उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की बढ़ती सियासी सरगर्मियों के बीच बीजेपी ने अपने तमाम दिग्गज नेताओं को चुनावी मैदान में उतारकर आसपास की सीटों को सियासी तौर पर प्रभावित करने की रणनीति बनाई है. सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा तक ने चुनाव लड़ने का प्लान बनाया है. वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने साफ तौर पर कह दिया कि वह 2022 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे.
अखिलेश यादव इसी फॉर्मूले के तहत 2012 के चुनाव में भी नहीं उतरे थे. सपा के सत्ता में आने के बाद विधान परिषद के जरिए विधानमंडल के सदस्य बने थे. विधानसभा चुनाव न लड़ने का फैसला अखिलेश यादव की सोची समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
बिहार के सीएम नीतीश कुमार की तर्ज पर अखिलेश यादव भी खुद विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरने के बजाय पार्टी प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभालेंगे. हालांकि, सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव इटावा की जसवंत नगर सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं, जहां से फिलहाल अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव विधायक हैं. वहीं, अखिलेश अभी मौजूदा समय में आजमगढ़ संसदीय सीट से लोकसभा सदस्य हैं.
चुनाव न लड़ने के पीछे मकसद
अखिलेश यादव 2022 विधानसभा चुनाव ऐसे ही नहीं लड़ रहे हैं बल्कि उसके पीछे कई सियासी कारण हैं. इसमें एक कारण है कि अखिलेश यादव अगर किसी एक विधानसभा सीट से कैंडिडेट बनते हैं तो बीजेपी और बसपा जैसे विपक्षी दल उनके खिलाफ अपने मजबूत प्रत्याशी उतारकर उन्हें घेर सकते हैं. ऐसे में अखिलेश को अपनी सीट निकालने के लिए चुनाव प्रचार के लिए ज्यादा से समय अपने क्षेत्र को देना होगा, जिससे प्रदेश की बाकी सीटों पर चुनाव अभियान प्रभावित होगा. इसीलिए अखिलेश खुद प्रत्याशी बनकर अपने को सीमित नहीं रखना चाहते हैं.
अखिलेश के कंधों पर बड़ा जिम्मा
अखिलेश यादल सपा के अध्यक्ष हैं और पार्टी के सबसे बड़े चेहरा हैं. ऐसे में उन्हें सूबे की सत्ता में वापसी के लिए सभी 403 सीटों पर सपा और सहयोगी दलों के प्रत्याशी के प्रचार करने का जिम्मा है. इसीलिए अखिलेश ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने सभी प्रत्याशी के लिए प्रचार करेंगे, लेकिन खुद कहीं से चुनाव नहीं लड़ेंगे.
सीएम योगी, केशव मौर्य और दिनेश शर्मा ने भी 2017 के चुनाव में इसी रणनीति पर काम किया था. वहीं, मायावती भी सूबे में विधानसभा चुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद का सहारा लेती रही हैं. एमएलसी का विकल्प होने के चलते सूबे में तमाम बड़े नेता खुद को चुनावी मैदान से बाहर रखकर अपना फोकस बाकी सीटों के प्रचार पर रखते हैं.
सपा के एकलौते स्टार प्रचारक
सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव लंबे समय से बीमार चल रहे हैं. अस्वस्थ होने के चलते मुलायम सिंह न तो 2017 में और न ही 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रचार करने उतरे. शिवपाल यादव अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं तो आजम खान जेल में हैं. ऐसे में सपा में कुल मिलाकर अखिलेश यादव ही एकलौते नेता हैं, जिनके ऊपर पार्टी के प्रचार का पूरा दारोमदार टिका हुआ है. इसीलिए अखिलेश ने चुनाव लड़ने के बजाय प्रचार करने और रणनीति बनाने पर अपना पूरा जोर लगाने की रणनीति बनाई है.
यूपी में योगी पांच साल सत्ता में रहने के बाद इस बार के चुनाव में बीजेपी को सपा से ही कड़ी चुनौती मिलती हुई नजर आ रही है. अखिलेश यादव के साथ ही सपा कार्यकर्ता भी जोश से भरे हुए नजर आ रहे हैं. ऐसे में अखिलेश अपने हाथों से मौका नहीं गंवाना चाहते हैं. इसीलिए उनका पूरा फोकस मिशन-2022 पर लगा रखा है, क्योंकि अखिलेश को यह पता है कि इस बार चुनाव हारे तो फिर सूबे में वापसी कर पाना बहुत मुश्किल होगा.