बिहार विधानसभा के चुनाव में भले ही बीजेपी बिना मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित किए उतरी हो लेकिन अगर चुनाव बाद किसी की संभावना बनती है तो उस सूची में नंद किशोर यादव का नाम सबसे ऊपर आता है. आइए डालते हैं नंद किशोर यादव के राजनीतिक जीवन पर एक नजर:
1. नंद किशोर यादव बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और पार्टी के तमाम समीकरणों में सबसे फिट बैठते हैं. सुशील मोदी जहां केंद्रीय संगठन में काबिज शाह-मोदी गुट में फिट नहीं बैठते वहीं नंदकिशोर यादव किसी भी गुट से नहीं दिखते हैं. वहीं सुशील मोदी पर एनडीए सरकार के दौरान नीतीश कुमार का करीबी होने का आरोप लगा तो नरेंद्र मोदी को पीएम कैंडिडेट बनाने के वक्त सुशील मोदी आडवाणी खेमे के माने गए. ये सारे तथ्य सुशील मोदी से नंद किशोर यादव को पार्टी में बढ़त दिलाते हुए दिखते हैं.
2. नन्द किशोर यादव के पक्ष में एक बात बहुत ज्यादा मतबूत है वह है उनका संघ से जुड़ा होना . नंदकिशोर यादव छात्र जीवन में ही 1969 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे.
3. जेपी आंदोलन में भी नन्द किशोर यादव सक्रिय रहे. 1971 में वे विद्यार्थी परिषद में सक्रिय हुए . 1974 में जेपी आंदोलन में सक्रिय, पटना सिटी छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष बने. 1974 में जेपी के आह्वान पर B. Sc. के फाइनल परीक्षा का बहिष्कार किया और जेल भी गए.
4. नंदकिशोर यादव के पास हर स्तर की राजनीति का अनुभव है. नन्द किशोर यादव 1978 में पटना नगर निगम में पार्षद चुने गए. 1982 में पटना के उप महापौर चुने गए. 1983 में पटना महानगर अध्यक्ष 1990 में पार्टी के युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए. 1995 में पटना पूर्वी क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव लड़ा और विधायक चुने गए.
5. बिहार संगठन में मजबूत पकड़ भी नन्द किशोर यादव के पक्ष में है. 1998 से 2003 तक वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे. वर्ष 2000, 2005 में भी विधायक चुने गए. नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए सरकार में पथ परिवहन, पर्यटन, स्वास्थ्य मंत्री रहे. उन्हें बेहतर कामकाज करने वाले मंत्री के रूप में सम्मानित किया जा चुका है. जून 2013 में नीतीश और भाजपा के अलग होने के बाद वे बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए गए.
6. नन्द किशोर यादव बीजेपी में यादव जाति के बड़े नेता हैं. यादवों का बिहार की राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव है. बिहार में यादव समुदाय का 21 फीसदी वोट है. हालांकि, आरजेडी से आए रामकृपाल यादव का कद भी यादव विरादरी में काफी बड़ा है. लालू यादव के करीबी रहे रामकृपाल यादव भी बीजेपी आला कमान के समक्ष अपनी दावेदारी जता सकते हैं.
पहले ये चर्चा थी कि बीजेपी चुनाव से पहले ही नन्द किशोर यादव को सीएम कैंडिडेट घोषित करेगी लेकिन तमाम जातीय समीकरणों की संभावना बनाए रखने के लिए चुनाव से पहले उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया. लेकिन अगर चुनाव में बीजेपी को बहुमत मिलती है तो नंदकिशोर यादव के लिए काफी संभावनाएं बचती हैं.