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Hardoi Sadar Assembly Seat: एक परिवार का दबदबा रहा है कायम, बीजेपी को हर बार यहां मिली हार

हरदोई सदर विधानसभा सीट की राजनीति एक परिवार तक सिमटी रही है. वहीं, भाजपा को इस सीट से अब तक जीत हासिल नहीं हो सकी. नरेश अग्रवाल का इस सीट पर दबदबा रहा है. इस समय उनके बेटे नितिन अग्रवाल यहां से विधायक हैं.

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Uttar Pradesh Assembly Election 2022 (Hardoi Sadar Assembly Seat).
Uttar Pradesh Assembly Election 2022 (Hardoi Sadar Assembly Seat).
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 2017 में 14 प्रत्याशी मैदान में थे
  • नितिन अग्रवाल यहां से विधायक हैं
  • नरेश अग्रवाल के बेटे हैं नितिन

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) का हरदोई सदर विधानसभा क्षेत्र ऐसा है जहां चुनाव में सपा, बसपा ,कांग्रेस और निर्दलीय तक को जीत मिली लेकिन जनसंघ या भाजपा सफलता से दूर रही. यहां की राजनीतिक क्षेत्र में नरेश अग्रवाल और उनके परिवार का दबदबा रहा है. 2012 में परिसीमन में तीन विधानसभा क्षेत्र हरदोई-सुरसा, बावन-हरियावां और अहिरोरी विकास खंड का भूगोल बदलते हुए नए विधानसभा क्षेत्र के रूप में हरदोई सदर सीट की सीमांकन हुआ. हरदोई सदर सीट की राजनीति एक परिवार तक सिमटी रही है. वहीं भाजपा को इस सीट से अब तक जीत हासिल नहीं हो सकी.

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राजनीतिक पृष्ठभूमि 

राजधानी लखनऊ और कानपुर की गोद में बसें हरदोई जिले में आठ विधानसभा सीट हैं. इसमें हरदोई सदर सीट प्रमुख है. लखनऊ से 110 किलोमीटर और कानपुर से 140 किलोमीटर दूर हरदोई सदर रेलमार्ग से लेकर सड़क मार्ग से अच्छे से जुड़ा हुआ है. आजादी के बाद से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के इतिहास में देंखे तो 1951 में हरदोई (पूर्वी) नाम से पहचान वाली यह सीट आरक्षित श्रेणी में थी और सबसे पहले चुनाव में बाबू किन्दर लाल 21247 मत हासिल कर विधायक बने थे. इसी वर्ष किन्दर लाल सांसद भी चुने गए और उपचुनाव हुआ तो कांग्रेस के चंद्रहास 27160 मत विजयी हुए.

वर्ष 1957 में बाबू बुलाकी राम कांग्रेस से 42530 मत हासिल कर विधानसभा पहुंचे. 1962 में कांग्रेस ने महेश सिंह को ही मैदान में उतारा और वह 13510 मत हासिल कर निर्वाचित हुए. 1967 में हरदोई के दिग्गज नेता धर्मगज सिंह निर्दलीय तौर पर लड़े और 12953 मतों के साथ जीते. इस चुनाव में कांग्रेस के राधाकृष्ण अग्रवाल दूसरे स्थान पर रहे थे. 1969 में धर्मगज सिंह की पत्नी आशा कांग्रेस से उतरीं और 19392 मत पाकर विधानसभा पहुंचीं. 1974 के चुनाव में कांग्रेस ने श्रीशचंद्र अग्रवाल को लड़ाया और वह 16663 मत पाकर विजयी हुए.

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आपातकाल के बाद 1977 की विरोधी लहर में धर्मगज सिंह ने 27117 मतों के साथ सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी. 1980 में सदर सीट से कांग्रेस ने बाबू श्रीशचंद्र अग्रवाल के पुत्र नरेश अग्रवाल को मैदान में उतारा और 28597 मत हासिल कर विधानसभा में कदम रखा था. भाजपा के दिग्गज नेता और जनसंघ के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गंगाभक्त सिंह 14295 मत पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे.

1985 में कांग्रेस ने अपने ही विधायक नरेश अग्रवाल की जगह उमा त्रिपाठी को टिकट दिया और वह 24039 मत पाकर जीत गईं. वर्ष 1989 में कांग्रेस ने फिर उमा त्रिपाठी को ही टिकट दिया. नरेश अग्रवाल को दूसरे जिले भेजने की बात कही गई लेकिन उन्होंने कांग्रेस छोड़कर निर्दलीय चुनाव लड़ा और 36402 मत हासिल कर विजय हुए. कांग्रेस की उमा त्रिपाठी 26207 वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहीं.

1991 में कांग्रेस ने फिर से नरेश अग्रवाल को प्रत्याशी बनाया. इस चुनाव में काफी करीबी मुकाबला हुआ लेकिन विजय नरेश अग्रवाल के हिस्से में आयी. 1993 के चुनाव में सपा व बसपा ने गठबंधन से चुनाव लड़ा लेकिन कांग्रेस के नरेश अग्रवाल 41605 मत हासिल कर जीत हासिल की. 1996 के चुनाव के बाद नरेश अग्रवाल ने राजनीतिक दिशा को मोड़ दिया और कांग्रेस व बसपा के गठबंधन में वह 56744 मत लेकर जीते.

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बाद में प्रदेश में लोकतांत्रिक कांग्रेस बनाकर भाजपा की कल्याण सिंह सरकार को समर्थन देकर ऊर्जा मंत्री बने. बाद में प्रदेश सरकार ने उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया तो नरेश अग्रवाल सामजवादी पार्टी से जुड़ गए और वर्ष 2002 में नरेश अग्रवाल पहली बार समाजवादी पार्टी की साइकिल से चुनाव लड़े और 63825 मत हासिल कर विजय पाई. बसपा के शिवप्रसाद 37242 वोट मिले थे.

सपा सरकार में पर्यटन और परिवहन मंत्री रहे नरेश अग्रवाल 2007 में फिर समाजवादी पार्टी से लड़े और 67317 वोट हासिल कर जीते. मई 2008 में नरेश अग्रवाल विधानसभा की सदस्यता और सपा छोड़ बसपा में चले गए और हरदोई सदर की सीट अपने पुत्र नितिन अग्रवाल को सौंप दी. उपचुनाव में बसपा से नितिन अग्रवाल 65533 वोट पाकर निर्वाचित हुए. 

नए विधानसभा के परिसीमन के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव से पूर्व दिसंबर 2011 में नरेश अग्रवाल फिर सपा में आ गए और 2012 में नितिन अग्रवाल को सपा ने उम्मीदवार बनाया तो उन्होंने 110063 मत हासिल कर रिकार्ड जीत हासिल की थी. वर्ष 2017 में समाजवादी पार्टी ने फिर नितिन अग्रवाल को प्रत्याशी बनाया और बीजेपी के राजबक्श सिंह से उन्हें करीबी मुकाबले में पांच हजार से कुछ अधिक मतों से जीत हासिल हुई. 

सामाजिक ताना बाना

2019 के आंकड़ों के अनुसार हरदोई सदर विधानसभा सीट पर कुल 401532 मतदाता हैं. जिनमे 216198 पुरुष और 185318 महिला मतदाता है. अगर जातीय समीकरण के हिसाब से देखें तो अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग 1,10000 जिनमें पासी मतदाता 60 हजार से अधिक, इसके बाद करीब चालीस हजार ब्राह्मण और 35 हजार ठाकुर मतदाता, तीस हजार मुस्लिम और करीब 28 हजार वैश्य मतदाता हैं. यही नहीं कुशवाहा और पाल समाज के भी करीब चालीस हजार मतदाता इस विधानसभा सीट का हिस्सा है. इसके अतिरिक्त कहार और तेली मतदाता भी इस सीट पर काफी हैं. 

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2017 का जनादेश 

2017 के हुए विधानसभा चुनाव में हरदोई सदर सीट पर 14 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे और मुकाबला सपा और बीजेपी के मध्य हुआ. 393551 मतदाता वाली इस सीट पर 230361 लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. यहा कुल 58.33 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था. पारम्परिक रूप से नरेश अग्रवाल के परिवार के खाते में जाने वाली इस सीट पर नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल तीसरी बार सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे.  प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य राज्य मंत्री नितिन अग्रवाल का मुकाबला मोदी लहर में बीजेपी के राजा बक्श सिंह से हुआ. सपा उम्मीदवार नितिन अग्रवाल को 97735 मत जबकि उनके प्रतिद्वंदी बीजेपी के राजा बक्श सिंह 92626 मत मिले जबकि बसपा के धर्मवीर सिंह पन्ने को 30628 मत मिले. इस तरह से नितिन अग्रवाल करीबी मुकाबले में पांच हजार से अधिक मतों से जीतकर इस पुश्तैनी सीट को बचाने में कामयाब हुए. 

विधायक का रिपोर्ट कार्ड 

हरदोई सदर से विधायक नितिन अग्रवाल का जन्म 9 अगस्त 1981 को हुआ. नितिन अग्रवाल के पिता का नाम नरेश अग्रवाल है जो राजनीतिक दल बदल के मामले में यूपी के सर्वाधिक चर्चित नेताओ में से एक हैं.  इस सीट पर नरेश अग्रवाल खुद सात बार विधायक चुने गए. जबकि उनके बाबा श्रीश चंद्र अग्रवाल भी एक बार विधायक रहे.

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नितिन अग्रवाल की प्रारम्भिक शिक्षा हरदोई से हुई. उसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक के बाद पुणे के सिम्बोसिस कालेज से एमबीए की डिग्री हासिल की. 2007 में नरेश अग्रवाल के सपा से इस्तीफ़ा देने के बाद 2008 उपचुनाव में नितिन अग्रवाल बसपा से उनकी सीट पर चुनाव लड़े और पहली बार विधानसभा पहुंचे. उसके बाद अपने पिता की तरह उनका बसपा से मोह भंग हुआ और अपने पिता के साथ सपा में शामिल हो गए. 2012  में चुनाव में सपा के टिकट पर दोबारा विधायक बने.

सपा सरकार में उन्हें स्वास्थ्य राज्यमंत्री और बाद में लघु उद्योग विकास में स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री बनाया गया. 2017 का चुनाव भी नितिन सपा के टिकट से लड़े और करीबी मुकाबले में जीत हासिल की. प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद नितिन के पिता नरेश अग्रवाल का सपा से राजयसभा टिकट न मिलने के कारण मोह भांग हुआ और 2018 में पिता नरेश अग्रवाल बीजेपी में शामिल हो गए. तब से नितिन अग्रवाल भी सपा के खिलाफ बागी तेवर अपनाए हुए हैं.

नितिन अग्रवाल को अपनी राजनैतिक विरासत में मिली इस सीट पर अपने पिता और परिवार के कारण राजनीतिक पकड़ है. बिना किसी जातीय समीकरण के पक्ष के बाद भी दूसरी जाति की लामबंदी करके अग्रवाल परिवार का इस सीट पर दबदबा बना रहा. नरेश अग्रवाल के अपने कार्यकाल में बिजली के पावर स्टेशन, रोडवेज बसअड्डा जैसे बड़े कार्यो के अलावा नितिन अग्रवाल ने सौ बेड अस्पताल, महिला अस्पताल सपा कार्यकाल में बनवाया. इस कार्यकाल में उनके नाम केवल 52 स्वास्थ्य केंद्र पर आक्सीजन प्लांट लगवाने जैसी उपलब्धि है. 

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विविध

एमबीए करके गुरुग्राम में नौकरी करने वाले नितिन अग्रवाल को उनके पिता नरेश अग्रवाल सक्रिय राजनीति में लाये. राजनीति से दूर रखे गए नितिन को पहला उपचुनाव उनके पिता नरेश अग्रवाल ने बसपा के टिकट से लड़वाया. अपने पिता की राजनीतिक छांव में नितिन अग्रवाल का राजनीतिक कारवां चल रहा है. स्थानीय लोगों के मुताबिक़ नितिन अग्रवाल को अपने पिता की जमीनी जड़ों का सहारा है. हालांकि नितिन और उनके परिवार पर कई तरह से लोगों को प्रताड़ित करने, पुलिस प्रसाशन की दम पर उत्पीड़न करने और लोकायुक्त तक शिकायत जैसी कई बातें सामने आई. कुल मिलाकर देखे तो यहां न कभी जनसंघ सफल हुई और न ही भाजपा का कमल खिल पाया था. 

 

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