गंगा और रामगंगा नदी के बीच बसा बदायूं जिला छोटे सरकार और बड़े सरकार की दरगाह की वजह से बेहद प्रसिद्ध है. मशहूर शायर शकील बदायूंवी ने भी इस इलाके का नाम रोशन किया है.
बदायूं के इतिहास को देखा जाए तो इस नगर को अहीर सरदार राजा बुद्ध ने 10वीं शताब्दी में बसाया था. 13 वीं शताब्दी में यह दिल्ली के मुस्लिम राज्य की एक महत्त्वपूर्ण सीमावर्ती चौकी था और 1657 में बरेली द्वारा इसका स्थान लिए जाने तक प्रांतीय सूबेदार यहीं रहता था. 1838 में यह जिला मुख्यालय बना. कुछ लोगों का यह मत है कि बदायूं की नींव अजयपाल ने 1175 ई. में डाली थी. राजा लखनपाल को भी नगर के बसाने का श्रेय दिया जाता है.
बदायूं के स्मारकों में जामा मस्जिद भारत की मध्य युगीन इमारतों, जिसको कि 13वीं शताब्दी में बनवाया गया था. इसका निर्माता इल्तुमिश था. इल्तुमिश के शासनकाल के दौरान बदायूं 4 साल तक उसकी राजधानी रहा.
अलाउद्दीन ने अपने जीवन के अंतिम साल बदायूं में ही बिताए थे. अकबर के दरबार का इतिहास लेखक अब्दुल कादिर बदायूंनी यहां अनेक वर्षों तक रहे थे. बदायूंनी का मकबरा बदायूं का प्रसिद्ध स्मारक है.
विधानसभा चुनाव की सियासत
बदायूं की बिल्सी विधानसभा सीट से 1996 में मायावती ने चुनाव लड़ा था और इसी चुनाव में सहसवान सीट से मुलायम सिंह यादव लड़े थे. दोनों ही नेताओं ने बीजेपी प्रत्याशी को हराया था.
1996 के इस चुनाव में बदायूं की 7 विधानसभा में 2 पर बसपा और 3 पर सपा जीती थी. बीजेपी और जनता दल को 1-1 सीट मिली थी.
2002 में 7 विधानसभा सीटों में 5 पर सपा जीती थी, 1 सीट पर बसपा और एक पर जनता दल यू ने जीत दर्ज की थी. 2007 में मुलायम सिंह यादव ने फिर से बदायूं का रुख किया और गुन्नौर विधानसभा से चुनाव लड़ा, वो जीत गए लेकिन बदायूं की 7 विधानसभा सीटों में से 3 पर बसपा, 1 पर सपा, 1 पर बीजेपी और 2 सीटें राष्ट्रीय परिवर्तन दल(डीपी यादव) को मिलीं. बाद में डीपी यादव और उनकी विधायक पत्नी बसपा में शामिल हो गए.
2012 में बदायूं जिले से गुन्नौर विधानसभा नए बने जिले संभल में जा चुकी थी. अब बदायूं में 6 विधानसभा सीटें थीं- बिसौली, सहसवान, बिल्सी, बदायूं, शेखुपुरा और दातागंज. इनमें से 4 पर सपा और 2 पर बसपा जीती.
2017 में 6 विधानसभाओं में 5 बीजेपी ने जीती और सहसवान विधानसभा सपा खाते में रही.
बदायूं जिले की कुल आबादी 37,41,896 है. यहां हिंदू आबादी करीब 78 फीसदी है. यहां मुस्लिम मतदाता भी प्रभावशाली है. बदायूं में मुस्लिम और यादव मतदाताओं के साथ-साथ मौर्य-शाक्य वोटर भी अच्छी संख्या में है. यादव-मुस्लिम 15-15 फीसदी है और इसी के चलते सपा कई बार अपने सांसद को संसद तक पहुंचाने में सफल रही.
2017 के चुनाव में जिले की 6 सीटों में से सिर्फ सहसवान ही सपा के पास गई, बाकी पांचों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की. सहसवान से सपा के ओमकार सिंह यादव पांचवी बार विधायक चुने गए थे.
2017 के चुनाव के समय सपा विधायक आबिद रजा ने तत्कालीन सपा के सांसद धर्मेंद्र यादव के खिलाफ अंडरग्राउंड केबल में भ्रष्टाचार, अनियमितता को लेकर मोर्चा खोला था, जिसको लेकर दोनों के रिश्ते में आज भी खटास है.
ऐसी रही है यहां लोकसभा चुनाव की सियासत
अब तक बदायूं के मतदाताओं ने 17 बार लोकसभा चुनाव के लिए वोट दिए हैं जिनमें सबसे ज्यादा 6 बार समाजवादी पार्टी विजयी रही, 5 बार कांग्रेस, 2 बार बीजेपी को जीत मिली. इनके अलावा भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल और जनता दल भी यहां जीती है.
2019 में बीजेपी की संघमित्रा मौर्या ने 28 साल बाद बीजेपी को ये सीट वापस दिलाई. उनसे पहले बीजेपी के चिन्मयानंद ने 1991 में बदायूं में कमल खिलाया था.
सलीम शेरवानी का रहा है दबदबा
सलीम शेरवानी बदायूं लोकसभा सीट पर सबसे ज्यादा 5 बार सांसद रहे हैं. उन्होंने 1984 में राजीव गांधी के साथ राजनीति की शुरुआत की और पहली बार में ही कांग्रेस से सांसद चुने गए. 1989 में बदायूं से रामनरेश यादव को कांग्रेस का टिकट मिला और कांग्रेस को जनता दल से हार मिली. जनता दल ने कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगा दी. शरद यादव ने कांग्रेस के गढ़ को ढहा दिया. तब से अभी तक कांग्रेस वापसी का इंतजार कर रही है.
1989 में सलीम शेरवानी बदायूं से सटी हुई एटा से चुनाव लड़े लेकिन चुनाव हार गए. 1991 में सलीम शेरवानी वापस बदायूं से चुनाव लड़े लेकिन कुछ खास असर नहीं डाल सके. बीजेपी ने बदायूं सीट पर खाता खोला और चिन्मयानंद ने शरद यादव को चुनाव हराया. हार के बाद शरद यादव ने बदायूं छोड़ दिया.
1996 में सलीम शेरवानी ने सपा से चुनाव लड़ा और जीते. 1996, 1998, 1999, 2004 सभी चुनाव सलीम शेरवानी से सपा के टिकट पर जीते. 2009 में सपा से टिकट कटने के बाद वापस कांग्रेस से चुनाव लड़ा और सपा से धर्मेन्द्र यादव ने चुनाव जीता. धर्मेंद्र यादव का इस चुनाव से बदायूं की राजनीति में प्रवेश हुआ. बदायूं में लोकसभा का प्रतिनिधित्व हमेशा बाहरी प्रत्याशियों ने किया है. चिन्मयानंद जो शाहजहांपुर से थे, शरद यादव दूसरे राज्य से थे और लंबे समय तक सलीम शेरवानी सांसद रहे जो कि प्रयागराज से हैं. फिर धर्मेन्द्र यादव जो कि मैनपुरी से हैं. 2019 में सांसद बनीं बीजेपी की संघमित्रा मौर्य लखनऊ से हैं.