मुस्लिम वोटों की जरूरत, और सवर्णों से दूरी कायम होने के डर के बीच फंसे नीतीश कुमार भाजपा और जद (यू) गठबंधन में बढ़ रहे संकट को दे रहे हैं और हवा कई साल से नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय और मतदाता पेटी के बीच बड़ी ही सावधानी के साथ संतुलन बिठाए हुए हैं. वे एक व्यवहारकुशल नेता हैं, जो राजनीति की दो धुरियों को साथ लेकर चलने में कुछ भी गलत नहीं मानते. इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि पखवाड़ा भर पहले एक सुबह जब उनकी गठबंधन सहयोगी भाजपा ने पटना में अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक शुरू की तो बिहार के मुख्यमंत्री को एक दरगाह में देखा गया.
12 जून को नीतीश ने अखबार में एक विज्ञापन देखा जिसमें उनकी उस तस्वीर का प्रयोग किया गया था और उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ पकड़े हुए दिखाया गया था. बस फिर क्या था, उन्होंने उसके बाद अपना चौतरफा हमला शुरू कर दिया और भाजपा के बड़े नेता के लिए रात्रि भोज के आयोजन को भी रद्द कर दिया, इस कदम से उन्होंने कुछ लोगों को परेशान जरूर किया लेकिन इससे हैरत किसी को भी नहीं हुई. {mospagebreak}
अपने मेहमान के लिए दरवाजा बंद करना नीतीश जैसे शिष्टाचारकुशल नेता से अपेक्षित नहीं था पर उनकी नाराजगी अप्रत्याशित नहीं थी. राजनीतिक प्रतीकवाद के इस महारथी का गुस्सा फूट पड़ने के इस बार कई कारण मौजूद हैं. नीतीश के राजनीतिक शब्दकोश में इंसान को इस बात से पहचाना जाता है कि वह किसके साथ को नजर-अंदाज करता है. लगता है, नीतीश यह बात साफ कर चुके हैं कि मोदी और वरुण गांधी को बिहार में चुनाव प्रचार से दूर रखना होगा और वे इस बात पर कतई समझैता करने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं.
जाहिर तौर पर नीतीश किसी को भी अपने गठबंधन की रेलगाड़ी में कूद-फांद नहीं करने देंगे. ऐसे में मोदी, जिन्हें 2005 से ही बिहार से दूर रखा गया है, बिहार की मदद करने के कृपा प्रदर्शन के दावों को लेकर किस तरह आसानी से सबके सामने आ सकते हैं? यह बात कोसी बाढ़ राहत कार्य के लिए गुजरात द्वारा दिए गए 5 करोड़ रु. को लौटाने के विवादास्पद फैसले की व्याख्या कर देती है. पैसे लौटाने के इस फैसले को लेकर बिहार में विपक्ष ने काफी काफी हो-हल्ला भी किया और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान ने गुजरात के पैसे को लौटाने को लेकर नीतीश के नजरिये पर प्रश्नचिन्ह भी लगाया क्योंकि कोसी के बाढ़ पीड़ितों का पूर्णतः पुनर्वास अभी होना बाकी है. {mospagebreak}
बदलते घटनाक्रम से भाजपा में कई लोग खुश नहीं हैं. भाजपा विधायक रामेश्वर चौरसिया सवाल करते हैं, ''नरेंद्र मोदी हमारे एक सम्माननीय नेता हैं. ऐसे में कोई उन्हें बिहार से दूर रखने के बारे में सोच भी कैसे सकता है और फिर हमारा दोस्त कैसे रह सकता है?'' भाजपा के प्रवक्ता संजय मयूख ने भी नीतीश कुमार को गुजरात के पैसे लौटाने के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कहा है. यह साफ है कि नीतीश ने इन आलोचनाओं को कोई तवज्जो नहीं दी है. बेशक भाजपा-जद (यू) गठबंधन खतरनाक मोड़ पर नहीं पहुंचा है लेकिन उन दोनों के बीच आपसी विश्वास कम होता स्पष्ट नजर आ रहा है. हालांकि मुख्यमंत्री सबके सामने बहुत ही संतुलित नजर आते हैं. गुजरात की आर्थिक सहायता को लौटाए जाने को लेकर जब मुख्यमंत्री से सवाल पूछा गया तो नीतीश ने सोमवार को कहा, ''शांति रखें, तनाव लेने की कोई जरूरत नहीं है.''
जैसे सब कुछ यहीं खत्म नहीं हुआ, एक पुलिस उपाधीक्षक को विवादास्पद विज्ञापन की जांच के लिए गुजरात के सूरत शहर भेजा गया. हालांकि भाजपा की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आने पर उस पुलिस अधिकारी को वहां से वापस बुला लिया गया. यह सब हाल में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव में जद (यू) उम्मीदवारों द्वारा भाजपा विधायकों के वोट ग्रहण के बावजूद हुआ. सोमवार को विश्वास यात्रा के दौरान राज्य के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी समेत कोई भी बड़ा नेता उनके साथ नजर नहीं आया. नीतीश की विश्वास यात्रा को चुनाव के पहले के प्रचार के रूप में देखा जा रहा है. {mospagebreak}
चेक वापस करने के नीतीश के फैसले के चलते मोदी रविवार को भी मुख्यमंत्री की रैली से नदारद रहे थे, जिसके चलते पटना शहर विधानसभा क्षेत्र में नीतीश की एक बैठक को रद्द करना पड़ा. यह सीट वर्तमान में भाजपा के नंद किशोर यादव के पास है. लेकिन लगता है, नीतीश इस बहिष्कार से कतई विचलित नहीं हुए हैं. साफ तौर पर वे अपने राजनीतिक पत्तों को छिपाए हुए हैं और उनके अगले कदम को लेकर कयासों का बाजार गरम है. नीतीश को डर है कि नरेंद्र मोदी की मौजूदगी राज्य की 16 फीसदी मुस्लिम आबादी को खफा कर देगी, जिसे जीतने के लिए वे भरसक प्रयास कर रहे हैं.
अन्य 'धर्मनिरपेक्ष' नेताओं की तरह बिहार के मुख्यमंत्री भी उस शख्स को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं जिस पर गुजरात के दंगों के आरोप लगाए गए हैं. बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने अपने साढ़े चार साल के शासन में विशेष कल्याण नीतियों के जरिये मुस्लिमों के बीच अपना एक विशेष स्थान बनाया है. उन्होंने दो दशक बाद भागलपुर दंगों का मामला खोला और मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए अन्य कई कदम भी उठाए, उस समुदाय के लिए जिसने पिछले दो दशकों में लालू की जड़ें मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी. {mospagebreak}
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भाजपा इस मोड़ पर नीतीश से अलग हो जाती है तो नरेंद्र मोदी पर उनका रुख उनकी कल्याणकारी योजनाओं से भी ज्यादा फायदा पहुंचाने वाला सिद्ध होगा. अगर अतीत के पन्नों में जाकर नीतीश के पदचिन्हों को देखें तो उससे काफी विरोधाभासी संकेत मिलते हैं. पिछले साल लुधियाना में राजग की रैली के दौरान नीतीश ने मोदी से हाथ मिलाया था. लगता है, वे यह तथ्य भी भूल गए हैं कि उनकी कैबिनेट के सहयोगी खुद को आरएसएस का सदस्य बताते हैं और कहा जाता है कि उन्होंने अयोध्या में कार सेवा भी की थी. नीतीश 1995 में भाजपा की वार्षिक बैठक में भी शामिल हुए थे.
सत्ता में आने के बाद से, नीतीश अपनी पार्टी से बड़े होते गए हैं. उनके पास ऐसा विश्वास करने के कारण भी थे-इसके लिए राज्य भाजपा नेताओं के सजदे का आभारी होना चाहिए-तभी तो वे भाजपा से भी बड़े हो गए. भाजपा नेता, जिनमें नीतीश की कैबिनेट के सदस्य भी शामिल हैं, उस समय अपनी आंखें बंद रखे रहे जब नीतीश भाजपा का कीमत पर नया जनाधार बनाने में लगे हुए थे. ये भाजपा नेता राज्य में गठबंधन धर्म और राजनीतिक औचित्य की आड़ में गौण भूमिका निभाते रहे जबकि वस्तुतः उनका ध्यान अपनी कैबिनेट की कुर्सी में ही रमा रहा. {mospagebreak}
कई लोगों का मानना है कि नीतीश का मौजूदा कदम काफी सोचा-समझा है, यानी भाजपा को उकसाया जाए ताकि वह समर्थन वापस लेने जैसा कदम उठाए, जो चुनाव से पहले उन्हें एक पीड़ित सिद्ध करने में मदद करेगा. नवंबर 2005 से राजग को बिहार में नीतीश द्वारा चलाए जाने वाले गठबंधन के तौर पर जाना जाता रहा है. बस तभी से नीतीश ने शासन और राजनीति के नियमों को बदलकर रख दिया. यही नहीं, उन्होंने इसे बिहार में इसे एक आदमी का खेल बनाकर रख दिया. भाजपा नेताओं का एक धड़ा आज मानता है कि पार्टी को जद (यू) नेता को इतना स्पेस नहीं देना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व-जो अतीत में कई सहयोगी खो चुका है-बिहार के मुख्यमंत्री को हर कीमत पर अपने साथ चाहता था. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में कई लोगों के लिए, नीतीश एक पैमाना थे जिससे वे नई दिल्ली में अपनी संभावनाओं को आंक सकते थे.
यहां तक कि मौजूदा समय में भी गठबंधन को खींचने के लिए भाजपा के केंद्रीय नेता अत्यधिक संयम का दामन थामे नजर आ रहे हैं. इससे भी अधिक यह कि लोकसभा में हार और झरखंड में हालिया राजनैतिक शिकस्त के चलते भाजपा और अधिक नुकसान उठाने के लिए तैयार नजर नहीं आती. दूसरी ओर, इस तरह की दासता ने नीतीश कुमार को भाजपा पर सवार होने का मौका दिया जबकि साथ ही उन्होंने केंद्रीय भाजपा को बिहार से दूर रखने के काम को भी अंजाम दिया. 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में हुई हार के बाद भाजपा सुरक्षात्मक रुख अपना चुकी थी. इसके कारण बिहार में भी पार्टी का जोर कम हुआ दिखता है. नीतीश ने एक सयाने नेता के तौर पर अपने सहयोगी की कमजोरी का भरपूर फायदा उठाया और उसकी कमजोरी से अपने लिए एक मजबूत आधार तैयार कर डाला. {mospagebreak}
उन्होंने पिछले चार साल में, पिछड़ी जातियों, मुस्लिमों और दलितों तक अपनी पहुंच बनाकर एक विलक्षण संयोजन के निर्माण का प्रयास किया है. इसके अलावा, भाजपा के साथ रहने ने उनकी सवर्ण वोटों को रिझाने में भी मदद की. यह समीकरण उन्हें पूरी तरह रास भी आया क्योंकि विपक्ष- कांग्रेस और राजद-लोजपा के अलग-अलग लड़ते रहने के कारण इन समुदायों में उनका आधार बंट गया. भाजपा से अलग होने पर उनके सवर्ण वोट खोने का खतरा मौजूद है. हां, इस सयानेपन का लक्ष्य प्रतिस्पर्धी हितों में संतुलन बैठाना हो सकता है.
गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी की सांप्रदायिक छवि के अलावा भी कुछ ऐसा है जो नीतीश के लिए उन्हें पूरी तरह से दूरी बनाए रखने वाला बना देता है? संभवतः ये उनकी महत्वाकांक्षाएं ही हैं जो उनकी राहें काटती हैं. आने वाले वर्षों में, ये दोनों मुख्यमंत्री संभवतः राष्ट्रीय स्तर पर दो प्रमुख गैर-कांग्रेसी प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं. पटना में आयोजित भाजपा की स्वाभिमान रैली के दौरान, मोदी ने दावा किया कि उन्होंने गुजरात के गांवों में चौबीसों घंटे बिजली सुनिश्चित कराई है. इसे नीतीश के आंगन में ही खुद को एक नए विकास पुरुष के तौर पर सिद्ध करने के प्रयास के रूप में देखा गया है- एक ऐसी बात जिसे नीतीश कुमार कतई नहीं पचा सकते. {mospagebreak}
अब नीतीश का लक्ष्य सत्ता को अपने कब्जे में रखना है. अगर वे चुनाव जीत जाते हैं तो यह कोई असंभव बात नहीं है कि उन्हें 2014 में दिल्ली में होने वाली जंग में मुख्य भूमिका में देखा जाए. इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि लगातार तीन बार गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की निगाहें भी संभवतः शीर्ष पद पर लगी हो सकती हैं. एजेंडा-2014 की दिशा में काम कर रही भाजपा बिहार को मोदी की पहुंच से दूर रखने से खुश नहीं होगी.
राष्ट्रीय कार्यकारिणी से पहले, भाजपा नीतीश की सीमाओं को आंकने और मोदी को राष्ट्रीय स्तर के नेता के तौर पर पेश करने के फॉर्मूले का परीक्षण कर रही है. इसका उलटा असर ही हुआ लेकिन भाजपा यह बखूबी जानती है कि गुजरात के मुख्यमंत्री उन थोड़े शुभंकरों में से हैं जो उन्हें साउथ ब्लॉक के करीब ले जा सकते हैं. इसके अलावा, ऐसा लगता है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का अपने सहयोगी नीतीश पर अडिग विश्वास नहीं रहा है. {mospagebreak}
परिस्थितियां एकदम साफ हैं: मोदी को बिहार से दूर नहीं रखा जा सकता और अगर नीतीश जो पाना चाहते हैं उसमें असफल रहे तो वे अकेले ही कदम बढ़ाना चाहेंगे. अगर भाजपा और जद (यू) अलग होने की राह चुनते हैं तो आगे क्या होगा? लोकसभा चुनाव 2009 के तुरंत बाद 18 विधानसभा सीटों के लिए हुए उप-चुनावों में राजग की हार नीतीश की चुनावों में प्रदर्शन करने में मदद करने की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है. जद (यू) नेता के लिए यह लड़ाई थोड़ी मुश्किल सिद्ध होगी क्योंकि उनकी पार्टी के कुछ लोग ही उनकी राजनीतिक शैली का विरोध करते हैं.
लेकिन तब, अगर सहानुभूति की लहर उनके साथ होती है, नीतीश की सहमति कांग्रेस के साथ बनने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता. अब भाजपा और जद (यू) के नेता गठबंधन को कायम करने को लेकर बातचीत में जुटे हैं. हालांकि अगर वह किसी नए समझैते पर पहुंच भी जाते हैं लेकिन यह कितने समय तक कायम रहेगा, इसके बारे में कुछ नहीं नही कहा जा सकेगा.