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Amroha Assembly Seat: सपा का इस सीट पर लगातार रहा है कब्जा, इस बार टूटेगा जीत का सिलसिला?

अमरोहा विधानसभा सीट पर अब तक 2 विधानसभा चुनाव हुए हैं और दोनों ही चुनाव में समाजवादी पार्टी के नेता महबूब अली ने सीट पर कब्जा जमाया. अमरोहा विधानसभा सीट पर लगभग कुल 309048 वोटर हैं जिनमें 146987 महिलाएं और 162049 पुरुष वोटर हैं .

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Uttar Pradesh Assembly Election 2022( Amroha Assembly Seat).
Uttar Pradesh Assembly Election 2022( Amroha Assembly Seat).
स्टोरी हाइलाइट्स
  • महबूब अली लगातार पांचवीं बार विधायक हैं
  • अमरोहा सीट पर लगातार सपा का कब्जा

किसानों का गढ़ कहे जाने वाले अमरोहा जिले की विधानसभा अमरोहा (41) जिले का हेड क्वार्टर है. पहले इस इलाके को मिनी छपरोली के नाम से जाना जाता था. नए परिसीमन के बाद वोटरों का समर्थन सपा को मिला. समाजवादी पार्टी ने इस विधानसभा सीट पर कब्जा जमाया. अमरोहा सीट पर ना कभी बीजेपी को, ना ही बसपा को सफलता मिली. सपा से महबूब अली लगातार पांचवीं बार विधायक हैं. बहुजन समाज पार्टी लगातार पिछले दो चुनाव में दूसरे नंबर पर रही है. वहीं, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस लगातार अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही हैं.

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गंगा के मैदानी इलाके में बसे अमरोहा जिले को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने ज्योतिबा फुले नगर का नाम दिया था. किसान बाहुल्य जिला होने की वजह से हमेशा से अमरोहा का नाम किसान आंदोलन को लेकर सुर्खियों में रहता है और चाहे महेंद्र सिंह टिकैत के सफर का संग्राम हो और या 23 दिन रेलवे ट्रैक को किसानों द्वारा जाम करने का मामला हो. प्रदेश की राजधानी लखनऊ हो या देश की राजधानी दिल्ली दोनों से अमरोहा रेलवे मार्ग और सड़क द्वारा सीधे तौर पर जुड़ा है. जिले के बीचों बीच से नेशनल हाईवे 9 गुजरता है, जो सीधे देश की राजधानी दिल्ली से प्रदेश की राजधानी लखनऊ को जोड़ता है. लखनऊ से दिल्ली को जोड़ने वाला रेल मार्ग सबसे व्यस्त रेल मार्ग में से एक है.

जिला मुख्यालय पर बसे अमरोहा में उर्दू हिंदी और पंजाबी भाषाएं मुख्य तौर पर इस्तेमाल की जाती हैं और संकरी गलियों में बसा अमरोहा वैसे तो छोटे- छोटे उद्योगों को अपने में समाए हुए है, पर अमरोहा की ढोलक की थाप हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक अपनी धाक जमाने में पीछे नहीं रही है. आम के बाग की बहुतायत होने की वजह से अमरोहा में ढोलक कारोबार का जन्म हुआ. घरों में महिलाएं बीड़ी बनाने का काम करती हैं तो वहीं कपड़े की कतरों की धुनाई के बाद रूई बनाने का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है. फलों के राजा आम ने भी अमरोहा को कई देशों से जोड़ने का काम किया है और बड़े पैमाने पर आम का निर्यात किया जाता है.

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राजनीतिक पृष्ठभूमि

अमरोहा एक जमाने में कांठ विधानसभा सीट का हिस्सा हुआ करता था. जिसको अलग करके अमरोहा विधानसभा 41 का नाम दिया गया. परिसीमन के बाद अमरोहा विधानसभा सीट पर अब तक 2 विधानसभा चुनाव हुए हैं और दोनों ही चुनाव में समाजवादी पार्टी के नेता महबूब अली ने सीट पर कब्जा जमाया. दोनों चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने कांटे की टक्कर दी. परिसीमन से पहले भी कांठ विधानसभा सीट पर महबूब अली ने कब्जा जमाया था और महबूब अली लगातार पांच बार से विधायक हैं.

मौजूदा विधायक महबूब अली.

सामाजिक ताना-बाना

यह सीट मुस्लिम बाहुल्य सीट की श्रेणी में आती है. अमरोहा सीट आर्थिक दृष्टिकोण से पिछड़े इलाकों में आती है क्योंकि यहां छोटे-छोट, उद्योग घरों में चलाए जाते हैं. कोई बड़ा इंडस्ट्रियल एरिया या कारोबार नहीं है. पहले यह कांठ विधानसभा हुआ करती थी. उस समय अमरोहा विधानसभा मिनी छपरौली के नाम से जानी जाती थी. जहां जाट नेताओं और जाट वोटर का कब्जा रहता था. लेकिन बाद में अन्य विधानसभाओं का गठन हुआ. फिलहाल अमरोहा विधानसभा में लगभग 70% मुस्लिम समुदाय के लोग निवास करते हैं और सीट मुस्लिम बाहुल्य मानी जाती है. अमरोहा विधानसभा सीट पर लगभग कुल 309048 वोटर हैं जिनमें 146987 महिलाएं और 162049 पुरुष वोटर हैं.       

2017 का जनादेश

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इस सीट पर परिसीमन के बाद जब से यह अमरोहा विधानसभा सीट अस्तित्व में आई है तब से समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता महबूब अली का ही इस सीट पर कब्जा रहा है. इस बार भी समाजवादी पार्टी के महबूब अली ने ही 74713 वोट पाकर बाजी मारी जबकि बहुजन समाजवादी पार्टी के नेता नौशाद अली दूसरे नंबर पर रह थे. उन्हें लगभग 59671 वोट हासिल किए थे. जबकि भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार 45420 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे. इस सीट पर लगभग 70 प्रतिशत मतदान हुआ था.  

विधायक का रिपोर्ट कार्ड

वर्तमान समाजवादी पार्टी विधायक महबूब अली का जन्म 7 अप्रैल 1953 को शकरपुर गांव में हुआ था. महबूब अली ने इंटर तक की शिक्षा नेहरू स्मारक इंटर कॉलेज रजबपुर से प्राप्त की है. महबूब अली की शादी सकीना बेगम के साथ हुई. वह घरेलू महिला हैं. राजनीतिक समीकरण के चलते सकीना बेगम को भी जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित किया गया और उसके बाद महबूब अली ने अपने बड़े बेटे परवेज अली को एमएलसी के पद पर निर्वाचित कराया. महबूब अली के दो बेटे हैं, जिनमें एक मौजूदा एमएलसी मुरादाबाद मंडल हैं. वहीं, दूसरे बेटे ने महबूब अली के बिजनेस को संभाला हुआ है. पेट्रोल पंप से लेकर स्कूल कॉलेज तक हाई प्रोफाइल बिजनेस में उन्होंने अपनी जड़ें जमा ली हैं.

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कांठ विधानसभा सीट से महबूब अली सन 1993 में जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार विधायक बने थे. इसके बाद 1996 में समाजवादी पार्टी से वह चुनावी मैदान में उतरे थे लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. इसके बाद साल 2002 में राष्ट्रीय परिवर्तन दल के बैनर तले जेल में रहते हुए ही जीत हासिल की. उसके बाद से लगातार वह समाजवादी पार्टी से लगातार विधायक बने हुए हैं. महबूब अली ने अपने कैरियर की शुरुआत कोऑपरेटिव डेयरी के चेयरमैन के पद पर की थी. सन 1985 में डेरी का चुनाव जीतकर सियासी पारी शुरू की और उसके बाद फिर 1989 के विधानसभा चुनाव में नामांकन दाखिल किया था और सियासत में पहली बार अपनी दावेदारी पेश की थी.

साल 2017 विधानसभा चुनाव में तुर्क जाति से संबद्ध रखने वाले हिस्ट्रीशीटर शौकत पाशा की मौत के बाद महबूब अली को भारी विरोध का सामना करना पड़ा था और तुर्क बिरादरी के लोगों ने महबूब अली के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किए थे. लेकिन सियासी जोड़-तोड़ में माहिर महबूब अली ने तूफान की शक्ल ले चुके विरोध का सामना करते हुए जीत हासिल की और लोगों को अपना लोहा मनवाया.

 

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