बिहार चुनाव में सारे दल दांव-पेंच की राजनीति में दिलोजान से जुटे हैं. जितने नेता उतनी बातें. विकास, जंगलराज, मंडल, कमंडल के जुमले आम हो गए हैं. हर रैली में विकास की बात होती तो है लेकिन निशाना जाति पर ही होता है. चुनावी बिसात पर सबकी गोटी लाल हो इस आस में सबने जाति के हिसाब से अपने मोहरे सजाए हैं. हालत ये हो गई है कि अब हर दल का नेता भीड़ में खड़ा होकर खुद को कभी राम तो कभी कृष्ण तो कभी सम्राट अशोक का वंशज बताकर वोटरों के सामने अपनी झोली फैलाने में लगा है.
विकास की बात करने वाली बीजेपी ने छात्रों को लैपटॉप, मेधावी छात्राओं को स्कूटी, दलित-महादलित के घरों में रंगीन टीवी, गरीबों को साड़ी-धोती देने के वादे किए हैं. इन सबके बीच गौर करनेवाली बात ये है कि इसमें भी जाति को आगे रखकर सोचा गया है. बिहार में शिक्षा के नाम पर चाहे चरवाहा विद्यालय, मिड-डे मिल, साइकिल, स्कूटी या लैपटॉप की बात हो इसके दम पर शिक्षा के स्तर को कतई नहीं सुधारा जा सकता.
बिहार में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए सबसे पहले सरकारी स्कूलों में बेहतर व्यवस्था के साथ योग्य शिक्षकों की पारदर्शी बहाली जरूरी है. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि जातिवाद को हथियार बनाकर बिहार की जनता को असली मुद्दों से भटकाना इन तमाम दलों को बखूबी आ गया है. बिहार की एक समस्या यह भी कि यहां की बौद्धिक आबादी इन मुद्दों पर चुप्पी साधे बैठी हुई है. आमतौर पर यहां की बुद्धिजीवी आबादी या तो बाहर रहती है या फिर मुख्यधारा की राजनीति से दूर. ऐसे में जनता के बीच मुट्ठी भर राजनेताओं के या फिर छुटभैय्ये नेताओं के संदेश उनके बीच पहुंच रहे हैं.
अगर संत समाज, स्वयंसेवी संस्थाएं और तमाम पढ़े-लिखे लोग एकजुट होकर जातिवाद के खिलाफ जागरुकता फैलाएं तो बिहार की तस्वीर बहुत हद तक निखर सकती है. राजनीतिक नेतृत्व पिछड़ों से छीनना आसान नहीं. बात अगर लालू यादव की करें तो बीजेपी ने उन्हें नीतीश की मदद से 10 साल बिहार की सत्ता से दूर रखा. हकीकत के आइने में झांकें तो नीतीश कभी भी लालू के विरोधी नहीं बल्कि ऐतिहासिक प्रक्रिया में उनके पूरक थे. बिहार में अगर लालू यादव नहीं आते तो नीतीश की राजनीति का रास्ता नहीं बनता. नीतीश नहीं होते तो जीतनराम मांझी जैसे महादलित की अहमियत नहीं होती. नीतीश-लालू नहीं होते तो बीजेपी की राजनीति में पासवान, कुशवाहा और मांझी की मौजूदा हैसियत नहीं होती. आज हम जिसे जाति की राजनीति कह रहे हैं वह नहीं होती. ऐसे में लोकतंत्र बस कुछ लोगों के हाथ का खिलौना होता. देश में अगड़ों का ही बोलबाला होता. अलबत्ता इस राजनीति के कुछ पहलू मसलन भ्रष्टाचार, अपराधीकरण मायूस करनेवाले हैं जो इस प्रक्रिया के खिलाफ जाते हैं.
दूसरी ओर जातिवाद, अपराधीकरण और पैसे के इस खेल पर थू-थू करने वाले अक्सर अपने चुनावी फायदे के लिए इससे कहीं ज्यादा खतरनाक सांप्रदायिक राजनीति करते देखे जाते हैं. युवा वोटरों पर नजर नहीं बिहार में जाति की राजनीति में उलझे दलों की नजर से युवा पीढ़ी नदारद है. वो युवा पीढ़ी जो आज की तकनीक से कदमताल करते हुए हर जगह अपना परचम लहरा रखा है. वो युवा पीढ़ी जिसे अच्छे-बुरे की पहचान है. वो युवा पीढ़ी जो अब वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट पढ़ रही है. आज ये युवा पीढ़ी इस बात के लिए दुखी है कि सुनहरे अतीत वाला उनका बिहार विकास की रफ्तार में 21वें पायदान पर बैठकर अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है. वहीं झारखंड में निवेशक इतने लुभा रहे हैं कि वो विकास की रफ्तार में तीसरे नंबर पर सीना ताने खड़ा है. बिहार का युवा वोटर अब जाति को नकारकर रोजी-रोटी का सवाल उठा रहा है. बिहार का युवा बीमारू राज्य की तोहमत से बाहर निकलने के लिए आतुर है. साफ है कि इस वर्ग का जनादेश जाति नहीं काम पर होगा. ऐसे में समझा सकता है कि बिहार की युवा पीढ़ी किस करवट बैठने वाली है.
कहने की जरुरत नहीं कि बिहार में हर सियासी उथल-पुथल की अपनी अहमियत है. यहां के हर चुनाव में जातिवाद एक कटु सत्य है इससे आसानी से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता. उम्मीद की जानी चाहिए कि इस चुनाव में ना तो राजपूत, भूमिहार, यादव होगा और ना ही पिछड़ा और दलित. ये भी उम्मीद की जानी चाहिए कि इस चुनाव में बड़े मुद्दे पर बिहारी समाज अपने ढंग से होशो-हवास में प्रतिक्रिया देगा जो जाति पर कतई आधारित नहीं होगा. तो देखना यह है कि कई वजहों से बेहद अहम हो गया बिहार विधानसभा का इस बार का चुनाव अपने आखिरी नतीजे में क्या तस्वीर पेश करता है?