नेपाल बॉर्डर पर स्थित महराजगंज जिला यूपी की सियासत में अहम स्थान रखता है. यहां कभी भी लंबे समय तक किसी एक दल या नेता के हाथ में सत्ता की चाबी नहीं रही है. यहां की राजनीति बदलाव की साक्षी रही है. कभी कांग्रेस के सियासत का पिच रह चुके यहां के चुनावी मैदान में बामपंथ की राजनीति ने भी अपनी जगह बनाई. बसपा, सपा ने भी खाता खोला.
राम मंदिर आंदोलन के बाद राजनीति में आए बदलाव ने यहां के सियासी रंग को भगवा कर दिया. फिलहाल चुनाव की अधिसूचना जारी होने के पहले यहां की सियासी सरगर्मी दो खेमे में बंटी नजर आ रही है. भाजपा व सपा के बीच ही सत्ता का संघर्ष देखने को मिल रहा है, लेकिन बसपा की खामोशी अन्य दलों को बेचैन करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है.
सामाजिक-आर्थिक तानाबाना
नेपाल बार्डर से सटे यूपी के महराजगंज जिले ने देश व प्रदेश की राजनीति में कई बड़ा चेहरा दिया, लेकिन पिछड़ेपन का दंश झेल रही प्रो. सिब्बल लाल सक्सेना की कर्मभूमि कभी नहीं उबर पाई. कृषि प्रधान जिले को मिनी पंजाब कहा जाता है, लेकिन यहां की औद्योगकि शून्यता ने पलायन को बढ़ाया.
जिले की चार चीनी मिलों में से दो बंद हैं. फूड प्रोसेसिंग की एक भी यूनिट नहीं है. जिले के नगर निकायों में ओद्योगिक क्षेत्र बनाए गए लेकिन वहां न तो फैक्ट्रियां स्थापित हुई और ना ही सुविधाओं का विकास हुआ. नेपाल से आने वाली पहाड़ी नदियां यहां हर साल बाढ़ की त्रासदी लिखती हैं.
जिले से होकर बौद्ध परिपथ व राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरा है, जिसका इस्तेमाल देश के अन्य कोने से नेपाल को जोड़ने तक ही प्रमुख रूप से सिमट कर रहा है. जिले में प्राकृतिक वन संपदा मौजूद है. सोहगीबरवा वन्यजीव अभ्यारण्य इसी जिले में है, लेकिन वहां ईको टूरिज्म की अपार संभावना होने के बाद उसका विकास नहीं हो पाया.
सोहगीबरवा वन्यजीव अभ्यारण्य के लक्ष्मीपुर रेंज में देश की पहली ट्राम-वे रेल है, लेकिन पिछले चार दशक से बंद है. उसको ईको टूरिज्म के लिए फिर से चलाने की योजना बनी. सोच थी कि दार्जिलिंग हेरीटेज ट्रेन की तरह ट्राम-वे रेल को फिर से चलाकर उसको विश्व धरोहर घोषित कराया जाएगा. इसके लिए कार्ययोजना बनी लेकिन वह भी फाइलों में कैद होकर रह गई है.
राजनीतिक इतिहास
कौशल राज्य का अंग रह चुके महराजगंज की धरती का समृद्ध प्रजातांत्रिक इतिहास है. इस क्षेत्र में नवाबों के दौर के पहले राजपूत राजाओं का वर्चस्व रहा है. इस धरती का इतिहास भगवान बुद्ध के ननिहाल के रूप में भी जुड़ा है. अंग्रेजी हुकूमत में यहां भी विरोध के आवाज उठे थे. देश आजाद होने के बाद जिले के शहीद स्मारक पर रामदीन का दीया पहली बार यहां की आजाद धरती पर जगमगाया था. आजादी के बाद लोकसभा में इस इलाके का प्रतिनिधित्व राजनेता और प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी शिब्बन लाल सक्सेना ने किया. महाराजगंज के मसीहा के नाम से मशहूर शिब्बन लाल सक्सेना यहां से तीन बार चुनाव साल 1952, 1957 और 1971 में जीते थे. 1990 के बाद यहां की राजनीति में भाजपा ने वर्चस्व बनाया.
नब्बे के दशक से लेकर अब तक यहां हुए आठ लोकसभा चुनाव में भाजपा को छह बार जीत मिली. सभी बार पंकज चौधरी जीते, जो मौजूदा समय में केंद्र में मंत्री भी हैं. यहां से एक बार कांग्रेस और एक बार सपा भी जीती है. विधानसभा चुनाव से पहले यहां दलबदल की राजनीति शुरू हो गई है. भाजपा से मंत्री रह चुके सिसवा के पूर्व विधायक शिवेन्द्र सिंह दो चुनाव पहले सपा के टिकट पर लड़े, लेकिन उन्होंने अब साइकिल की सवारी छोड़ भाजपा का दामन फिर से थाम लिया है.
इससे सिसवा विधानसभा के भाजपा विधायक प्रेम सागर पटेल के खेमे में बेचैनी देखने को मिल रही है. बसपा छोड़ पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय सपा में शामिल हो चुके हैं. वहीं गोरखपुर के सहजनवा व महराजगंज के श्यामदेउरवा(अब पनियरा) विधायक रह चुके देव नारायण सिंह उर्फ जीएम सिंह भाजपा का दामन थाम पनियरा क्षेत्र में अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया है.
2017 के चुनाव का जनादेश
यहां की जनता ने चार विधानसभा सीटों सदर, पनियरा, सिसवा व फरेंदा में भाजपा के पक्ष में जनादेश दिया था. सदर से भाजपा प्रत्याशी जयमंगल कन्नौजिया जीते थे. सिसवा विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी प्रेम सागर पटेल जीते थे. उन्होंने पूर्व विधायक शिवेन्द्र सिंह को हराया था. अब शिवेन्द्र सिंह सपा छोड़ भाजपा में शामिल हो चुके हैं.
जिले की फरेंदा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी बजरंग बहादुर सिंह उर्फ बजरंगी सिंह 38.36 फीसदी वोट पाकर विधायक चुने गए थे. यहां उनको कांग्रेस प्रत्याशी वीरेन्द्र चौधरी से कड़ा मुकाबला मिला था. जीत का अंतर केवल 2354 वोट का रहा. वीरेन्द्र चौधरी को 37.18 फीसदी मत मिला था.
2017 के विधानसभा चुनाव में पनियरा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी ज्ञानेन्द्र सिंह ने बसपा प्रत्याशी व पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय को हराकर बसपा से यह सीट छिना था. 2012 के चुनाव में यहां के बसपा प्रत्याशी देव नारायण सिंह सिंह उर्फ जीएम सिंह ने भाजपा के पूर्व विधायक ज्ञानेन्द्र सिंह को चुनाव हराया था.
पूर्वांचल की राजनीति में अहम स्थान रखने वाले नौतनवा विधानसभा में पूर्व मंत्री व बाहुबली नेता अमर मणि त्रिपाठी के पुत्र अमन मणि निर्दल प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और सपा प्रत्याशी व कांग्रेस के पूर्व विधायक रह चुके कुंवर कौशल सिंह उर्फ मुन्ना सिंह को चुनाव हराकर पहली बार विधायक बने.