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मुस्लिमों को याद रहे मुजफ्फरनगर और मलियाना, मायावती की क्यों है मंशा?

मायावती ने खासकर पश्चिम यूपी के मुसलमानों से कहा कि मेरठ का मलियाना कांड और 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे को नहीं भूलना चाहिए. मेरठ का मलियाना कांड कांग्रेस सरकार के दौरान हुआ था जबकि मुजफ्फरनगर का दंगा सपा सरकार में हुआ था और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे. इन दोनों ही घटनाओं में मुस्लिम समुदाय के जान-माल का काफी नुकसान हुआ था. यही वजह है कि मायावती ने दोनों ही घटनाओं का जिक्र करके कांग्रेस और सपा से मुसलमानों को दूर रहने के लिए अह्वावन किया. 

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बसपा प्रमुख मायावती
बसपा प्रमुख मायावती
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मुजफ्फरनगर दंगा सपा सरकार के दौरान हुआ था
  • मलियाना कांड के दौरान केंद्र-राज्य में कांग्रेस सरकार थी
  • पश्चिम यूपी में मुस्लिम सियासी तौर पर काफी प्रभावी

उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए बसपा प्रमुख मायावती पार्टी ने सियासी समीकरण दुरुस्त करने के साथ-साथ अब फ्रंटफुट पर आकर खुद मोर्चा संभाल लिया है. मायावती ने मंगलवार को राजधानी लखनऊ में प्रबुद्ध सम्मेलन के समापन के दौरान ब्राह्मण समुदाय के साथ-साथ मुसलमानों को भी साधने की कवायद की. मायावती ने सत्ता में आने पर ब्राह्मण समाज को सुरक्षा, सम्मान और तरक्की का भरोसा दिलाया तो मुसलमानों को सपा और कांग्रेस से सतर्क रहने के लिए कहा.

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मायावती ने खासकर पश्चिम यूपी के मुसलमानों से कहा कि मेरठ का मलियाना कांड और 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे को नहीं भूलना चाहिए. मेरठ का मलियाना कांड कांग्रेस सरकार के दौरान हुआ था जबकि मुजफ्फरनगर का दंगा सपा सरकार में हुआ था और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे. इन दोनों ही घटनाओं में मुस्लिम समुदाय के जान-माल का काफी नुकसान हुआ था. यही वजह है कि मायावती ने दोनों ही घटनाओं का जिक्र करके कांग्रेस और सपा से मुसलमानों को दूर रहने के लिए अह्वावन किया. 

दोनों पार्टी से दूर रहे मुसलमान

मायावती ने कहा कि कांग्रेस और सपा दोनों की ही सरकारों में मुस्लिमों का यह हाल हुआ था. ऐसे में मुसलमानों को इन दोनों ही पार्टी से दूर रहना चाहिए. साथ ही संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान को लेकर मायावती ने सवाल खड़े करते हुए कहा कि मैं आरएसएस से एक बात पूछना चाहती हूं कि भारत के हिंदू और मुसलमानों के पूर्वज एक हैं तो आरएसएस और भाजपा मुस्लिमों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों करती है?

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दरअसल, उत्तर प्रदेश में 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता काफी अहम भूमिका में हैं. सूबे की कुल 403 सीटों में से 143 सीटों पर मुस्लिम अपना सियासी असर रखते हैं. इनमें से 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी बीस से तीस फीसद के बीच है जबकि 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान तीस फीसद से ज्यादा है. करीब तीन दर्जन ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत दर्ज कर सकते हैं और करीब 107 विधानसभा सीटें पर अल्पसंख्यक मतदाता चुनावी नतीजों को खासा प्रभावित करते हैं. इनमें ज्यादातर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तराई वाले इलाके और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीटें हैं. 

पश्चिम यूपी में मुस्लिम निर्णायक

पश्चिमी यूपी में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है. बरेली के बाद से रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और आसपास के जनपदों में मुसलमान वोटरों की संख्या 35 से 45 फीसदी तक है. बिजनौर जिले में मुसलमानों की संख्या करीब 40 फीसदी है. मेरठ में मुसलमान वोट 35 से 40 फीसदी हैं, तो मुजफ्फरनगर में ये लगभग 35 फीसदी हैं. 

हापुड़ में मुसलमानों का प्रतिशत लगभग 35 से 40 है. बागपत में मुसलमानों की संख्या 35 प्रतिशत के आसपास है. सहारनपुर की सातों विधान सभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता लगभग 35 से 40 फीसदी हैं. सहारनपुर की बेहट, देवबंद व गंगोह विधान सभा सीटें मुस्लिम बहुल हैं. वहीं, वाराणसी में मुस्लिमों की तादाद 15 फीसदी, आजमगढ़ में 28 फीसदी, मऊ में 23 फीसदी, गाजीपुर में 18 फीसदी, बहराइच में तीस, लखनऊ में 22 फीसदी मुस्लिम हैं. 

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मुसलमानों की इसी संख्या का फायदा मायावती को कई चुनावों में मिलता रहा है. दलितों के साथ मुस्लिम गठजोड़ से बसपा को जीत मिलती रही है.

मलियाना और मुजफ्फरनगर में क्या हुआ था?

मेरठ का मलियाना और मुजफ्फरनगर पश्चिम यूपी में आते हैं.  23 मई 1987 को मलियाना नरसंहार में 72 मुसलमानों को पीएसी की एक प्लाटून ने गोली मारकर एक कुएं में फेंक दिया था. इस दौरान केंद्र और राज्य दोनों जगह कांग्रेस की सरकारें थी. राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे जबकि कांग्रेस नेता वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे. इस घटना ने मुसलमानों को हिला दिया था और कांग्रेस से मुसलमानों का मोहभंग होने वाली एक बड़ी वजह मलियना कांड था. 

वहीं, करीब आठ साल पहले 27 अगस्त 2013 को मुजफ्फरनगर में जानसठ कोतवाली क्षेत्र के गांव कवाल में दोहरा हत्याकांड के बाद जाट और मुसलमानों के बीच दंगा भड़क उठा था. इसमें 62 लोगों की जान गई थी और 40 हजार से ज्यादा मुसलमानों को बेघर होना पड़ा था. इस दौरान यूपी में सपा की सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, अखिलेश पर दंगों को नियंत्रण न कर पाने के आरोप लगातार लगते रहे. मुजफ्फरनगर दंगे के चलते मुसलमानों में सपा को लेकर भारी नाराजगी भी रही. 

मुजफ्फरनगर दंगे के बावजूद मुसलमानों की अभी भी सपा सूबे में पहली पसंद मानी जा रही है. कांग्रेस भी मुसलमानों को साधने की कवायद में जुटी है. ऐसे में मायावती ने मलियाना और मुजफ्फरनगर का जिक्र करके मुसलमानों को यह संदेश देने की कोशिश करती नजर आईं कि सपा और कांग्रेस अपनी सुरक्षा नहीं कर सकती है. इस दौरान मायावती ने मुसलमानों की जान-माल की सुरक्षा के साथ-साथ विकास वादा किया.

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दरअसल, बसपा का सियासी आधार भी पश्चिम यूपी में है. पश्चिम यूपी की कई सीटों पर दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. ऐसे में मायावती की कोशिश है कि पश्चिम यूपी में अगर दलित के साथ-साथ मुसलमान भी उनके साथ आ जाए तो सत्ता में वापसी की राह आसान हो सकती है. मायावती ने कहा कि किसान महापंचायत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए किया गया प्रयास अति-सराहनीय कदम है. इससे निश्चय ही वर्ष 2013 में सपा सरकार में हुए भीषण दंगों के गहरे जख्मों को भरने में थोड़ी मदद मिलेगी लेकिन यह बहुतों को असहज भी करेगी.

उन्होंने कहा कि किसान देश की शान हैं. महापंचायत में हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे के लिए मंच से साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए लगाए गए नारों से भाजपा की नफरत से बोई हुई उनकी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई दिखने लगी है. मुजफ्फरनगर ने कांग्रेस और सपा के दंगा-युक्त शासन की भी याद लोगों के मन में ताजा कर दी है. इस तरह मायावती लगातार सपा और कांग्रेस सरकार में हुए सांप्रदायिक घटनाओं का जिक्र मुसलमानों को अपने पाले में लाने की कवायद कर रही हैं. ऐसे में देखना है कि मायावती के इस मिशन में कितनी कामयाबी मिलती है?

 

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