बिहार में सीटों के बंटवारे को लेकर एनडीए के सहयोगी दल यानी एलजेपी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ने अपनी मांग तेज कर दी है, लेकिन लगता है बीजेपी को बंटवारे की कोई जल्दी नहीं है. पार्टी पहले भागलपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली निपटा लेना चाहती है और उसके बाद ही सीट बंटवारे को तवज्जो देना चाहती है.
हालांकि, ऐसा भी हो सकता है कि चुनाव तारीखों के ऐलान के बाद ही एनडीए में सीटों का बंटवारा हो. वैसे सीटों के खींचतान को लेकर अंदर की जंग शुरू हो चुकी है, इसके साफ संकेत मिलने लगे हैं. जाहिर तौर पर बीजेपी ने इससे निपटने के लिए खास योजना भी बनाई होगी. आइए समझते हैं सीटों के बंटवारे को लेकर आखिर क्या है बीजेपी का गेमप्लान-
1) एक सितंबर को भागलपुर में प्रधानमंत्री की रैली बीजेपी के लिए अभी तक बिहार में हुई तमाम रैलियों में भीड़ जुटाने के लिहाज से शायद सबसे कठिनाई वाली रैली होने वाली है. साथ ही 30 अगस्त को नीतीश-लालू की स्वाभिमान रैली के मुकाबले का एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी होगा. भागलपुर की रैली मुख्य तौर पर मुंगेर और भागलपुर प्रमंडलों को ध्यान में रखकर आयोजित की गई है.
गठबंधन की राजनीति के दौर में पूर्वी बिहार या अंग प्रदेश के इस भूभाग में बीजेपी के सहयोगी दलों को पारंपरिक तौर पर ज्यादा सीटें मिलती रही हैं. लिहाजा बीजेपी इन इलाकों में अपेक्षाकृत कम सीटों पर फ्रंट पर आकर चुनाव लड़ती रही. लगातार कई वर्षों तक पार्टी के चुनाव न लड़ने से कार्यकर्ताओं में एक स्वाभाविक शिथिलता आ जाती है.
पिछले साल विधानसभा के लिए हुए उपचुनाव में भले ही बांका की सीट बीजेपी ने वापस जीत ली हो, लेकिन भागलपुर की दशकों पुरानी सीट पर बीजेपी को कांग्रेस से शिकस्त झेलनी पड़ी थी. लोकसभा चुनाव में शाहनवाज हुसैन की हार के बाद भागलपुर विधानसभा सीट हारने से बीजेपी के मनोबल पर गहरा असर हुआ था. लिहाजा भीड़ जुटाने के पैमाने पर 1 सितंबर को बीजेपी और उसके तीनों सहयोगी दलों की परीक्षा होने वाली है. तीनों दलों को कितनी सीटें देनी हैं, इसका फैसला लेते वक्त बीजेपी इस रैली में जुटी भीड़ का हिसाब जरूर करेगी.
2) रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के साथ लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे में कोई दिक्कत नहीं आई थी. तब मोदी लहर में सबकी नैया पार लग गई थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में परिस्थितियां बदली हुई हैं . पासवान और कुशवाहा दोनों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ गई हैं तो दूसरी ओर दिल्ली हारने के बाद बीजेपी के लिए बिहार चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न बना हुआ है.
बीजेपी पासवान और कुशवाहा को एक समान महत्व देने के पक्ष में नहीं है. एलजेपी को तो फिर भी एक निश्चित (दलित) आधार वाली पार्टी होने के नाते कुछ ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, लेकिन आरएलएसपी को बीजेपी के प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के नेता ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं हैं. बीजेपी का मानना है कि मनमुताबिक सीटें न मिल पाने पर भी उपेंद्र कुशवाहा के पास अधिक विकल्प नहीं हैं.
नीतीश से जबरदस्त टकराव के बाद जेडीयू से निकले कुशवाहा वापस महागठबंधन की राह नहीं पकड़ सकते, बीजेपी का साथ छूटने पर केंद्र का मंत्रिपद भी जाता रहेगा. छोटी और अपेक्षाकृत नई पार्टी होने की वजह से अकेले चुनाव लड़ने का न तो उनके पास जन-बल है ना ही धन-बल. ऐसे में एनडीए से अलग होने का फैसला उनके राजनीतिक करियर के लिए भारी जोखिम भरा हो सकता है. बीजेपी को डर है कि जिन सीटों पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का उम्मीदवार खड़ा होगा, वहां अगर उसके सामने नीतीश कुमार की जेडीयू का उम्मीदवार रहा तो मतदाता राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की बजाए जेडीयू के पक्ष में मतदान कर देंगे.
ऐसे में जेडीयू को शुद्ध लाभ और एनडीए को शुद्ध हानि की आशंका है. कांटे की टक्कर वाले चुनावी माहौल में निश्चित तौर पर बीजेपी के लिए ऐसी परिस्थिति शुभ नहीं होगी. अभी हाल ही बिहार विधान परिषद की 24 सीटों के चुनाव में भी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी खाता तक नहीं खोल पाई थी. पिछले साल कुछ ऐसी कोशिशें भी हुईं थी कि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का बीजेपी में विलय हो जाए, लेकिन बीजेपी को इसमें सफलता नहीं मिली. अगर सफलता मिल गई होती तो बीजेपी के लिए आज जैसे मुश्किल हालात पैदा नहीं होते.
3) मांझी के करीबी कई विधायकों को पार्टी में शामिल कराने के बाद बीजेपी ने सीटों को लेकर मांझी की सौदेबाजी की क्षमता को पहले से काफी कम दिया है. साथ ही चुनावों के बाद मांझी को एक सम्मानजनक स्थान मिलने का भरोसा भी है, लिहाजा हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा की ओर से सीट बंटवारे में ज्यादा दिक्कत आने की संभावना नहीं दिखती.
4) बिहार में चर्चा है कि बीजेपी न केवल सीट बंटवारे में बल्कि उम्मीदवारों के एलान में भी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाएगी. पार्टी की कोशिश होगी कि पहले महागठबंधन अपने उम्मीदवारों का एलान कर ले उसके बाद एनडीए के उम्मीदवारों का एलान होगा ताकि लालू और नीतीश के अपने-अपने सामाजिक आधारों में पड़ने वाली फूट का एनडीए को फायदा मिल सके. ऐसे में दोनों गठबंधनों की ओर से तू डाल डाल... मैं पात पात की रणनीति पर काम होगा. बीजेपी पहले ही ओबीसी की 2 सबसे बड़े वर्गों- यादव और कुशवाहा को अपने पक्ष में करने की पुरजोरर कोशिश कर रही है.
एक बात तय है कि इस बार बिहार का चुनाव रणनीति और प्रचार के हिसाब से बड़ा ही रोमांचक होने वाला है. तैयार हो जाइए इस महासमर के लिए...