
जनपद मऊ के उत्तरी छोर पर घाघरा नदी के किनारे की तटवर्ती व जनपद गोरखपुर देवरिया एवं आजमगढ़ को जोड़ने वाली इस विधानसभा में घाघरा नदी का पाट एवं तलहटी होने के कारण देवांचल का अधिक जमीनी हिस्सा इस क्षेत्र में पड़ता है. यही कारण है कि यहां हर वर्ष नदी की बाढ़ और गर्मी में फसलों में आगजनी का खतरा हमेशा बना रहता है. यहां पर निवास करने वाले लोगों को खानाबदोश की तरह जीवन व्यतीत करना पड़ता है. गर्मी के दिनों में जब रबी की फसल पक जाती है और किसान उसको लेकर अपने आगामी भविष्य का सपना संजोने लगता है, तभी शॉर्ट सर्किट और अन्य कारणों से आग लगने के कारण उसके अरमानों पर पानी फिर जाता है.
इसका मुख्य कारण देवरांचल का एक लंबा हिस्सा जो नदी के पाट से बनता है और उसमें किसान अपने गेंहू की फसल उगाते हैं. हर साल अगलगी से हजारों एकड़ फसल जलकर राख हो जाती है. इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय विधानसभा मुख्यालय पर फायर स्टेशन तो जरूर बनवा दिया गया है किंतु इस प्राकृतिक आपदा को रोकना इतना आसान नहीं होता है. यदि हम बाढ़ की बात करें तो अपनी झुग्गी झोपड़ी डालकर रहने वाले लोगों को हर बरसात के मौसम में अपना आशियाना उजाड़ना पड़ता है.
आजादी की लड़ाई में इस क्षेत्र का रहा है महत्वपूर्ण योगदान
हालांकि आजादी की लड़ाई में इस क्षेत्र का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है. सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय देश की स्वतंत्रता के दीवानों ने मधुबन थाने पर तिरंगा फहराया था. जिससे इस धरती का नाम पूरे देश में हो गया. आजादी मिलने के बाद सबसे पहले इस विधानसभा क्षेत्र का गठन हुआ और इसका नाम नत्थूपुर पड़ा.
विधानसभा का नाम नत्थूपुर पड़ने का कारण यहां के राजा नथमल थे और जिनके नाम पर यहां एक गांव हुआ करता था. जो बाद में नत्थूपुर के नाम से जाना गया और आज यह गांव अस्तित्व में है. लेकिन कालांतर में नए परिसीमन के चलते इस विधानसभा का नाम मधुबन हो गया. हालांकि पहले विधानसभा चुनाव के समय नत्थूपुर और मधुबन दोनो गांव के रूप में मौजूद थे.
क्रांतिकारियों की धरती मानी जाने वाली इस विधानसभा ने 1942 में ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिलाकर रख दी थी. इस आंदोलन में यहां के तमाम क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. यहां के लोगों ने जनप्रतिनिधि के रूप में पांच बार स्वतंत्रता सेनानियों को चुनकर प्रदेश की पंचायत में भेजने का काम किया है.
लोगों ने स्वतंत्रता सेनानियों को सर आंखों पर बिठाया
क्रांतिकारियों की धरती कही जाने वाली इस विधानसभा ने देश की आजादी में अपना योगदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को अपने सर आंखों पर बिठाया. यही कारण है कि इस क्षेत्र से पांच बार स्वतंत्रता सेनानियों को जनप्रतिनिधि बनाया गया. स्वतंत्रता के बाद पहली विधानसभा गठन में स्वतंत्रता सेनानी राम सुंदर पांडेय को सन 1952 से लेकर 1962 तक एवं वहीं स्वतंत्रा सेनानी मंगल देव विशारद को 1967 में और स्वतंत्रता सेनानी विष्णु देव गुप्ता को 1985 में क्षेत्र का विधायक बनाया.
इस सीट से चुने गए विधायक को दो-दो बार कैबिनेट में प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला. हालांकि मंत्री बनने का मौका केवल मंगल देव विशारद और राजेंद्र कुमार और वर्तमान में दारा सिंह चौहान को ही मिला. 1989 में हुए मध्यावधि चुनाव में स्वतंत्रता सेनानी श्याम सुंदर पांडेय के सुपुत्र अमरेश चंद्र पांडेय ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता. 1991 के सामान्य विधान सभा चुनाव में एक बार पुनः अमरेश पांडेय ने अपना परचम लहराया. फिर से 1993 के मध्यावधि चुनाव में अनुसूचित सीट होने के कारण इस सीट पर राजेंद्र कुमार को टिकट मिला और वह चुनाव जीतकर सरकार में वित्त एवं राजस्व मंत्री बनाए गए.
उमेश चंद्र पांडेय दो बार रहे विधायक
1996 में मध्यावधि चुनाव में समाजवादी पार्टी के बैनर तले सुधाकर सिंह विधायक बने और फिर 2002 में बसपा से कपिल देव यादव विधायक चुने गए. इसके बाद विधानसभा चुनाव 2007 में बसपा के बैनर तले उमेश चंद्र पांडेय चुनाव जीतकर विधायक बने और 2012 के चुनाव में भी अपनी बादशाहत कायम रखी. सन 2017 में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार दारा सिंह चौहान ने चुनाव जीतकर, बीजेपी को पहली बार इस सीट पर जीत दिलाई. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कद्दावर नेता अमरेश चंद्र पांडेय को हराया.
2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को इस सीट पर अपना खाता खोलने का मौका मिला और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े दारा सिंह चौहान को कुल 86,238 वोट प्राप्त हुए तथा पूर्व विधायक एवं कांग्रेस के बैनर तले चुनाव लड़ने वाले अमरेश चंद्र पांडेय को कुल 56,823 मत प्राप्त हुए. वहीं बहुजन समाज पार्टी के पूर्व विधायक एवं इस सीट पर पिछले दो बार से लगातार विधायक रहे उमेश चंद्र पांडेय को 54803 वोट मिले. बीएसपी तीसरे नंबर पर रही. इस चुनाव में जनता ने कुल 56.68 प्रतिशत वोटिंग की थी.
बाढ़ और अलगली लोगों की प्रमुख समस्या
मधुबन विधानसभा का ज्यादातर हिस्सा घाघरा नदी के किनारे पड़ने के कारण यहां पर बारिश के समय बाढ़ और गर्मी में फसलों में अगलगी की घटना प्रमुख मुद्दा है. हालांकि हर वर्ष घाघरा नदी की कटान से खेती और फसलों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार की तरफ से करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं. बावजूद इसके स्थिति अभी भी वैसी ही बनी हुई है. जनप्रतिनिधियों द्वारा चुनाव में लगातार वादे तो किए जाते हैं लेकिन क्षेत्रवासियों की समस्या से निजात अभी तक उनको नहीं मिल सका है.
आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र के लोगों का प्रमुख व्यवसाय खेती किसानी है लेकिन हर वर्ष बाढ़ में सैकड़ों एकड़ फसल डूब कर नष्ट हो जाती है और किसान मुआवजा और बाढ़ की विभीषिका से बचने के लिए जनप्रतिनिधियों सहित सरकार से गुहार लगाते रहते हैं. मधुबन विधानसभा में कुल वोटरों की संख्या 3,92,392 है. इनमें से महिला वोटर 1,81534 हैं वहीं कुल पुरुष मतदाता 2,10818 है. जबकि थर्ड जेंडर मतदाता 41 हैं.
विधायक दारा सिंह चौहान यूपी कैबिनेट में मंत्री
मऊ के मधुबन विधानसभा के भाजपा विधायक दारा सिंह चौहान वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री हैं. इनका जन्म 25 जुलाई 1963 को आजमगढ़ जनपद में हुआ था. बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में रहने के बाद अभी वह भाजपा से विधायक और सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. उनके चार बच्चे हैं. 02 फरवरी 2015 को इन्होंने भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन की थी और उसके बाद बीजेपी ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष बने और मधुबन से चुनाव लड़कर जीत हासिल की.
इनके पिता का नाम रामकिशन चौहान है. उनकी पत्नी का नाम दिशा चौहान है. इनके दो लड़के और दो लड़कियां हैं. इन्होंने इलाहाबाद से अपनी शिक्षा ग्रहण की है. क्षेत्र के वोटरों में इनकी खासी लोकप्रियता है. मंत्री रहने के बाद भी क्षेत्र में जाकर उनकी समस्याओं को सुनते हैं और इस वर्ष कटान और बाढ़ से बचाव के लिए काफी पैसा खर्चा करके इसको रोकने की दिशा में काम कर रहे हैं.
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विकास कार्य के लिए काफी पैसा खर्च किया
पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़कर सांसद बने थे जबकि 16वीं लोकसभा में चुनाव में इन्हें भाजपा के हरिनारायण राजभर के हाथों हार का सामना करना पड़ा था. इनके द्वारा विधायक निधि से क्षेत्र के विकास कार्य के लिए काफी पैसा खर्च किया गया है. जिसमें नदी की बाढ़ से कटान रोकने के लिए 75 करोड़ का प्रोजेक्ट इनके द्वारा लाया गया है.
वहीं अगलगी की घटनाओं को रोकने के लिए कटघरे में 10 करोड़ से ज्यादा की लागत से फायर स्टेशन का निर्माण हो रहा है. शिक्षा के लिए 10 करोड़ की लागत से डिग्री कॉलेज का निर्माण चल रहा है. कटान में तबाह हो चुके 32 घरों के लोगों को विस्थापित कराकर उनको पट्टा आवंटित कराया गया और प्रधानमंत्री आवास भी दिलाया गया. सड़कों पर इनके द्वारा लगभग 18 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.