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Lambhua Assembly Seat: बीजेपी का रहा है दबदबा, लेकिन इस बार किसके सिर सजेगा ताज?

लम्भुआ विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा भाजपा का तीन बार कब्ज़ा रहा है और मौजूदा समय में ये सीट अब भी भाजपा के पास ही है. इस सीट पर जनसंघ, भाजपा , सपा , बसपा , कांग्रेस, जनता दल और जनता पार्टी अपना परचम लहरा चुकी है.

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Uttar Pradesh Assembly Election 2022( Lambhua  Assembly Seat)
Uttar Pradesh Assembly Election 2022( Lambhua Assembly Seat)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 11 में से 6 बार बाहरी प्रत्याशियों को मिली है जीत
  • बीजेपी ने तीन बार दर्ज की है जीत
  • अपनी ही सरकार पर सवाल उठा चुके हैं मौजूदा विधायक

सुल्तानपुर की लम्भुआ विधानसभा लखनऊ-वाराणसी राष्ट्रीय राज्य मार्ग 56 पर स्थित है. इस विधानसभा में 456 गांव हैं और ये जिला सुल्तानपुर की सबसे बड़ी आबादी वाली विधानसभा है. जिला मुख्यालय से मात्र बीस किलोमीटर पर बसी इस विधानसभा से अयोध्या की दूरी सिर्फ 84 किलोमीटर है जबकि वाराणसी जिला इससे मात्र 134 किलोमीटर दूर है. इस विधानसभा से लखनऊ की दूरी 160 किलोमीटर है. यहां हिंदी, अवधी व खड़ी भाषा बोली जाती है. अयोध्या से नजदीक होने की वजह से इसका पौराणिक महत्त्व बहुत ही ज्यादा है. यहां पर धार्मिक स्थलों में सबसे ज्यादा प्रमुख धोपाप धाम है.

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बताया जाता है की इस धाम पर भगवान् श्री राम ने आकर पूजा की थी और रावण की ह्त्या के पाप से मुक्त होने के लिए गोमती नदी में स्नान कर अपने धनुष-बाण को धोया था. इसके अलावा इस इलाके में भगवान् शिव का प्रसिद्ध धाम बाबा जनवारी नाथ भी है जो कावड़ियों के लिए तीर्थ स्थल के रूप में माना जाता है. 

तीन दशक के विधानसभा चुनाव इतिहास पर नजर डालें तो जिले की लम्भुआ विधान सभा सीट पर बाहरी प्रत्याशियों की धमक ज्यादा रही है. पिछले 11 चुनाव में छह बार बाहरी उम्मीदवारों को यहां की जनता ने रहनुमाई का अवसर दिया. इस बार भी (बाहरी उम्मीदवार) इस सीट पर भाजपा के देवमणि द्विवेदी काबिज़ हैं. बता दें कि 2009 के परिसीमन से पहले इस सीट का नाम चांदा विधानसभा था.

 
राजनीतिक पृष्ठभूमि
इस विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा भाजपा का तीन बार कब्ज़ा रहा है और मौजूदा समय में ये सीट अब भी भाजपा के पास ही है. इस सीट पर जनसंघ, भाजपा , सपा , बसपा , कांग्रेस, जनता दल और जनता पार्टी अपना परचम लहरा चुकी है.  तीन दशक पहले 1974 में इस विधानसभा ने कुंवर श्रीपाल सिंह को बतौर प्रतिनिधि चुना. वर्ष 1977 में उदय प्रताप सिंह जनता पार्टी से लड़े और जीत हासिल की. साल 1980 में रामसिंह को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत दर्ज़ की. सन् 1985 के चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस से शिवनारायण मिश्र को प्रत्याशी बनाया गया और वह जीतने में सफल रहे.

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सन् 1989 में पासा फिर पलटा. जनता दल के अशोक पांडेय ने जीत दर्ज की. 1991 के चुनाव में स्थानीय अरुण सिंह ने बाजी मारी तो 1993 में बसपा-सपा गठबंधन प्रत्याशी सफदररजा चुनाव जीतने में सफल रहे.  सन् 1997 व 2002 में क्रमश स्थानीय प्रत्याशी अरुण सिंह (बीजेपी) व अनिल पांडेय (सपा) को विधायक बनने का अवसर मिला. 2007 में जनता ने एक बार फिर बाहरी प्रत्याशी बसपा के विनोद कुमार सिंह को विधान सभा में भेजा.

विनोद सिंह तत्कालीन मायावती सरकार में पर्यटन मंत्री थे. विधान सभा चुनाव में लम्भुआ सीट से पिता के बाद पुत्रों ने भी अपनी किस्मत आजमाई. वर्ष 1957 में अखंडनगर विकास खंड के निवासी केदारनाथ सिंह निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़े थे हालांकि उन्हें सफलता तो नहीं मिली लेकिन वर्ष 2007 में उन्हीं के पुत्र विनोद सिंह को जनता ने विधायक चुना. सन 74 में कांग्रेस के ऋषिदेव पांडेय के बाद 1989 में उनके पुत्र अशोक पांडेय न केवल चुनाव लड़े बल्कि विधायक भी बने. 2012 में इस सीट से सपा के संतोष पांडेय जीते और मौजूदा 2017 में यहां से भाजपा जीती और देवमणि द्विवेदी यहां से विधायक हैं. 

सामाजिक ताना-बाना

लम्भुआ विधानसभा की कुल जनसंख्या 541182 और इस विधानसभा के कुल मतदाताओं की संख्या 356962 है. जिसमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 187359 है. और महिला मतदाताओं की संख्या 169585 है. इसके अलावा इस विधानसभा में थर्ड जेंडर  मतदाताओं की संख्या 18 है .
 
2017 का जनादेश
2017 के विधानसभा चुनाव में लम्भुआ सीट पर कुल 14  प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था लेकिन मुकाबला सपा, बसपा और भाजपा के बीच था, भाजपा प्रत्याशी देवमणि द्विवेदी को  78,627 मत मिले थे. जबकि दूसरे नंबर पर बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी विनोद सिंह को  65724 वोट मिले थे. संतोष पांडेय 47633 मत पाकर तीसरे नंबर पर रहे थे. 2017 के विधानसभा चुनाव में लम्भुआ सीट में कुल मतदाता 350951 थे. जिसमें से 201692 लोगो ने वोटिंग की.यह वोटिंग प्रतिशत 57.47 फीसदी रहा था. 
 
विधायक का रिपोर्ट कार्ड
लम्भुआ विधानसभा क्षेत्र से मौजूदा विधायक देवमणि द्विवेदी का जन्म 16 सितंबर 1964 को हुआ था. उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की है. चुनाव लड़ने के समय दिए गए शपथ पत्र के अनुसार उनकी कुल संपत्ति एक करोड़ से अधिक थी और उनके ऊपर कोई भी आपराधिक मामला दर्ज़ नहीं था. वह नई दिल्ली रेलवे में क्लास वन अफसर थे. चुनाव से ठीक पहले उन्होंने वीआरएस ले लिया और भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए.  विधायक देवमणि द्विवेदी अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चा में रहते हैं.

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उन्होंने सबसे पहले अपने जिले की तत्कालीन जिलाधिकारी सी0 इंदुमती के खिलाफ पत्र लिख कर कोविड घोटाले को उजागर किया था. जिसमें योगी सरकार को अपने ही प्रशासनिक अधिकारी को ना सिर्फ जिले से ट्रांसफर करना पड़ा था बल्कि इस मामले में एक जांच कमेटी तक गठित करनी पड़ी थी. इसके बाद उन्होंने एक पत्र के जरिये ब्राह्मण सियासत गर्म कर दी थी. उन्होंने यूपी सरकार के 3 साल के कार्यकाल में ब्राह्मणों की हत्या और सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए थे. उन्होंने प्रश्न पूछने के लिए विधानसभा की प्रक्रिया और संचालन नियमावली 1958 के तहत सूचीबद्ध कराने के लिए प्रपत्र दिया था. जिसके बाद सूबे में हलचल मच गई थी.

इनके पत्रों के चर्चे इतने है कि किसी ने इन्ही के नाम का फर्ज़ी लेटर पैड का इस्तेमाल करके प्रदेश के 17 बड़े क्षत्रिय लोगों के नाम लिखकर प्रमुख सचिव से पूछा था कि इनके ऊपर आपकी सरकार ने कब और कैसी कार्यवाही की है. ये पत्र भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था जिसके बाद खुद विधायक देवमणि को उक्त पत्र को भेजने वाले के खिलाफ़ लखनऊ की हजरतगंज कोतवाली में मुकदमा लिखवाना पड़ गया था. इसके अलावा इन्होंने भाजपा सरकार से राम मंदिर आंदोलन के दौरान मृत कारसेवकों के आश्रितों के लिए सरकारी नौकरी और पेंशन की मांग की थी. 

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विधायक देवमणि द्विवेदी को गाना गाने का शौक है. अक्सर ये किसी न किसी कार्यक्रम में माइक लेकर भजन आदि गाते हुए मिल जाते हैं. उनका एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वह भारत मां का हवाला देते हुए नागरिकों से दो या दो से कम बच्चे रखने की अपील कर रहे थे.

 

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