देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का औपचारिक ऐलान अभी नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी जंग फतह करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. बीजेपी असम की सत्ता बरकरार रखने और पश्चिम बंगाल में कमल खिलाने पर पूरा जोर लगा रही है जबकि, कांग्रेस की उम्मीदें दक्षिण भारत में तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनाव पर लगी हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को पंद्रह दिनों के भीतर असम-बंगाल का दूसरा दौरा किया है, लेकिन अभी तक दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी राज्य की ओर रुख नहीं किया है. वहीं, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी तमिलनाडु और केरल के दो दौरे कर चुके हैं, लेकिन पूरब की ओर अभी तक कूच नहीं किया है. असम और बंगाल में अभी तक उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है. इन दोनों राज्यों को उन्होंने पार्टी के दूसरे नेताओं को भरोसे छोड़ रखा है.
असम-बंगाल में पीएम मोदी सक्रिय
बीजेपी असम में अपनी सरकार को बरकरार रखने और पश्चिम बंगाल में वह दूसरे नंबर की पार्टी से नंबर-1 बनने की हरसंभव कोशिशों में जुटी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृहमंत्री अमित शाह तक का असम और बंगाल पर खास फोकस है. पीएम मोदी ने असम और बंगाल चुनाव अभियान की शुरुआत 23 जनवरी को सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर की थी, जिसके जरिए उन्होंने राजनीतिक तौर पर बड़ा संदेश दिया था. वहीं, अब पीएम मोदी ने दूसरी बार रविवार को असम और बंगाल में रैली को संबोधित कर चुनावी समीकरण साधने की कवायद की है.
पीएम मोदी ने असम के अपने पहले दौरे पर राज्य के मूल निवासियों को जमीन का अधिकार देकर एक बड़े वर्ग को बीजेपी से जोड़ने की कोशिश की थी. वहीं, रविवार को दूसरे दौरे पर पहुंचे पीएम ने असम में सोनितपुर में दो अस्पताल और असम माला परियोजना का शिलान्यास किया.
वहीं, बंगाल के हल्दिया में प्रधानमंत्री मोदी ने BPCL द्वारा बनाए गए एलपीजी इंपोर्ट टर्मिनल को देश को सौंपा और इसके साथ ही ढोबी-दुर्गापुर नेचुरल गैस पाइपलाइन डिविजन का आगाज किया. इस दौरान उन्होंने असम के गौरव माने जाने वाली चाय की पहचान के खिलाफ हो रही साजिश का जिक्र किया तो बंगाल में किसानों के मुद्दे को उठाते हुए ममता बनर्जी पर निशाना साधा.
असम में मिलेगी चुनौती?
बीजेपी असम में साल 2016 के चुनाव में एक बड़ी ताकत बनकर उभरी. बीजेपी ने पांच साल पहले विधानसभा की 124 सीटों में से 61 पर जीत दर्ज कर अपने सहयोगी असम गण परिषद के 14 और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट के 12 विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई थी. बीजेपी असम की सत्ता को बरकरार रखने की जद्दोजहद कर रही है, लेकिन उसे इस बार संयुक्त विपक्ष का समाना करना पड़ रहा है. पीएम मोदी असम में दो रैली कर चुके हैं जबकि अमित शाह पिछले महीने कोकराझार और जेपी नड्डा ने भी जनवरी में सिल्चर में चुनावी अभियान की शुरुआत की है.
असम के आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी ने अपनी पकड़ मजबूत की है. वहीं, कांग्रेस नेतृत्व के संकट से जूझ रही है और अब बदरुद्दीन अजमल की एयूडीएफ सहित लेफ्ट पार्टियों के साथ गठबंधन किया है. इसके सहारे मुस्लिम वोटों के साधने की कवायद की है. कांग्रेस ने असम को राज्य के नेताओं के सहारे छोड़ रखा है. राहुल गांधी ने अभी तक एक भी दौरा असम का नहीं किया है. इसके अलावा बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती एनआरसी-सीएए मुद्दा है, जिस पर पार्टी नेता पूरी तरह से खामोशी अख्तियार किए हुए हैं जबकि विपक्ष इसे एक बड़ा चुनावी हथियार बना रहा है. सीएए को लेकर ऊपरी असम के आठ जिलों में पिछले साल उग्र प्रदर्शन हुए थे.
पश्चिम बंगाल पर बीजेपी का फोकस
देश के पांच राज्यों में होने वाले चुनाव में बीजेपी का सबसे ज्यादा फोकस बंगाल पर है, जिसके लिए पार्टी ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है. 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को केवल 3 सीटें मिलीं थीं, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में उसे 123 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी जबकि बहुमत के लिए 148 सीटें चाहिए. लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन से उत्साहित बीजेपी ने 2021 की जंग फतह करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.
बीजेपी ने अपने संगठन के मजबूत लोगों को बंगाल में लगा रखा है और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार बंगाल का दौरा कर राजनीतिक आधार मजबूत करने में जुटे हैं. हाल के कुछ सालों में बीजेपी बंगाल में एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है और अब सत्ता पर काबिज होने की जुगत में है. ममता बनर्जी के तमाम सिपहसलार टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम चुके हैं. बंगाल में माहौल बनाने के लिए बीजेपी ने परिवर्तन यात्रा निकाली है. वहीं, कांग्रेस और लेफ्ट भी एक साथ मैदान में फिर उतरे हैं, लेकिन ममता बनर्जी भी काफी सक्रिय हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अभी तक बंगाल का एक भी दौरा नहीं किया है.
दक्षिण से टिकी है कांग्रेस की उम्मीद
दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां कांग्रेस की काफी उम्मीदें टिकी हुई है. यही वजह है कि राहुल गांधी बंगाल और असम के बजाय केरल और तमिलनाडु पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं. दक्षिण के इन तीनों राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के भविष्य को भी तय करने वाले हैं. राहुल गांधी चूंकि केरल के वायनाड से सांसद हैं. इसलिए उनके लिए साख का सवाल है. केरल में लेफ्ट के नेतृत्व वाली एलडीएफ की सरकार है, जिसका मुकाबला कांग्रेस की अगुवाई वाली यूडीएफ से है.
राहुल के साख का सवाल
राहुल गांधी को केरल में न केवल अपने लिए बल्कि कांग्रेस के लिए भी ताकत दिखानी होगी. केरल में सरकार बनाने के लिए 71 सीटों की दरकार होगी. अब राहुल गांधी पर एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वे कैसे कांग्रेस गठबंधन को सत्ता में वापस लाते हैं. हालांकि, अभी तीन दिवसीय दौरे पर राहुल केरल जाकर समीकरण साधने की कवायद की थी और उन्होंने अपने पार्टी के नेताओं को आपसी गुटबाजी मिटाकर एक साथ मंच पर लाकर सियासी संदेश देने की कोशिश की है.
वहीं, तमिलनाडु और पुदुचेरी के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस डीएमके से अलग होकर चुनावी मैदान में उतरी थी, जिसका खामियाजा दोनों को भुगतना पड़ा था. तमिलनाडु में एआईएडीमके की सरकार बनी थी, लेकिन पुडुचेरी में कांग्रेस की सरकार तो बनी, लेकिन वह डीएमके के समर्थन के सहारे. तमिलनाडु की सत्ता पर इस बार काबिज होने के लिए कांग्रेस ने डीएमके के साथ हाथ मिला रखा है. राहुल गांधी दो बार तमिलनाडु का दौरा इस साल कर चुके हैं और उन्होंने अपने दौरे के जरिए तमाम समुदाय और क्षेत्र के लोगों से सीधा संवाद किया था.
दक्षिण में बीजेपी का प्लान
वहीं, दक्षिण भारत की तीन विधानसभाओं में भाजपा अपनी ताकत बढ़ाने पर जोर दे रही है. तमिलनाडु व केरल में उसकी कोशिश अपने विधायकों को दहाई तक ले जाने की है. तमिलनाडु में भाजपा अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन में है और उसे कड़े मुकाबले में भी खासी सफलता मिलने की उम्मीद है. केरल में भाजपा ने अपना प्रभाव तो बढ़ाया है, लेकिन अभी भी उसे विधानसभा में प्रभावी भूमिका दर्ज कराना बाकी है,अभी उसका एक विधायक ही है, लेकिन पंचायत चुनाव में जिस तरह के नतीजे आए हैं, उससे लगता है कि पार्टी की उम्मीदें बढ़ी है. यही वजह है कि अमित शाह और जेपी नड्डा ने हाल ही में राज्य के दौरे किए हैं.