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जाट की काट...पश्चिमी यूपी में छोटी-छोटी जातियां सहेजने में जुटे योगी आदित्यनाथ

पश्चिमी यूपी की सियासत को जाट समुदाय सीधे तौर पर प्रभावित करता है. 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बीजेपी जाटों को अपने साथ जोड़ने में सफल रही थी. लेकिन किसान आंदोलन के चलते पश्चिम यूपी में बीजेपी का समीकरण गड़बड़ता नजर आ रहा है.

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
स्टोरी हाइलाइट्स
  • किसान आंदोलन-जाट वोट की काट में जुटी बीजेपी
  • योगी ने मुरादाबाद में धनगर समाज को दिया संदेश
  • नोएडा में गुर्जरों को साधने का चला सियासी दांव

पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर की महापंचायत से किसान नेताओं ने उत्तर प्रदेश के 2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को वोट से चोट देने का ऐलान किया था. किसान आंदोलन की नाराजगी और जाट वोटों के कटने के काट की तलाश में जुटी बीजेपी  पश्चिम यूपी में छोटी-छोटी जातियों को सहेजने में लगी है. इसे अमलीजामा पहनाने के लिए सीएम योगी आदित्यनाथ ने खुद ही मोर्चा संभाल लिया है. मंगलवार को सीएम योगी ने मुरादाबाद में धनगर समाज को साधने की कवायद की तो बुधवार को उन्होंने गुर्जरों को सियासी संदेश दिया.

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किसान आंदोलन से गड़बड़ाता समीकरण

बता दें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत को जाट समुदाय सीधे तौर पर प्रभावित करता है. 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बीजेपी जाटों को अपने साथ जोड़ने में सफल रही थी. बीजेपी ने पश्चिम यूपी में ठाकुर, ब्राह्मण, त्यागी, वैश्य समाज के साथ-साथ जाट और गुर्जर जैसी जातियों को अपने पक्ष में लामबंद किया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को सियासी तौर पर जबरदस्त फायदा मिला. 2014-2019 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पूरी तरह से विपक्ष का सफाया कर दिया था. 

किसान आंदोलन के चलते पश्चिम यूपी में बीजेपी का समीकरण गड़बड़ता नजर आ रहा है. जाति की सियासत से परहेज का दावा करने वाली बीजेपी ने अब खुल्लम-खुल्ला जाति का कार्ड खेलना शुरू कर दिया है. पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी ने पहले अलीगढ़ में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के जाट समाज से होने की याद दिलाकर उनके नाम पर युनिवर्सिटी का शिलान्यास किया. इसका सीधा मतलब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुल जनसंख्या के 17 फीसदी से ज्यादा जाट किसानों को अपनी तरफ लाना है.

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मुरादाबाद में धनगर समाज को योगी ने साधा

वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को मुरादाबाद के ठाकुरद्वारा में 69 करोड़ की 30 परियोजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास किया और धनगर समाज को साधने की कवायद करते नजर आए. इस दौरान सीएम योगी ने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि धनगर समाज की समस्या दूर होगी और उन्हें जल्द ही प्रदेश में अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने पर विचार किया जाएगा. इसके साथ उन्होंने बढ़ापुर क्षेत्र में शत्रु सम्पत्ति के निस्तारण के लिए भी आश्वासन दिया. 

यूपी में धनगर समाज का सियासी असर

धनगर समाज उत्तर प्रदेश के ओबीसी समुदाय में अतिपिछड़ी जातियों में आता है, जिन्हें अलग-अलग इलाके में गड़रिया, बघेल, पाल और धनगर जातियों के नाम से जाना जाता है. बृज, रुहेलखंड और बुंदेलखंड के जिलों में पाल जाति काफी अहम मानी जाती है जबकि पश्चिम यूपी के मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा में धनगर समाज काफी संख्या में है. बदायूं से लेकर बरेली, आगरा, फिरोजाबाद, इटावा, हाथरस जैसे जिलों में ये लोग बघेल उपजाति के तौर पर लिखते हैं.

इसके अलावा अवध के इलाके में फतेहपुर, रायबरेली, प्रतापगढ़ और बुंदेलखड के तमाम जिलों में 5 से 10 हजार की संख्या में हर एक सीट पर पाल वोट हैं. धनगर समाज अनुसूचित जाति की मांग लंबे समय से कर रहा है और एसपी बघेल आगरा लोकसभा सुरक्षित सीट से जीतकर मोदी सरकार में मंत्री हैं, जिनके एससी होने को लेकर विवाद भी है. हालांकि, अब योगी ने धनगर समाज को एससी में जल्द शामिल होने का आश्वासन देकर बड़ा दांव चल दिया है. 

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गुर्जरों को साधने का चला दांव

सीएम योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को बिजनौर में मेडिकल कालेज का शिलान्यास किया तो बुधवार को उन्होंने नोएडा के दादरी के मिहिर भोज पोस्ट ग्रेजुएट कालेज में 9वीं सदी के शासक गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा का अनावरण किया. इस तरह से गुर्जर समुदाय को साधने का बड़ा दांव चला है, क्योंकि पश्चिम यूपी में गुर्जर समुदाय के लोग काफी समय से सम्राट मिहिर भोज को अपना पूर्वज बताते रहे हैं और उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. हालांकि, सीएम के दौरे से पहले से ही मिहिर भोज के वंशज होने का दावा करने वाले राजपूतों और गुर्जरों में गतिरोध जारी है. 

सीएम योगी ने मिहिर भोज का जिक्र करते हुए कहा कि आप लोगों को गर्व करना चाहिए कि आप उस वंश से हैं. इस पर केवल गुर्जरों को नहीं बल्कि पूरे समाज को गर्व करना चाहिए, जो एक समय काबुल तक शासन करते थे. इस दौरान उन्होंने कहा कि याद कीजिए 1857 की क्रांति को, जब मेरठ में वीर धन सिंह कोतवाल ने शहादत दी. उन्होंने अपने रक्त से देश की आजादी के लिए इतिहास लिखा था. धनसिंह कोतवाल भी गुर्जर समुदाय से आते हैं. इस तरह सीएम योगी ने गुर्जरों को साधने का बड़ा दांव चला है. 

बता दें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और जाट के बाद गुर्जर, ठाकुर, सैनी, कश्यप मतदाताओं की संख्या अधिक है. इस इलाके में ब्राह्मण, त्यागी और ठाकुर बीजेपी का परंपरागत वोटर माना जाता है. सीएम योगी पश्चिम यूपी में गुर्जर ही नहीं बल्कि तमाम छोटी-छोटी जातियों को साधने में जुटे हैं. योगी अगर गुर्जरों को साधने में सफल रहते हैं तो राजपूत, त्यागी, गुर्जर, वैश्य, शाक्य, सैनी जैसी जातियां मिलकर 2022 के चुनाव में पश्चिम यूपी में बीजेपी की सियासी नैया पार हो सकती है.  
दो दर्जन जिलों में निर्णायक गुर्जर वोटर

पश्चिम यूपी में गुर्जर समुदाय के मतदाताओं की खासी संख्या है, जो किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. गाजियाबाद, नोएडा, बिजनौर, संभल, मेरठ, सहारनपुर, कैराना जिले की करीब दो दर्जन सीटों पर गुर्जर समुदाय निर्णायक भूमिका में हैं, जहां 20 से 70 हजार के करीब इनका वोट है. एक दौर में गुर्जर समाज के सबसे बड़े और सर्वमान्य नेता बीजेपी के हुकुम सिंह हुआ करते थे, जो कैराना के साथ-साथ पश्चिम यूपी की सियासत पर खास असर रखते थे.  

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बता दें कि 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर पांच गुर्जर समुदाय के विधायक जीतकर आए थे. इनमें कद्दावर नेता अवतार सिंह भड़ाना, डॉ. सोमेंद्र तोमर, तेजपाल नागर, प्रदीप चौधरी और नंदकिशोर गुर्जर हैं, लेकिन अवतार भड़ाना अब बीजेपी का साथ छोड़ चुके हैं. वहीं, बीजेपी ने अशोक कटियार को एमएलसी के साथ-साथ कैबिनेट में भी जगह दे रखी है. 

नोएडा के व्यवसायी और गुर्जर नेता सुरेंद्र नागर को बीजेपी ने राज्यसभा सदस्य बना रखा है और तीन जिला पंचायत अध्यक्ष भी गुर्जर समाज से हैं. इसके अलावा कैराना सांसद भी गुर्जर हैं. हुकुम सिंह की मृत्यु के बाद बने शून्य को भरने के लिए बीजेपी ने एमएलसी अशोक कटियार को आगे बढ़ाया और 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले योगी सरकार की कैबिनेट में जगह देकर उन्हें साधे रखा है. लेकिन, 2022 के विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश बढ़ रही है. ऐसे में योगी सूबे की गुर्जर से लेकर तमाम जातियों को साधने की कवायद में हैं. 


 

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