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पेरियार के आंदोलन से निकले थे द्रविड़ नेता अन्नादुरई, फिर तमिलनाडु की सियासत में घोल दिया फिल्मी कॉकटेल

अन्नादुरई का कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा. कैंसर के कारण 3 फरवरी 1969 को उनका निधन हो गया. गिनीज बुक में अन्नादुरई के नाम एक रिकॉर्ड भी है, उनके अंतिम संस्कार में डेढ़ करोड़ लोग शामिल हुए थे. वो 1967 में मुख्यमंत्री बने थे.

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अन्नादुरई और पेरियार (फाइल फोटो)
अन्नादुरई और पेरियार (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • इसी साल होना है तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव
  • राज्य की राजनीति में सिनेमा की जड़ें बहुत गहरी

दक्षिण भारत का दिलचस्प सियासी अखाड़ा तमिलनाडु में ही सजता है क्योंकि यहां के सियासी दंगल के नियम-कायदे रूपहले पर्दे के सितारे तय करते रहे हैं. तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा की जड़ें बहुत गहरी हैं और इसकी शुरुआत सीएन अन्नादुरई से होती है. यहां की राजनीति में फिल्मी कॉकटेल परोसने का श्रेय सीएन अन्नादुरई को ही जाता है. राजनीति में आने से पहले अन्नादुरई फिल्मों और नाटकों की पटकथा लिखा करते थे. कहा जाता है कि अन्नादुराई पहले ऐसे द्रविड़ नेता थे जिन्होंने तमिल सिनेमा का प्रयोग राजनीतिक प्रचार के लिए किया.

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दक्षिण भारत में 1916 में ही दलित और पिछड़ी जातियों को लेकर राजनीतिक आंदोलन चरम पर था. 1925 में सामाजिक चिंतक पेरियार ईवी रामासामी ने दलित और पिछड़ी जातियों को समाज में बराबरी का हक दिलाने के लिए आत्मसम्मान आंदोलन शुरू किया तो अन्नादुरई भी इससे जुड़ गए. पेरियार ने 1944 में ‘द्रविड़ार कड़गम’ का गठन किया, जिसका नाम पहले जस्टिस पार्टी था, लेकिन 5 साल बाद ही 1949 में द्रविड़ार कड़गम दो फाड़ हो गई. इस बंटवारे की पटकथा लिखने वाले भी अन्नादुरई ही थे.

दरअसल, द्रविड़ कड़गम गैर राजनैतिक पार्टी थी जिसने पहली बार द्रविड़नाडु (द्रविड़ों का देश) बनाने की मांग रखी थी. वहीं,  पेरियार चुनाव में हिस्सा लेने के पक्ष में नहीं थे. कहा जाता है पेरियार की शादी को लेकर भी उस वक्त काफी तरह की बातें हो रही थीं. इसी के बाद पेरियार और अन्नादुरई में मतभेद बढ़ने लगे और फिर दोनों अलग हो गए.

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कब हुआ ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (डीएमके) का गठन?

अन्नादुरई ने 1956 में ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (डीएमके) नाम से एक अलग दल बना लिया. अन्नादुरई जनता पर फिल्म और फिल्मी सितारों के असर को भाप चुके थे, इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे कई फिल्मी शख्सियतों को अपने साथ जोड़ा. इनमें रामास्वामी के अलावा, एनएस कृष्णन, एमआर राधा, शिवाजी गणेशन, एसएस राजेंद्रन, मारुदुर गोपालन रामचन्द्रन (एमजीआर) और एम करुणानिधि प्रमुख थे. इसका असर भी हुआ और डीएमके ने 1967 में 234 में से 138 सीटें पर कब्जा जमाकर राज्य में सरकार बना ली और अन्नादुरई मुख्यमंत्री बने.

अन्नादुराई के अंतिम संस्कार में जुटे थे 1.5 करोड़ लोग

अन्नादुरई का कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा. कैंसर के कारण 3 फरवरी 1969 को उनका निधन हो गया. गिनीज बुक में अन्नादुरई के नाम एक रिकॉर्ड भी है, उनके अंतिम संस्कार में डेढ़ करोड़ लोग शामिल हुए थे. अन्नादुराई ने अपने कार्यकाल में दो भाषा (तमिल-इंग्लिश), दहेज प्रथा का विरोध और सब्सिडी को लेकर जो काम किया, उसी पर आज भी राज्य की सियासी गोटी सेट होती है. उदहारण के तौर पर अम्मा कैंटीन, जहां सब्सिडी दी जाती है.  

फिर आई करुणानिधि के पास कमान

अन्नादुरई के निधन के बाद डीएमके की कमान तमिल सिनेमा के लेखक और कवि एम करुणानिधि के हाथ में आ गई. एम करुणानिधि राज्य के मुख्यमंत्री बने और पार्टी में दूसरे बड़े कद के नेता के रूप में अभिनेता मारुदुर गोपालन रामचन्द्रन (एमजीआर) उभरे. 1971 में लगातार दूसरी बार डीएमके बड़े बहुमत से सत्ता में लौटी और करुणानिधि फिर मुख्यमंत्री बने.

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इस बीच उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे और पार्टी के दूसरे सबसे कद्दावर नेता एमजीआर से तकरार बढ़ने लगी. दोनों दिग्गजों के बीच इतना मामला बिगड़ गया कि करुणानिधि ने एमजीआर को पार्टी से निकाल दिया.

एमजीआर के बाद जे. जयललिता की एंट्री

इसके बाद 1972 में एमजीआर ने अलग पार्टी (अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) बनाई. एमजीआर 1977 से लेकर 1987 तक तमिलनाडु के मुख्‍यमंत्री रहे. फिर तमिलनाडु की सियासत में जे. जयललिता की एंट्री हुई. जयललिता की एंट्री के वक्त भी सियासी घमासान मचा था. एमजीआर की मौत के बाद जयललिता ने खुद को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और राज्य की मुख्यमंत्री बन गईं.

वहीं, पार्टी का एक और धड़ा एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ था, जिसके बाद पार्टी टूट गई. 1989 में जब चुनाव हुए तो AIADMK को करारी शिकस्त मिली और पार्टी के दोनों धड़े एक साथ फिर आ गए. हालांकि अब DMK और AIADMK में कोई बड़ा फिल्मी चेहरा नहीं है, लेकिन कमल हासन की एंट्री से राज्य की सियासत फिर रूपहले पर्दे के इर्द-गिर्द घूमने लगी है.  

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