेल के बारे में यह भी रोचक तथ्य
पटेल अब तक चार अलग-अलग लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ चुके हैं. 2004 में बीजेपी ने पटेल को छिंदवाड़ा से कमलनाथ के खिलाफ उम्मीदवार बनाया था. हालांकि, उन्हें हार मिली थी. इससे पहले दो बार सिवनी सीट से लड़ चुके. एक बार जीत मिली और एक बार हार. बालाघाट से चुनाव लड़े और जीते. बाद में 2014 में बीजेपी ने दमोह से मैदान में उतारा. उन्होंने जीत हासिल की और मोदी कैबिनेट में जगह बनाई. पटेल मूलरूप से नरसिंहपुर जिले के गोटेगांव के रहने वाले हैं. साल 2005 में जब उमा भारती ने बीजेपी छोड़कर ‘भारतीय जनशक्ति पार्टी’ बनाई थी तब पटेल भी उनके साथ चले गए थे. हालांकि तीन साल बाद ही मार्च 2009 में पटेल ने बीजेपी में घर वापसी की.
रीति पाठक: 2014 में पहली बार सांसद बनी थीं
रीति पाठक भी पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ेंगी. वो 2010 से 2014 तक सीधी में जिला पंचायत अध्यक्षा रहीं. 2014 में पहली बार लोकसभा चुनाव का टिकट मिला और जीत हासिल की. उसके बाद 2019 में भी उन्होंने सीधी से चुनाव जीता. उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवा अजय सिंह को 2,86,524 वोटों के अंतर से हराकर फिर से जीत हासिल की थी. रीति का इस क्षेत्र में खासा प्रभाव माना जाता है. रीति ने छात्र राजनीति से करियर की शुरुआत की. साल 1994-95 में कन्या महाविद्यालय में संयुक्त सचिव चुनी गई थीं.
गणेश सिंह: सतना में खासा प्रभाव, 4 बार सांसद चुने गए
गणेश सिंह मध्य प्रदेश में सतना सीट से लगातार चार बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. 2009 और 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बसपा के सुखलाल कुशवाहा को हराया था. 2004 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के राजेन्द्र कुमार सिंह को हराया था. वो 1995 में जिला परिषद के सदस्य रहे हैं. पहली बार वो विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. साल 2003 में वो बीजेपी में आए. 2004 में पहली बार बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीते. जब बीजेपी ने उन्हें लोकसभा का टिकट दिया था, तब वे सतना जिला पंचायत के अध्यक्ष थे. हालांकि, उससे पहले वो विधानसभा चुनाव में भी उतरे, लेकिन हार गए थे. उन्होंने छात्र राजनीति से करियर की शुरुआत की.
राव उदय प्रताप सिंह: 2009 में कांग्रेस से जीते थे लोकसभा चुनाव
उदय प्रताप सिंह होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) सीट से सांसद हैं. 2009 में उन्होंने इस सीट से कांग्रेस से चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी. उन्होंने बीजेपी के रामपाल को हराया था. हालांकि, 2013 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था और बीजेपी में शामिल हो गए थे. 2014 और 2019 में बीजेपी से चुनाव लड़े और जीत हासिल की. इससे पहले 2007 में उदय प्रताप सिंह विधायक चुने गए थे. वे 1994 से 2000 तक जनपद समिति के अध्यक्ष रहे हैं.
जिन सीटों से दिग्गज उतारे, वहां 5 सीटों पर 2018 में हार गई थी बीजेपी
- दिमनी में बीजेपी के शिव मंगल सिंह तोमर चुनाव हार गए थे. कांग्रेस 18 हजार से ज्यादा वोटों से जीती थी.
- सतना से बीजेपी के शंकरलाल तिवारी चुनाव हार गए थे. कांग्रेस 12 हजार से ज्यादा वोटों से जीती थी.
- जबलपुर पश्चिम से बीजेपी हार गई थी. कांग्रेस के हरेंद्र सिंह बब्बू 18 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीते थे.
- निवास (मंडला) सीट से बीजेपी के राम प्यारे कुलस्ते हार गए थे. कांग्रेस 28 हजार से ज्यादा वोटों से जीती थी.
- गाडरवारा से कांग्रेस के गौतम सिंह पटेल चुनाव जीते थे.
- हालांकि, सीधी और नरसिंहपुर से बीजेपी चुनाव जीती थी. सीधी में केदारनाथ शुक्ला ने कांग्रेस कैंडिडेट को 19 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था. जबकि नरसिंहपुर में बीजेपी के जालम सिंह पटेल 14 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीते थे.