पूर्वोत्तर के सिक्किम में विधानसभा चुनाव की सियासी लड़ाई दो राष्ट्रीय पार्टियों के बजाय दो क्षेत्रीय दलों के गठबंधनों के बीच है. 1975 में सिक्किम के भारत में विलय के बाद से क्षेत्रीय दलों का दबदबा यहां की सियासत में देखने को मिला है. 20 साल से प्रदेश की सत्ता पर सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट का वर्चस्व कायम है. इस बार के विधानसभा चुनाव में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट को सिक्किम संग्राम परिषद से कड़ी चुनौती मिल रही है.
सिक्किम की कुल 32 विधानसभा सीटों पर पहले चरण में यानी 11 अप्रैल को मतदान होगा. 2014 के विधानसभा चुनाव में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) ने 22 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि सिक्किम संग्राम परिषद को 10 सीटें मिली थी. सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट राज्य की सत्ता में 1994 से काबिज है. लेकिन इस बार लंबे समय से एक ही पार्टी के सत्ता में रहने से सत्ता विरोधी लहर में सिक्किम परिषद सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए हुए है.
दिलचस्प बात ये है कि 1979 के बाद अभी तक सिक्किम के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी दोनों राष्ट्रीय दलों को सत्ता में विराजमान होने का मौका नहीं मिल पाया. हालांकि 1984 में कांग्रेस को महज 13 दिन सत्ता में रहने का मौका मिला था. इसके बाद से कांग्रेस वापसी नहीं कर सकी है. जबकि बीजेपी सिक्किम संग्राम परिषद का हिस्सा बनकर चुनावी मैदान में उतरी है.
सिक्किम 1975 में भारत में विलय हुआ और पहली बार कांग्रेस की सरकार बनी. इसके बाद जब 1979 में विधानसभा चुनाव में हुए तो सिक्किम जनता परिषद की सरकार बनी. इसके बाद 1984 में कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के चलते 13 दिन के बाद ही इस्तीफा देना पड़ा.
1985 में विधानसभा चुनाव में असम संग्राम परिषद 32 में से 30 सीटों के साथ सत्ता में आई. इसके बाद 1989 में हुए चुनाव में सभी 32 सीटें जीतने में सफल रही. इसके बाद मुख्यमंत्री भंडारी के करीबी पवन कुमार चामलिंग ने बागी होकर सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट का गठन किया.
1994 में हुए विधानसभा एसडीएफ 19 सीटों के साथ सत्ता में आई. इसके बाद सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट ने पलटकर नहीं देखा. पवन कुमार चामलिंग सिक्किम की सत्ता में पिछले पांच बार से मुख्यमंत्री हैं. सूबे के इतिहास में एकलौते नेता हैं जो लगातार पांच चुनाव से काबिज हैं.