उत्तर प्रदेश में सियासी जमीन तलाशने में जुटे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुसलमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की नजर मुस्लिम समुदाय पर है. ओवैसी इन दिनों सूबे में सपा के हार्डकोर वोटबैंक मुस्लिम-यादव समीकरण को तोड़कर अपना राजनीतिक आधार तैयार करने में लगे हैं. ऐसे में ओवैसी मुस्लिमों के मुद्दों पर अखिलेश यादव सहित गैर-बीजेपी दलों की खामोशी को सियासी हथियार बना रहे हैं तो साथ ही सपा के यादव मतदाताओं की वफादारी पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं.
सपा की खामोशी को ओवैसी बना रहे हथियार
हैदाराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी इन दिनों यूपी में लगातार चुनावी दौरा करने में जुटे हैं. ओवैसी मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए सिर्फ योगी-मोदी सरकार और बीजेपी पर ही निशाना नहीं साध रहे हैं बल्कि मुस्लिम के मुद्दों पर गैर-बीजेपी दलों के रवैए को लेकर भी सवाल खड़े रहे हैं. मुस्लिमों के युवाओं की गिरफ्तारी से लेकर धर्मांतरण मामले में आरोपी मौलाना कलीम सिद्दीकी को लेकर ओवैसी ने कहा कि सपा, बसपा, कांग्रेस क्यों नहीं बोलती हैं.
यादव वोटरों की वफादारी पर खड़े किए सवाल
यूपी के अयोध्या, बाराबंकी, संभल, प्रयागराज और कानपुर के बाद गुरुवार को बहराइच रैली में भी ओवैसी इसी एजेंडे पर बोलते नजर आए. ओवैसी ने बहराइच में कहा कि वह यूपी में वोट काटने नहीं, बल्कि मजबूती के साथ चुनाव लड़ेंगे. सूबे में 71 फीसद हिंदुओं ने बीजेपी को वोट किया जबकि 75 फीसदी मुसलमानों ने सपा-बसपा को वोट दिया. इसके बाद भी उनके 15 सांसद ही सफल हुए. सपा में अखिलेश परिवार के ही तीन लोग चुनाव हार गए, क्योंकि इनका यादव वोटर ही मोदी के लिए वोट डाल आया.
सपा के हार्डकोर वोट माने जाने वाले यादव समुदाय के वफादारी पर सवाल खड़े करते हुए ओवैसी ने साफ तौर पर कहा कि 2017 और 2019 के चुनाव में यह साबित हो चुका है कि यादव वोटर अब सपा के साथ नहीं रहा बल्कि वो अब बीजेपी के साथ है. इसके साथ वो भी बताते नजर आए कि महाराष्ट्र में हमारे प्रत्याशी ने औरंगाबाद में शिवसेना के उम्मीदवार को हराया है, जो काम एनसीपी-कांग्रेस नहीं कर सकी, वह हमारी पार्टी ने किया. इस तरह ओवैसी सपा के प्रति मुसलमानों में अविश्वास पैदा करके मुस्लिम-यादव गठजोड़ को तोड़ने का दांव चल रहे हैं.
एम-वाई समीकरण को तोड़ने की रणनीति
दरअसल, असदुद्दीन ओवैसी यह बात बेहतर तरीके से समझ रहे हैं कि यूपी की सियासत में जगह बनाने के लिए अखिलेश के एम-वाई समीकरण को बिना तोड़े कामयाब नहीं हुआ सकते हैं. सपा का सियासी आधार तीन दशकों से इसी पर टिका हुआ है, जिसके दम पर मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक सूबे में मुख्यमंत्री बनते रहे. यूपी में 20 फीसदी मुस्लिम और 10 फीसदी यादव वोटर है.
यूपी में हर पांचवा वोटर मुस्लिम है. सपा 2022 के चुनाव में इन यादव-मुस्लिम वोटों के साथ दूसरे समुदाय के वोटों को भी साधने में जुटी है, लेकिन सूबे के बदले सियासी माहौल में अखिलेश मुस्लिमों को लेकर पहले तरह मेहरबान नजर नहीं आ रहे हैं. इस तरह से अखिलेश सपा के मुस्लिम परस्ती के मुद्दे से बचने की कवायद कर रहे हैं, क्योंकि 2017 में सपा ने इसी एजेंडे पर घेरा था. यही वजह है कि अखिलेश इस बार एम-वाई समीकरण की परिभाषा को बदल दिया है. मुस्लिम-यादव के बजाय वो एम-वाई को महिला और यूथ समीकरण बता रहे हैं. अखिलेश यादव के इसी सियासी मजबूरी का ओवैसी चुनावी हथियार बना लिया है.
यादवों की पसंद बनी बीजेपी
ओवैसी कहते हैं कि यूपी के मुस्लिम वोटरों ने अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनने में मदद की, लेकिन इसके बादले मुस्लिमों मिला क्या. मुसलमानों को संतरी और चपरासी की नौकरी करनी पड़ी जबकि सत्ता की मलाई यादवों ने खाईं. अखिलेश-मुलायम ने सत्ता में रहते सिर्फ यादव का भला किया, लेकिन अब वो भी सपा को छोड़कर बीजेपी में चले गए.
साथ ही ओवैसी कहतें हैं कि सपा के यादव वोटर बीजेपी को उस जगह खास पसंद करती हैं, जहां बीजेपी का यादव प्रत्याशी होता है. अयोध्या के रुदौली में ओवैसी ने इस बात को जोर देकर कहा था, क्योंकि 2017 चुनाव में सपा के मुस्लिम प्रत्याशी के सामने बीजेपी के यादव कैंडिडेट था. यहां यादव समुदाय ने सपा से ज्यादा बीजेपी के पक्ष में खड़े नजर आए थे, जिसके चलते सपा को हार का सामना करना पड़ा था.
रुदौली और संभल में यह बात कह कर ओवैसी ने गैर-भाजपा विरोधियों द्वारा यूपी में AIMIM के चुनाव लड़ने पर उठाए जा रहे सवाल का जवाब दिया है. ओवैसी पर आरोप लगता कि बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए मुस्लिम वोटों का बटवारा करती है. बाराबंकी में ओवैसी ने कहा कि 20 फीसदी मुस्लिम वोट देकर 10 फीसदी वाले यादव समाज को मुख्यमंत्री बना सकते हैं, लेकिन यादव मुस्लिम को वोट देकर विधायक नहीं बना सकता.
साथ ही ओवैसी ने पूछा कि यादव वोट बीजेपी को करता है तो सपा को बीजेपी की बी-टीम क्यों नहीं कहा जाता. इस तरह असदुद्दीन ओवैसी यूपी में मुसलमानों के भावनाओं को जगाकर अपना राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं. ऐसे में देखना है कि 2022 के चुनाव में ओवैसी क्या सपा के एम-वाई यानि मुस्लिम-यादव समीकरण को तोड़कर अपनी सियासी जगह बना पाते हैं या फिर सपा के साथ ही मुस्लिम खड़ा नजर आता है?