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UP: जाट किसके करेंगे ठाठ, किसकी खड़ी होगी खाट? पहले चरण में ही हो जाएगा फैसला

उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय भले ही 3 से 4 फीसदी के बीच है, लेकिन पश्चिमी यूपी की सियासत का बेताज बादशाह यही समुदाय है. ऐसे में जाट वोटर सूबे के सियासी समीकरण को बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. विधानसभा चुनाव के शुरुआती दोनों चरणों में जाट वोटर काफी अहम है, जिन्हें साधने के लिए सपा-आरएलडी ने गठबंधन कर रखा है तो बीजेपी ने अच्छी खासी संख्या में टिकट देकर उन्हें साधने का दांव चला है.

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पश्चिमी यूपी के किंगमेकर जाट समुदाय
पश्चिमी यूपी के किंगमेकर जाट समुदाय
स्टोरी हाइलाइट्स
  • जाट समाज पश्चिमी यूपी में सबसे अहम वोटर
  • चौधरी चरण सिंह जाट समाज के सबसे बड़े नेता थे
  • 2014 से जाट समाज बीजेपी का कोर वोटबैंक

पश्चिमी यूपी की सियासत में एक बात कही जाती है कि जिसके जाट, उसी के ठाठ. यही वजह है कि पश्चिमी यूपी को जाटलैंड के नाम से जाता है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की शुरुआत इसी जाटलैंड इलाके से हो रही है, जहां जाट समुदाय के नेता माने जाने वाले आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी का सियासी भविष्य तय होगा. किसान आंदोलन के चलते पश्चिमी यूपी के जाट वोटों पर सभी की निगाहें लगी हैं, क्योंकि बीजेपी भी जाट वोटों पर दांव खेल रही है. जयंत चौधरी सपा के साथ हाथ मिलाकर उतरे हैं. ऐसे में देखना है कि जाट मतदाता किसके साथ जाता है? 

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उत्तर प्रदेश में भले ही जाटों की आबादी 3 से 4 फीसदी के बीच है, लेकिन पश्चिमी यूपी में 17 फीसदी के करीब है. लोकसभा की एक दर्जन से ज्यादा और विधानसभा सीटों की बात करें तो 120 सीटें ऐसी हैं जहां जाट वोटबैंक असर रखता है. कुछ सीटों पर जाट समाज का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हार-जीत तय करने की ताकत रखते हैं. पश्चिमी यूपी में 30 सीटें ऐसी हैं, जिन पर जाट वोटर्स को निर्णायक माना जाता है. 

जाट वोटों की सियासी अहमियत

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिमी यूपी की 17 सीटों पर जाट प्रत्याशी उतारे हैं तो आरएलडी ने 9 जाट और सपा ने अपने खाते से तीन जाट प्रत्याशी दिए हैं. सपा-आरएलडी के पहले चरण की सीटें हैं. वहीं, बसपा ने भी 10 जाट टिकट दिए हैं और माना जा रहा है कि करीब 19 टिकट जाट को दिए जा सकते हैं. कांग्रेस ने जाट समुदाय पर बहुत बड़ा सियासी दांव नहीं खेला है. 

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यूपी के सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, और फिरोजाबाद जिले में जाट वोट बैंक चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालता है. बीजेपी के तीन जाट सांसद हैं और विधानसभा की बात करें तो फिलहाल 14 जाट विधायक हैं. 2017 के चुनाव में सपा, बसपा, कांग्रेस से एक भी जाट विधायक नहीं बन सका था जबकि आरएलडी से जीते एकलौते विधायक ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया था. 

यूपी की जाट राजनीति
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को जाट समुदाय का मसीहा माना जाता है, जिन्होंने राजनीति की शुरुआत भी कांग्रेस से ही की थी. 1967 में चरण सिंह ने कांग्रेस को अलविदा कहकर अपने समर्थक विधायकों के साथ क्रांति दल नाम से पार्टी का गठन किया था. इसके बाद वो पहले गैर-कांग्रेसी यूपी के मुख्यमंत्री बने और फिर बाद में देश के प्रधानमंत्री बने. चौधरी चरण सिंह और किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की ठाठ ऐसी कि बिना इनके केंद्र में सरकार बन पाना मुश्किल हो जाए. 

चरण सिंह और टिकैत की जोड़ी

चौधरी चरण सिंह ने अपने आपको जाट समाज के नेता के तौर पर स्थापित किया जबकि महेंद्र सिंह टिकैत ने किसान नेता के तौर पर खुद को बनाया. जाट समाज के दोनों नेताओं ने 'जाटलैंड' में धर्म-जाति मुक्त किसान एकता और मुस्लिम-जाट जैसे मजबूत समीकरण को स्थापित किया था, लेकिन 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे ने सारे सियासी समीकरण को ध्वस्त कर दिया. जाट और मुस्लिमों के बीच बढीं दूरियों ने आरएलडी की सियासत के लिए भी संकट खड़ा कर दिया. चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजित सिंह और जयंत चौधरी भी चुनाव हार गए. 

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चौधरी चरण सिंह को अगर किसानों का और जाटों का नेता कहा जाता है तो महेंद्र सिंह टिकैत भी किसानों के मसीहा की तरह याद किए जाते हैं. चौधरी चरण सिंह की विरासत चौधरी अजित सिंह ने संभाली और केंद्र में कई बार मंत्री बने और जाट वोटों की बदौलत किंगमेकर भी रहे. चौधरी चरण सिंह के वारिस के तौर पर अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी हैं, जो मौजूदा समय में आरएलडी के अध्यक्ष हैं. वहीं, महेंद्र सिंह टिकैत की सियासी विरासत नरेश टिकैत और राकेश टिकैत ने स्थापित किया है. 

2013 से आरएलडी मुश्किल में है

चरण सिंह ने अपने को हमेशा जाट समाज के बीच का आदमी के तौर पर रखा, लेकिन अजीत सिंह हमेशा से ही 'दिल्ली वाले नेता' की तरह पेश आते रहे. इसके अलावा आरएलडी के कई पुराने नेता थे, जिनमें अमरपाल सिंह और हरेंद्र सिंह जैसे नेता दूसरे दल में चले गए. इसी का खामियाजा था कि मुजफ्फरनर दंगे के बाद जाट वोट आरएलडी को छोड़कर बीजेपी के साथ चला गया तो चौधरी परिवार की सारी सियासत पर ही सवाल खड़े हो गए. 

2013 के बाद से बीजेपी ने जाट समुदाय के बीच अपना सियासी आधार मजबूत किया है. संजीव बलियान को केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री बनाकर सियासी महत्व दिया तो भूपेंद्र सिंह को योगी कैबिनेट में शामिल कर जाटों के बीच अपनी पकड़ को बनाए रखने की कवायद की है. पश्चिमी यूपी के तमाम जिलों में जाट जिला पंचायत अध्यक्ष बीजेपी ने बनाकर उनके विश्वास को बनाए रखने की कवायद की है. 

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जाट वोटों का फैसला खाप पंचायत के हाथ

जाट समाज पर नेताओं से ज्यादा जातीय खाम पंचायतों का सियासी असर है. जाट समाज के तमाम फैसले खाप पंचायतों में होते हैं. ऐसे ही चुनाव में किस पार्टी को वोट करना है, इसका फैसला भी खाप पंचायतों में होते हैं. जाट समाज के अलग-अलग कई खाप पंचायत हैं, जिनमें सबसे बड़ी खाप बालियान खाप है, जिसके अध्यक्ष नरेश टिकैत हैं. देशवाल खाप, गठवाला खाप, लाटि‍यान खाप, चौगाला खाप, अहलावत खाप, बत्तीस खाप, कालखांडे खाप हैं. बालियान और गठवाला खाप प्रमुख है, जिसका पश्चिमी यूपी के जाट समुदाय के बीच मजबूत पकड़ है. 

किसान आंदोलन से मिली संजीवनी

वहीं, किसान आंदोलन ने एक बार फिर से आरएलडी को सियासी संजीवनी दी है. जयंत चौधरी ने किसान आंदोलन के बहाने जाट समुदाय के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश की है. इसके बाद जयंत ने सपा के साथ मिलकर पश्चिमी यूपी में जाट-मुस्लिम समीकरण को मजबूत करने की कवायद की है. साथ ही सपा ने भी हरेंद्र मलिक, पंकज मलिक और चौधरी विरेंद्र सिंह को अपने साथ मिलाकर जाट समीकरण को दुरुस्त करने के कोशिश की है. ऐसे में देखना होगा कि सपा-रालोद गठबंधन क्या जाटों का विश्वास जीत पाएगा या फिर बीजेपी के खाट पर मजबूती से बैठा रहेगा. 

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